वीरगंज से काठमांडू की ओर पैदल बढ़ रहे मीटरब्याज पीड़ितों से मिलने गृह मंत्री सुदन गुरुङ मंगलवार को बारा पहुंचे हैं। सरकार की कोशिश है कि निजगढ़ में ही पीड़ितों से सीधी बातचीत हो, उनकी मांग सुनी जाए और न्याय का भरोसा दिलाकर उन्हें घर लौटाया जा सके।
बारिश और तेज धूप के बीच कई दिनों से पैदल चल रहे इन लोगों की हालत खराब होने लगी है। कई पीड़ितों के पैरों में छाले पड़ चुके हैं। कुछ के पास बारिश से बचने के लिए छाता तक नहीं है।
अपनी परेशानी सरकार तक पहुंचाने के लिए वे इतनी लंबी यात्रा कर रहे हैं। ऐसे में गृह मंत्री का काठमांडू से निकलकर उनके पास पहुंचना अहम है। इससे पहले भी वे कभी माइतीघर, कभी वीर अस्पताल तो कभी होल्डिंग सेंटर पहुंचकर संकट में फंसे लोगों से मिलते रहे हैं।
लेकिन इस बार मामला केवल मुलाकात और आश्वासन तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
पीड़ित वर्षों से वही शिकायत लेकर सरकारी दफ्तरों, आयोगों और आंदोलन स्थलों के चक्कर काट रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने जितना कर्ज लिया था, उससे कई गुना रकम चुका दी। इसके बाद भी साहूकारों के कागज में उनका कर्ज खत्म नहीं हुआ। कई परिवार अपनी जमीन और घर तक गंवा चुके हैं।
रवि लामिछाने के समय भी काठमांडू आए थे पीड़ित
कुछ वर्ष पहले भी मीटरब्याज से परेशान लोग सरकार का ध्यान खींचने के लिए इसी तरह काठमांडू आए थे। उस समय रवि लामिछाने गृह मंत्री थे।
लंबे आंदोलन के बाद लामिछाने ने पीड़ितों को न्याय दिलाने का भरोसा दिया था। उन्हें चॉकलेट खिलाकर घर लौटाया गया। पीड़ित इस उम्मीद में वापस गए थे कि सरकार अब उनके मामलों की जांच करेगी और गलत तरीके से बनाए गए कर्ज के कागजों से छुटकारा मिलेगा।
इसके कुछ समय बाद सत्ता का समीकरण बदल गया और लामिछाने गृह मंत्री नहीं रहे। बाद में उन्हें सहकारी ठगी के मामले में गिरफ्तार किया गया।
अब वही मीटरब्याज पीड़ित दोबारा सड़क पर हैं। वे फिर वीरगंज से काठमांडू की ओर पैदल चल रहे हैं। इससे साफ है कि पहले दिए गए भरोसे से उनकी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
रास्वपा नेतृत्व वाली सरकार के सामने अब अपने पुराने वादे को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी है। खासकर पार्टी सभापति रवि लामिछाने को वह आश्वासन याद करना होगा, जो उन्होंने गृह मंत्री रहते हुए पीड़ितों को दिया था।
सरकार के पास इस समय केवल सहानुभूति दिखाने का मौका नहीं है। उसे ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे मीटरब्याज का यह जाल दोबारा किसी गरीब परिवार को बर्बाद न कर सके।
मीटरब्याज आखिर होता क्या है?
किसी व्यक्ति को जरूरत के समय पैसा उधार देना और उस पर कानून के दायरे में ब्याज लेना अपने आप में मीटरब्याज नहीं है।
समस्या तब शुरू होती है जब साहूकार किसी व्यक्ति की गरीबी, अशिक्षा या मजबूरी का फायदा उठाता है। वह असल में दी गई रकम से कई गुना अधिक राशि का कागज बनवा लेता है। खाली चेक या खाली कागज पर हस्ताक्षर करा लेता है। ब्याज को मूल रकम में जोड़कर फिर नया ब्याज लगाता है।
कर्ज लेने वाला पैसा चुकाता रहता है, लेकिन उसे रसीद नहीं दी जाती। बाद में साहूकार कहता है कि कोई रकम मिली ही नहीं।
कई मामलों में कर्ज के बदले घर या जमीन अपने नाम करा ली जाती है। कुछ जगहों पर कर्जदार और उसके परिवार को धमकाया जाता है। इसी तरह के लेनदेन को नेपाल के कानून में अनुचित लेनदेन कहा गया है। यह सामान्य आर्थिक विवाद नहीं, बल्कि आपराधिक मामला है।
इस जाल में अधिकतर ऐसे परिवार फंसते हैं जिनके पास अचानक आई जरूरत पूरी करने का दूसरा रास्ता नहीं होता।
घर में किसी का इलाज कराना हो, बच्चों की पढ़ाई का खर्च हो, खेती के लिए बीज और खाद खरीदनी हो या परिवार के किसी सदस्य को विदेश रोजगार के लिए भेजना हो—पैसे की जरूरत तुरंत पड़ती है।
बैंक से कर्ज लेने के लिए आय का प्रमाण, जमीन की जमानत और दूसरे कागजात मांगे जाते हैं। प्रक्रिया भी लंबी होती है। गरीब परिवार अक्सर स्थानीय साहूकार के पास जाने को मजबूर हो जाते हैं।
यहीं से शोषण शुरू होता है।
मान लीजिए किसी किसान ने एक लाख रुपये उधार लिए। साहूकार सुरक्षा के नाम पर दो या तीन लाख रुपये का तमसुक बनवा सकता है। किसान पढ़ा-लिखा नहीं है तो वह कागज की पूरी बात समझे बिना अंगूठा लगा देता है।
कुछ साहूकार खाली चेक, जमीन बेचने से जुड़े कागज या खाली स्टांप पेपर पर भी हस्ताक्षर करा लेते हैं।
कर्जदार हर महीने रकम देता रहता है। उसके पास भुगतान का कोई सबूत नहीं होता। कुछ समय बाद साहूकार पुराने कागज के आधार पर पूरी रकम मांगने लगता है।
कानून के मुताबिक बिना रकम दिए कर्ज का लिखत तैयार करना, दी गई वास्तविक रकम से अधिक राशि दर्ज करना और भुगतान की रसीद न देना अनुचित लेनदेन की श्रेणी में आता है।
एक लाख का कर्ज कैसे कई लाख बन जाता है?
मीटरब्याज की मार समझने के लिए एक साधारण उदाहरण काफी है।
किसी व्यक्ति ने एक लाख रुपये का कर्ज लिया। साहूकार ने हर महीने पांच प्रतिशत ब्याज तय कर दिया। इसका मतलब है कि कर्जदार को हर महीने पांच हजार रुपये ब्याज देना होगा।
एक साल में ब्याज की रकम 60 हजार रुपये हो जाएगी।
अगर कर्जदार यह रकम नहीं चुका पाया तो साहूकार 60 हजार रुपये को मूल रकम में जोड़ देता है। इसके बाद एक लाख 60 हजार रुपये का नया कागज बनाया जाता है और उसी रकम पर फिर से ब्याज शुरू हो जाता है।
इस तरह एक लाख रुपये का कर्ज कुछ वर्षों में कागज पर पांच या सात लाख रुपये तक पहुंच जाता है।
नेपाल की मुलुकी देवानी संहिता के अनुसार घर में किए गए निजी कर्ज के लिखत पर सालाना ब्याज मूल रकम के 10 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकता।
अपराध संहिता में मूल रकम से अधिक ब्याज वसूलने और ब्याज को मूल रकम में जोड़कर नया लिखत तैयार करने को भी अपराध माना गया है।
फिर भी जमीन पर स्थिति अलग दिखती है। गरीब परिवार कानूनी जानकारी के अभाव में वर्षों तक पैसे चुकाते रहते हैं। कई बार मूल रकम और उचित ब्याज से अधिक भुगतान करने के बाद भी उनका कर्ज खत्म नहीं होता।
इसके बाद आर्थिक परेशानी सामाजिक और मानसिक प्रताड़ना में बदल जाती है।
साहूकार घर पहुंचकर गाली दे सकता है। परिवार के सदस्यों को धमकाया जाता है। गांव में बेइज्जत करने या मारपीट की चेतावनी दी जाती है। घर और जमीन छोड़ने का दबाव भी बनाया जाता है।
कानून कर्ज वसूली के नाम पर धमकी, हिंसा, मानसिक दबाव और शोषण की अनुमति नहीं देता। अनुचित कर्ज के आधार पर किसी की अचल संपत्ति अपने नाम कराना भी अपराध है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं समस्या कितनी बड़ी है
मीटरब्याज का मामला कुछ परिवारों तक सीमित नहीं है।
अनुचित लेनदेन संबंधी जांच आयोग के अनुसार 2080 साल के असार महीने के अंत तक देशभर से करीब 24 हजार शिकायतें मिली थीं।
मधेश प्रदेश के आठ जिलों से ही 18 हजार 356 शिकायतें दर्ज हुईं। पश्चिम नवलपरासी में एक हजार 889 शिकायतें सामने आईं।
सबसे अधिक शिकायतें बारा जिले से आई थीं। यहां तीन हजार 322 पीड़ितों ने आवेदन दिया था।
आयोग ने शुरुआती करीब डेढ़ महीने में दो हजार शिकायतों को आपसी सहमति से सुलझाया था। इन मामलों में साहूकारों ने अपनी मांग में एक अरब 14 करोड़ रुपये से अधिक की रकम छोड़ने पर सहमति जताई।
इसी प्रक्रिया के दौरान 41 बीघा से अधिक जमीन भी कर्जदारों को वापस दिलाई गई थी।
ये आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल ब्याज की दर तक सीमित नहीं है। कई मामलों में हिसाब ही गलत बनाया गया। भुगतान स्वीकार नहीं किया गया। वास्तविक कर्ज से कई गुना रकम मांगी गई और जमीन पर कब्जा किया गया।
हर कर्ज माफ करना समाधान नहीं
यह समझना भी जरूरी है कि मीटरब्याज की समस्या का समाधान सभी निजी कर्जों को अपने आप माफ कर देना नहीं है।
किसी व्यक्ति ने वास्तव में एक लाख रुपये उधार लिए हैं तो प्रमाणित मूल रकम और कानून के अनुसार तय ब्याज चुकाने की जिम्मेदारी उसकी रहती है।
विवाद वहां है जहां एक लाख रुपये देकर पांच लाख रुपये का कागज बनवा लिया गया हो। जहां कर्जदार की ओर से चुकाई गई रकम को हिसाब में शामिल न किया गया हो। जहां झूठा बकाया दिखाकर अधिक कीमत वाली जमीन कब्जा कर ली गई हो।
सरकारी आयोग की मध्यस्थता में भी इसी आधार पर मामले सुलझाए गए। वास्तविक लेनदेन का हिसाब किया गया। कुछ लोगों ने बाकी वैध रकम चुकाई। कुछ का कर्ज पूरा माना गया और कई परिवारों को उनकी जमीन वापस मिली।
न्याय का मतलब किसी को मुफ्त पैसा दिलाना नहीं है।
न्याय यह है कि वास्तविक मूल रकम और कानूनी ब्याज का साफ हिसाब हो। गलत तरीके से वसूली गई रकम वापस कराई जाए। जबरन कब्जा की गई संपत्ति उसके असली मालिक को मिले।
कानून है, अब उसे लागू करने की जरूरत
मौजूदा कानूनी व्यवस्था में अनुचित लेनदेन करने वाले व्यक्ति को अपराध की गंभीरता के आधार पर सात साल तक जेल और 70 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है।
गलत लेनदेन के जरिए ली गई रकम या संपत्ति में से वास्तविक मूलधन और कानूनी ब्याज अलग करने का प्रावधान है। इसके बाद बची रकम या संपत्ति पीड़ित कर्जदार को लौटाई जा सकती है।
अनुचित लेनदेन के आधार पर अचल संपत्ति का किया गया हक हस्तांतरण भी रद्द हो सकता है।
कागज पर व्यवस्था मौजूद है। लेकिन पीड़ितों का बार-बार सड़क पर उतरना बताता है कि कानूनी राहत उन तक आसानी से नहीं पहुंच रही।
अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि सरकार उनकी समस्या सुनेगी।
हर तमसुक की जांच करनी होगी। खाली चेक और जबरन बनवाए गए कागजों की सच्चाई सामने लानी होगी। बैंक लेनदेन, भुगतान की तारीख और मालपोत कार्यालय के दस्तावेज देखने होंगे।
पीड़ित ने कितना पैसा लिया, कितना चुका दिया और साहूकार ने कितना अतिरिक्त वसूला—इसका अलग-अलग हिसाब निकालना होगा।
जहां जमीन कब्जा की गई है, वहां उसे वापस दिलाना होगा। जहां धमकी, जालसाजी या जबरन दस्तखत का मामला है, वहां दोषियों पर मुकदमा चलाना होगा।
गृह मंत्री सुदन गुरुङ का पीड़ितों तक पहुंचना एक जरूरी शुरुआत है। लेकिन इस यात्रा का असली मतलब तभी होगा जब निजगढ़ में हुई बातचीत के बाद मामलों पर काम भी शुरू हो।
मीटरब्याज पीड़ित इस बार केवल भरोसा लेकर घर नहीं लौटना चाहते। वे ऐसा न्याय चाहते हैं जो सरकारी बयान में नहीं, उनके कर्ज के कागज और जमीन के रिकॉर्ड में साफ दिखाई दे।