चोलेन्द्र जबरा का मोबाइल 12 घंटे पुलिस के पास क्यों रहा?
नेपाल के पूर्व प्रधान न्यायाधीश चोलेन्द्र शमशेर जबरा को ‘सुरक्षा’ के लिए पुलिस कार्यालय ले जाने के मामले में अब उनके मोबाइल को लेकर सवाल उठे हैं। महाराजगंज से उन्हें अपने साथ ले गई पुलिस टीम ने उनका निजी मोबाइल भी अपने पास रख लिया था। करीब 12 घंटे बाद जब जबरा को छोड़ा गया, तभी मोबाइल उनके परिवार को वापस मिला।
पुलिस का कहना है कि जेनजी युवाओं की ओर से जबरा पर हमले की आशंका की सूचना मिली थी। इसी वजह से उन्हें सुरक्षा के लिए काठमांडू के टेकु स्थित उपत्यका अपराध अनुसंधान कार्यालय लाया गया।
लेकिन मामला सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं रहा। कार्यालय में जबरा से पूछताछ भी हुई। ऐसे में सवाल है कि अगर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया था और न ही किसी जांच के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था, तो उनका मोबाइल पुलिस ने अपने पास क्यों रखा?
महाराजगंज से रात में टेकु लाए गए जबरा
उपत्यका अपराध अनुसंधान कार्यालय के डीएसपी योगराज खतिवडा के नेतृत्व में पुलिस की टीम जबरा को महाराजगंज से लेकर गई थी। रविवार तड़के करीब दो बजे उन्हें टेकु स्थित पुलिस कार्यालय पहुंचाया गया।
कार्यालय के एसएसपी संतोष खड्का के मुताबिक, जबरा पर जेनजी युवाओं की ओर से हमला होने की आशंका से जुड़ी सूचना मिली थी। उनका कहना है कि इसी सूचना के बाद सुरक्षा के लिए जबरा को कार्यालय लाया गया।
इस दौरान उनका मोबाइल पुलिस के पास ही रहा। बाद में जबरा को छोड़ते समय मोबाइल उनके बेटे सचिन्द्र शमशेर जबरा को सौंपा गया। सचिन्द्र ही अपने पिता को पुलिस कार्यालय से लेकर बाहर निकले।
क्या मोबाइल के अंदर की जानकारी देखी गई?
अब सबसे अहम सवाल मोबाइल को लेकर है। पुलिस के पास रहने के दौरान फोन में मौजूद निजी जानकारी या बातचीत देखी गई या नहीं, इसकी पुष्टि नहीं हुई है।
उपलब्ध जानकारी से ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया है जिससे यह कहा जा सके कि पुलिस ने मोबाइल खोलकर उसमें मौजूद संदेश, कॉल या दूसरी जानकारी की जांच की थी।
फिर भी मोबाइल को करीब 12 घंटे तक पुलिस के पास रखने की वजह साफ नहीं की गई है। खासकर तब, जब पुलिस खुद जबरा को कार्यालय लाने की वजह उनकी सुरक्षा बता रही है।
पुलिस कार्यालय में जबरा से हुई पूछताछ
मामले में एक और पहलू सामने आया है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, उपत्यका अपराध अनुसंधान कार्यालय के एसपी शरत थापा क्षेत्री और डीएसपी योगराज खतिवडा ने जबरा से पूछताछ की थी।
इसके साथ ‘हेलो सरकार’ में पड़ी एक बेनाम शिकायत का मामला भी जुड़ा है। बताया गया है कि यह शिकायत पुलिस मुख्यालय से होते हुए टेकु स्थित अपराध अनुसंधान कार्यालय तक पहुंची थी।
शिकायत में आखिर क्या था, इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। पुलिस अधिकारियों ने यह भी साफ नहीं किया है कि जबरा से हुई पूछताछ का उस शिकायत से क्या संबंध था।
यहीं से पूरे घटनाक्रम पर सवाल बढ़ते हैं। एक तरफ पुलिस सुरक्षा के लिए कार्यालय लाने की बात कह रही है, दूसरी तरफ उसी दौरान पूछताछ हुई और निजी मोबाइल भी पुलिस के पास रहा।
बेटे ने खुद मांगी थी पिता के लिए सुरक्षा
इस बीच एक और दस्तावेज सामने आया है। रविवार की ही तारीख में जबरा के बेटे सचिन्द्र ने अपने पिता की सुरक्षा के लिए पुलिस को आवेदन दिया था।
उपत्यका पुलिस कार्यालय के एआईजी सुशील सिंह राठौर ने आवेदन मिलने की पुष्टि की है। उनके मुताबिक, इसी आवेदन के आधार पर सुरक्षा की व्यवस्था की गई थी।
इससे जबरा को सुरक्षा देने का एक औपचारिक आधार सामने आता है। लेकिन यह बात अब भी साफ नहीं है कि सुरक्षा की इसी प्रक्रिया के दौरान मोबाइल को पुलिस ने अपने पास किस आधार पर रखा और उनसे पूछताछ क्यों की गई।
महाभियोग के बाद सुप्रीम कोर्ट नहीं लौट सके थे
चोलेन्द्र शमशेर जबरा ने 18 पुस 2075 से नेपाल के प्रधान न्यायाधीश की जिम्मेदारी संभाली थी। एक फागुन 2078 को संसद में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव दर्ज होने के बाद वह निलंबित हो गए थे।
महाभियोग प्रस्ताव आखिरकार पारित नहीं हुआ। इसके बावजूद निलंबन के बाद जबरा प्रधान न्यायाधीश के रूप में सुप्रीम कोर्ट वापस नहीं लौट सके।
ताजा घटनाक्रम में परिवार की ओर से सुरक्षा मांगे जाने की बात सामने आ चुकी है और पुलिस भी सुरक्षा को ही जबरा को कार्यालय लाने की वजह बता रही है। इसके बावजूद तीन सवाल अभी बाकी हैं—उनका निजी मोबाइल पुलिस ने क्यों रखा, क्या फोन में मौजूद किसी जानकारी तक पहुंच बनाई गई और सुरक्षा के लिए लाए गए व्यक्ति से शिकायत को लेकर पूछताछ किस आधार पर की गई?
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