काठमांडू के कालीमाटी फल और सब्जी बाजार में स्थानीय टमाटर की कीमतें बेहद नीचे चली गई हैं। किसानों का कहना है कि व्यापारी नेपाली टमाटर खरीदने से बच रहे हैं। खरीद भी रहे हैं तो इतनी कम कीमत दे रहे हैं कि खेत से बाजार तक लाने का खर्च तक नहीं निकल पा रहा।
इसी नाराजगी के बीच किसान स्वतःस्फूर्त विरोध में उतर आए हैं। उनका कहना है कि मेहनत से तैयार फसल अब या तो खेत में सड़ रही है या सड़क पर फेंकनी पड़ रही है।
स्थानीय टमाटर का भाव 8 रुपये किलो तक
कालीमाटी फल और सब्जी बाजार विकास समिति ने बुधवार को जो थोक मूल्य जारी किया, उसमें छोटे स्थानीय टमाटर की न्यूनतम कीमत 8 रुपये और अधिकतम कीमत 12 रुपये प्रति किलो रखी गई है। इसका औसत थोक भाव 9 रुपये 50 पैसे प्रति किलो है।
टनल तकनीक से उगाए गए छोटे टमाटर का औसत थोक मूल्य 14 रुपये 60 पैसे प्रति किलो दर्ज किया गया। वहीं बड़े नेपाली टमाटर का औसत भाव 38 रुपये 75 पैसे प्रति किलो तय किया गया है।
किसानों का कहना है कि थोक बाजार में कीमत 10 रुपये से नीचे पहुंचने पर उनके हाथ में इससे भी कम रकम आती है। बीच में ढुलाई, छंटाई और दूसरे खर्च भी जुड़ते हैं।
लागत बढ़ी, कमाई लगातार घटी
टमाटर उत्पादकों के मुताबिक बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी और परिवहन की लागत लगातार बढ़ रही है। मौजूदा बाजार भाव से इन खर्चों का छोटा हिस्सा भी वापस नहीं आ रहा।
किसानों के सामने मुश्किल यह है कि टमाटर को लंबे समय तक रोककर नहीं रखा जा सकता। समय पर बिक्री न हो तो पूरी फसल खराब हो जाती है। ऐसे में कम कीमत पर बेचने या टमाटर फेंकने के अलावा उनके पास बहुत कम विकल्प बचते हैं।
खुदरा बाजार में कीमत फिर भी ज्यादा
एक तरफ किसानों को टमाटर का बेहद कम दाम मिल रहा है, दूसरी तरफ उपभोक्ता खुदरा बाजार में इसके लिए कहीं ज्यादा कीमत चुका रहे हैं।
उत्पादन स्थल से उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते कीमत में आने वाला बड़ा अंतर अब सवालों के घेरे में है। किसान पूछ रहे हैं कि जब बाजार में ग्राहक महंगा टमाटर खरीद रहा है तो उसका फायदा वास्तविक उत्पादक तक क्यों नहीं पहुंच रहा।
कालीमाटी बाजार में पैदा हुई यह स्थिति केवल टमाटर की कीमत का मामला नहीं है। इससे कृषि उपज की खरीद, बिचौलियों की भूमिका और बाजार की वितरण व्यवस्था पर भी सवाल उठे हैं।