काठमांडू में नदी किनारे और आसपास की बस्तियों से हटाए गए सुकुम्बासी परिवारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। सरकार ने होल्डिंग सेंटरों में रह रहे परिवारों को पांच दिन के भीतर वहां से निकलने का निर्देश दिया है। इसी के साथ प्रभावित परिवारों को नकद सहायता और किराया उपलब्ध कराने की योजना भी सामने आई है।
बरसात शुरू हो चुकी है। ऐसे समय में अस्थायी ठिकानों पर रह रहे परिवारों के सामने नई चिंता खड़ी हो गई है। सामाजिक सञ्जाल से लेकर राजनीतिक हलकों तक इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं। कई लोग पूछ रहे हैं कि जिन परिवारों को पहले ही विस्थापित किया जा चुका है, उनके लिए स्थायी व्यवस्था कब होगी।
बालेन शाह के काठमांडू महानगर प्रमुख बनने के बाद नदी किनारे की बस्तियों को हटाने का अभियान शुरू हुआ था। सुरक्षा बलों की मौजूदगी में कई बस्तियां खाली कराई गईं। इसके बाद बड़ी संख्या में परिवार बेघर हुए।
फिलहाल 388 परिवारों को कीर्तिपुर, इचंगुनारायण, खरिपाटी और धुलिखेल स्थित विभिन्न होल्डिंग सेंटरों में रखा गया है।
दो महीने से अस्थायी जीवन
होल्डिंग सेंटरों में रह रहे परिवार पिछले करीब दो महीनों से कठिन परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। वहां रहने वालों का कहना है कि कई बुनियादी सुविधाएं पर्याप्त नहीं हैं और दैनिक जीवन चलाना चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
इस बीच मानव अधिकार आयोग और संसदीय समिति समेत विभिन्न निकायों ने भी स्थिति का निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान विस्थापित परिवारों के लिए आवश्यक सुविधाओं की कमी पर सवाल उठे थे।
अब सरकार ने इन परिवारों को होल्डिंग सेंटर खाली करने की तैयारी करने को कहा है।
सरकार की नई व्यवस्था क्या है?
सरकार के अनुसार होल्डिंग सेंटरों में रह रहे 388 परिवारों के साथ-साथ वे वास्तविक सुकुम्बासी परिवार भी सहायता के दायरे में आएंगे, जिन्होंने बस्ती हटाए जाने के बाद स्वयं कहीं किराये पर रहने या अन्य व्यवस्था करने का रास्ता चुना है।
योजना के तहत प्रत्येक परिवार को एकमुश्त 25 हजार रुपये दिए जाएंगे। यह रकम नए ठिकाने की व्यवस्था के लिए होगी।
इसके अलावा अगले तीन महीने तक हर परिवार को प्रति माह 15 हजार रुपये घरभाड़ा सहायता देने की तैयारी की गई है।
सरकार का दावा है कि इसी अवधि के भीतर वास्तविक सुकुम्बासी परिवारों को लालपुर्जा देने की प्रक्रिया भी पूरी करने की कोशिश की जाएगी।
हालांकि यदि तीन महीने में भूमि स्वामित्व वितरण का काम पूरा नहीं हुआ तो आगे की व्यवस्था क्या होगी, इस पर अभी स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है।
कितना बढ़ेगा सरकारी खर्च?
सिर्फ होल्डिंग सेंटर में रह रहे 388 परिवारों को एकमुश्त 25 हजार रुपये देने पर लगभग 97 लाख रुपये खर्च होंगे।
तीन महीने तक 15 हजार रुपये मासिक किराया सहायता देने पर एक परिवार को कुल 45 हजार रुपये मिलेंगे। इस हिसाब से 388 परिवारों पर लगभग 1 करोड़ 74 लाख 60 हजार रुपये खर्च होंगे।
दोनों मदों को जोड़ें तो कुल राशि करीब 2 करोड़ 71 लाख 60 हजार रुपये पहुंचती है।
यह आंकड़ा केवल होल्डिंग सेंटर में रह रहे परिवारों का है। यदि अन्य विस्थापित और पात्र परिवारों को भी यही सुविधा दी गई तो कुल खर्च कई करोड़ रुपये और बढ़ सकता है।
क्या पहले स्थायी समाधान खोजा जा सकता था?
सरकार की योजना सामने आने के बाद एक बड़ा सवाल भी उठ रहा है। आलोचकों का कहना है कि यदि बस्तियां हटाने से पहले वास्तविक सुकुम्बासी परिवारों की पहचान कर दीर्घकालीन योजना बनाई जाती तो आज की स्थिति अलग हो सकती थी।
उनका तर्क है कि राहत और किराया सहायता पर खर्च होने वाली बड़ी रकम को व्यवस्थित आवास निर्माण, भूमि प्रबंधन और स्थायी पुनर्वास की दिशा में लगाया जा सकता था।
ऐसा होने पर बार-बार की अस्थायी व्यवस्था और उससे पैदा होने वाली सामाजिक समस्या से भी बचा जा सकता था।
सिर्फ लालपुर्जा से नहीं सुलझेगी चुनौती
नेपाल में सुकुम्बासी समस्या कई दशकों पुरानी है। इसे केवल जमीन का स्वामित्व पत्र देकर खत्म नहीं किया जा सकता, ऐसी राय भी लगातार सामने आ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि पुनर्वास के साथ आवास, सड़क, खाने का पानी, बिजली, शिक्षा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की व्यवस्था भी जरूरी होगी। तभी प्रभावित परिवारों का जीवन स्थिर हो सकेगा।
सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विस्थापित परिवारों को कब और कैसे स्थायी समाधान मिलेगा। लालपुर्जा वितरण की समयसीमा पूरी होगी या नहीं, इस पर भी सबकी नजर बनी हुई है।