नेपाल की संसद में एक बार फिर टकराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है, जब श्रम संस्कृति पार्टी के सांसदों ने प्रतिनिधि सभा के भीतर अपना विरोध तेज कर दिया। इस स्थिति ने अध्यक्ष डोल प्रसाद (डीपी) अर्याल को लगातार हो रहे व्यवधानों के बीच औपचारिक चेतावनी जारी करने के लिए मजबूर कर दिया।
बुधवार के सत्र की शुरुआत होते ही तनाव बढ़ गया, जब पार्टी अध्यक्ष एवं सांसद हर्क साम्पाङ अन्य पार्टी सांसदों के साथ सदन के भीतर प्लेकार्ड लेकर खड़े हो गए। सांसदों ने सरकार पर संसद के प्रति जवाबदेह न रहने, बार-बार उठाए गए मुद्दों को नजरअंदाज करने तथा मंत्रियों द्वारा सांसदों के प्रश्नों का समय पर उत्तर न देने का आरोप लगाया।
यह विरोध एक बार फिर संसद की अनुशासन व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया है, विशेषकर ऐसे समय में जब छोटे राजनीतिक दलों के बीच यह असंतोष बढ़ रहा है कि संसद में उनकी आवाज़ को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा।
अध्यक्ष ने संसद नियमावली का हवाला दिया
स्थिति को नियंत्रित करने के प्रयास में अध्यक्ष अर्याल ने प्रतिनिधि सभा नियमावली-२०७९ के नियम 30 का हवाला देते हुए साम्पाङ को सदन के भीतर अपने व्यवहार को सुधारने की चेतावनी दी। यह प्रावधान अध्यक्ष को उन सदस्यों को चेतावनी देने का अधिकार देता है जिनका व्यवहार संसदीय कार्यवाही के दौरान अव्यवस्थित या अनुचित माना जाता है।
हालांकि, चेतावनी के बाद भी साम्पाङ पीछे नहीं हटे। उन्होंने सीधे अध्यक्ष से प्रश्न किया कि क्या स्वयं अध्यक्ष ने नियम 15 के पालन को सुनिश्चित किया है। साम्पाङ का तर्क था कि सांसदों ने शून्यकाल और विशेष समय की चर्चाओं के दौरान बार-बार सार्वजनिक महत्व के मुद्दे उठाए हैं, लेकिन सरकार निर्धारित कानूनी समयसीमा के भीतर अनिवार्य जवाब देने में विफल रही है।
यह बहस संसद के भीतर बढ़ते संस्थागत तनाव को उजागर करती है, जो अब केवल विरोध प्रदर्शन या प्रक्रियागत असहमति तक सीमित नहीं रह गया है।
सरकार की जवाबदेही पर बहस तेज
संसद के नियम 15 के तहत सांसदों को समसामयिक और गंभीर सार्वजनिक मुद्दे उठाने का अधिकार प्राप्त है। उप-नियम (2) में स्पष्ट व्यवस्था है कि संबंधित मंत्री को सात दिनों के भीतर संसद के समक्ष उत्तर देना होगा।
श्रम संस्कृति पार्टी ने इसी प्रावधान को आधार बनाकर अपने संसदीय दबाव अभियान को तेज किया है। पार्टी का कहना है कि सरकार छोटे दलों द्वारा उठाए गए मुद्दों को चयनात्मक रूप से नजरअंदाज नहीं कर सकती, जबकि दूसरी ओर विपक्ष और अन्य दलों से अनुशासन एवं व्यवस्था बनाए रखने की अपेक्षा करती है।
हालिया टकराव संसद के भीतर उभर रहे व्यापक असंतोष को भी दर्शाता है। कई छोटे और सीमांत राजनीतिक दलों का मानना है कि उनकी आवाज़ को केवल प्रतीकात्मक महत्व दिया जा रहा है, वास्तविक प्राथमिकता नहीं। उनकी आलोचना अब केवल सरकार तक सीमित नहीं रही, बल्कि धीरे-धीरे संसद की कार्यप्रणाली पर भी केंद्रित होने लगी है।
संसद के भीतर बढ़ता तनाव
हाल के संसदीय सत्रों में लगातार विरोध, व्यवधान और प्रक्रियागत टकराव ने सरकार और विधायिका के संबंधों को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया है। जहां सत्तारूढ़ दल संसद में अनुशासन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, वहीं छोटे दलों का कहना है कि अनुशासन को जवाबदेही से बचने का माध्यम नहीं बनने दिया जा सकता।
यह तनाव अब संसद के भीतर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
अध्यक्ष अर्याल के लिए हर सत्र के साथ चुनौती और अधिक जटिल होती जा रही है — एक ओर संसद में अनुशासन बनाए रखना और दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना कि सांसदों द्वारा उठाए गए मुद्दों का समय पर समाधान और उत्तर मिले। इस बीच, विपक्षी और छोटे दलों के सांसद प्रक्रियागत विरोध के माध्यम से संसद में अपनी आवाज़ को और अधिक मुखर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि उनका मानना है कि संसद लगातार अधिक अनुत्तरदायी होती जा रही है।