खुमलटार के खवालुङ मोनेस्ट्री स्कूल से जुड़ा एक पुराना वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है। वीडियो में एक महिला शिक्षक एक छोटे भिक्षु छात्र के हाथ पर कई बार डंडे से मारती दिखती हैं। बच्चा इसके बाद रोने लगता है, जबकि महिला गुस्से में दूसरे छात्रों को भी डांटती सुनाई देती हैं।
स्कूल प्रशासन ने वीडियो में दिख रही महिला की पहचान पूर्व शिक्षिका सोना राना के रूप में की है। स्कूल का कहना है कि यह घटना हाल की नहीं, बल्कि करीब डेढ़ साल पुरानी है और फाल्गुन 2080 में हुई थी। प्रशासन के मुताबिक, सोना राना अब स्कूल में काम नहीं करतीं।
वीडियो पुराना होने के बावजूद उसमें सुनाई देने वाली कुछ बातें अब भी गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।
महिला को छात्रों से यह कहते सुना जा सकता है कि क्या इस साल न मारने की वजह से वे उनका सम्मान नहीं कर रहे। वह पिछली घटना का जिक्र करती हैं, बच्चों से डरने की बात कहती हैं और यह भी पूछती हैं कि उन्हें पता है या नहीं कि किसके मुंह से खून आया था।
वीडियो में इस आखिरी टिप्पणी का संदर्भ साफ नहीं है। यही वजह है कि लोग पूछ रहे हैं कि क्या स्कूल में इससे पहले भी कोई गंभीर घटना हुई थी और उस समय क्या कार्रवाई की गई।
स्कूल के जवाब से खत्म नहीं हुए सवाल
स्कूल का कहना है कि संबंधित शिक्षिका से उस समय स्पष्टीकरण लिया गया था। हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जांच का नतीजा क्या निकला, बच्चे को क्या सहायता दी गई और शिक्षिका के स्कूल छोड़ने का संबंध इस घटना से था या नहीं।
यह भी सामने नहीं आया है कि घटना के बाद स्कूल ने अपने अनुशासन के तरीकों, छात्रावास की निगरानी या बच्चों की शिकायत सुनने की व्यवस्था में कोई बदलाव किया या नहीं।
सार्वजनिक चर्चा अब केवल एक शिक्षक के व्यवहार तक सीमित नहीं है। सवाल स्कूल की जिम्मेदारी और बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी उठ रहे हैं।
घर से दूर रहने वाले बच्चों की सुरक्षा
मठ से जुड़े आवासीय स्कूलों में कई बच्चे कम उम्र से ही परिवार से दूर रहते हैं। वे वहीं रहकर सामान्य पढ़ाई के साथ धार्मिक शिक्षा भी लेते हैं।
ऐसे बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी स्कूल और छात्रावास प्रशासन पर अधिक होती है। माता-पिता पास नहीं होते, इसलिए बच्चे अपनी परेशानी किससे कहें और शिकायत करने पर उन्हें सुरक्षा मिले या नहीं, यह बहुत अहम है।
स्कूल बच्चों के लिए डर की जगह नहीं होना चाहिए। वहां उन्हें पढ़ने, सवाल पूछने, गलती करने और सही तरीके से सीखने की जगह मिलनी चाहिए।
लेकिन जब अनुशासन के नाम पर डर पैदा हो, तो उसका असर केवल उस दिन तक सीमित नहीं रहता। इसका असर बच्चे के आत्मविश्वास, पढ़ाई और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।
जिन सवालों का जवाब जरूरी है
इस घटना के बाद स्कूल और संबंधित निकायों के सामने कुछ सीधे सवाल हैं:
- स्कूल के छात्रावास में रहने वाले बच्चों की मौजूदा स्थिति क्या है?
- क्या अनुशासन के लिए डर या दबाव का इस्तेमाल किया जाता है?
- क्या बच्चों के पास शिकायत रखने का सुरक्षित और भरोसेमंद माध्यम है?
- घटना के बाद स्कूल ने कौन से सुधार किए?
- क्या अन्य छात्रों से भी स्वतंत्र रूप से बात की गई?
इन सवालों का जवाब केवल आंतरिक स्पष्टीकरण से नहीं मिलेगा। इसके लिए निष्पक्ष जांच और सार्वजनिक रूप से स्पष्ट जानकारी जरूरी है।
पुराना वीडियो, लेकिन मुद्दा आज भी अहम
किसी घटना का पुराना होना उसे अपने आप कम गंभीर नहीं बनाता। खासकर तब, जब मामला ऐसे बच्चों से जुड़ा हो जो परिवार से दूर रहकर स्कूल और छात्रावास पर निर्भर हैं।
बाल अनुशासन पर हुए कई अध्ययनों में यह सामने आया है कि डर और शारीरिक दंड से सीखने का माहौल बेहतर नहीं होता। इसके उलट बच्चों में चिंता, संकोच और पढ़ाई से दूरी बढ़ सकती है।
बच्चे गलती करते हैं। कई बार निर्देश नहीं मानते। लेकिन उन्हें सुधारने का तरीका बातचीत, समझ और सकारात्मक अनुशासन होना चाहिए।
अब जरूरत इस बात की है कि संबंधित निकाय यह देखें कि घटना के समय क्या हुआ था, स्कूल ने क्या कदम उठाए और आज वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए कौन सी व्यवस्था लागू है।
जांच में जो तथ्य सामने आएं, उन्हें बच्चों की पहचान और गरिमा की रक्षा करते हुए सार्वजनिक किया जाना चाहिए। तभी यह भरोसा बन सकता है कि मामला केवल वीडियो के वायरल होने तक सीमित नहीं रहेगा।
- बच्चों को डर नहीं, भरोसा चाहिए।
- उन्हें सजा नहीं, सही मार्गदर्शन चाहिए।
- स्कूल में हर बच्चे को सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए।