नेपाल में असार 15 का दिन किसानों के लिए साल के सबसे अहम दिनों में गिना जाता है। धान की रोपाई, कीचड़ में उतरकर सामूहिक श्रम, असारे लोकगीत और दही-चिउड़ा के पारंपरिक भोजन के साथ यह दिन पूरे देश में उत्सव की तरह मनाया जाता है। खेती-किसानी पर आधारित नेपाली समाज में यह सिर्फ कृषि कार्य का दिन नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत, संस्कृति और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक भी है।
सुबह से ही खेतों में किसान रोपाई में जुट जाते हैं। दिनभर की मेहनत के बाद दही-चिउड़ा खाने की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है। माना जाता है कि गर्म मौसम में यह भोजन शरीर को ठंडक देता है और काम के बाद ऊर्जा भी लौटाता है।
यह परंपरा अब केवल गांवों तक सीमित नहीं रही। शहरों में रहने वाले नेपाली भी असार 15 के अवसर पर दही-चिउड़ा खाकर इस सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव बनाए रखते हैं। नेपाली समाज में दही को शुभ माना जाता है और नई शुरुआत या किसी महत्वपूर्ण अवसर पर दही का सगुन खाने की परंपरा आज भी निभाई जाती है।
सेहत से भी जुड़ी है यह परंपरा
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार दही में मौजूद लाभकारी जीवाणु पाचन तंत्र को संतुलित रखने में मदद करते हैं। आयुर्वेद में भी भोजन के बाद मट्ठा या दही से बने पेय के सेवन को लाभदायक बताया गया है। समाज में यह विश्वास भी प्रचलित है कि दही और चिउड़ा का मेल पाचन संबंधी परेशानियों, खासकर दस्त जैसी स्थिति में भी उपयोगी हो सकता है।
राष्ट्रीय धान दिवस के रूप में मनाया जाता है असार 15
नेपाल सरकार ने विक्रम संवत 2061 के मंसिर 29 को असार 15 को राष्ट्रीय धान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद से वर्ष 2062 से हर साल इस दिन राष्ट्रीय धान दिवस आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य धान उत्पादन के महत्व को रेखांकित करना और युवाओं सहित आम लोगों को कृषि के प्रति आकर्षित करना है।
धान की रोपाई के दौरान गांवों में असारे भाका यानी पारंपरिक लोकगीत गूंजते हैं। खेतों में काम करते किसानों की हंसी, कीचड़ में खेलते लोग और सामूहिक श्रम का यह दृश्य कठिन मेहनत को उत्सव में बदल देता है। यही लोक परंपरा असार 15 को नेपाली पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है।
कम बारिश और खाद की चिंता
इस बार हालांकि कई इलाकों में पर्याप्त बारिश नहीं होने से धान रोपाई की रफ्तार उम्मीद के मुताबिक नहीं बढ़ सकी है। कई किसानों ने रासायनिक खाद की कमी की शिकायत भी की है। वहीं सरकार का कहना है कि आवश्यक मात्रा में उर्वरक का भंडार उपलब्ध है।
चुनौतियों के बावजूद असार 15 आज भी नेपाल में किसानों के सम्मान, कृषि उत्पादन और प्रकृति के साथ गहरे रिश्ते का प्रतीक बना हुआ है। देशभर में विभिन्न कार्यक्रमों के साथ यह दिन पारंपरिक उत्साह के बीच मनाया जा रहा है।