डडेलधुरा में 38 साल बाद 12 परिवारों को मिला लालपुर्जा

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डडेलधुरा में 38 साल बाद 12 परिवारों को मिला लालपुर्जा

डडेलधुरा के परशुराम नगरपालिका–12 में 12 परिवारों का करीब चार दशक पुराना इंतजार खत्म हो गया है। जिस जमीन पर वे लंबे समय से रह रहे और खेती करते आ रहे थे, उसका मालिकाना हक साबित करने वाला कागज अब उनके हाथ में है। इन परिवारों को जमीन का रजिस्ट्रेशन प्रमाणपत्र यानी लालपुर्जा दिया गया है।

मामला खजुरानी और तुलाभाडी गांव का है। यहां जमीन की नापी कोई हाल की बात नहीं है। तत्कालीन सुकुम्बासी समस्या समाधान आयोग ने 2045 विक्रम संवत में ही जमीन की नापी और नक्शा तैयार कर दिया था। उस समय यह इलाका तत्कालीन जोगबुढा ग्राम विकास समिति के वार्ड नंबर 1 में आता था।

नापी हो गई, लेकिन उसके बाद की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई। नतीजा यह रहा कि जमीन पर वर्षों से कब्जा और इस्तेमाल होने के बावजूद परिवारों के पास कानूनी मालिकाना हक का प्रमाण नहीं पहुंचा।

कई बार आगे बढ़ा मामला, हर बार अधूरा रहा

करीब दस साल बाद इस पुराने मामले को फिर आगे बढ़ाने की कोशिश हुई। 26 पुस 2055 विक्रम संवत को सुकुम्बासी समस्या समाधान आयोग के जरिए प्रक्रिया दोबारा शुरू की गई।

इसके बावजूद काम लालपुर्जा बांटने तक नहीं पहुंच सका।

यही सिलसिला लंबे समय तक चलता रहा। कभी प्रक्रिया आगे बढ़ी तो कभी बीच में अटक गई। खजुरानी और तुलाभाडी के परिवार जमीन की नापी हो जाने के बाद भी अपने नाम का कानूनी दस्तावेज पाने का इंतजार करते रहे।

मामला केवल सरकारी कागज मिलने या न मिलने का नहीं था। जमीन पर रहने और उसका इस्तेमाल करने के बावजूद औपचारिक स्वामित्व तय नहीं होने से इन परिवारों के सामने वर्षों तक अनिश्चितता बनी रही।

पुरानी अधूरी प्रक्रिया को अब किया गया पूरा

मौजूदा समिति ने पिछले आयोगों के समय शुरू होकर अधूरे रह गए काम को वर्तमान कार्यविधि और लागू नियमों के तहत आगे बढ़ाया। जरूरी प्रक्रिया पूरी की गई और नियम के मुताबिक राजस्व भी जमा कराया गया।

इसके बाद पहले से नापी हो चुकी जमीन के रजिस्ट्रेशन का रास्ता साफ हुआ।

परशुराम नगरपालिका–12 के ऐसे 12 परिवारों को अब जग्गाधनी दर्ता प्रमाणपुर्जा दिया गया है। इसके साथ ही वर्षों से अटका मालिकाना हक का मामला भी औपचारिक रूप से सुलझ गया।

नापी से लालपुर्जा तक बीत गए करीब 38 साल

2045 विक्रम संवत में हुई जमीन की नापी से लेकर लालपुर्जा मिलने तक करीब 38 साल गुजर गए। इस दौरान परिवार जमीन का भोगचलन करते रहे, लेकिन उनके पास स्वामित्व साबित करने वाला कानूनी दस्तावेज नहीं था।

अब लालपुर्जा मिलने का मतलब उनके लिए सिर्फ एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया का पूरा होना नहीं है। यह उस जमीन पर कानूनी हक मिलने की पुष्टि भी है, जिसके लिए वे दशकों से इंतजार कर रहे थे।

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