सरकार पर नरबहादुर विष्ट का हमला, राष्ट्रीय सभा में उठाए कई बड़े सवाल

Hindi News Desk
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सरकार पर नरबहादुर विष्ट का हमला, राष्ट्रीय सभा में उठाए कई बड़े सवाल

राष्ट्रीय सभा की सोमवार की बैठक में सरकार की कार्यशैली को लेकर तीखी राजनीतिक बहस देखने को मिली। नेकपा के सांसद नरबहादुर विष्ट ने सरकार पर सुशासन के दावे करने के बावजूद जनता की बुनियादी समस्याओं से ध्यान हटाने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सरकार प्रशासनिक अव्यवस्था और राजनीतिक हस्तक्षेप में अधिक उलझी हुई है।

विशेष समय में अपनी बात रखते हुए विष्ट ने शिक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों से लेकर स्कूलों तक की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करते हुए उन्होंने आरोप लगाया कि योग्यता और पारदर्शिता के बजाय प्रभाव और पहुंच को महत्व दिया जा रहा है।

प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय की कार्यशैली की आलोचना करते हुए विष्ट ने कहा कि संवैधानिक निकायों के प्रमुखों पर दबाव बनाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय की स्थिति की तुलना “हिटलर के गैस चैंबर” से की।

उन्होंने उस घटना का भी जिक्र किया, जिसमें सेना प्रमुख को प्रधानमंत्री से मुलाकात के लिए लंबे समय तक इंतजार करने के बाद लौटना पड़ा था। विष्ट ने कहा कि इस तरह की घटनाएं सरकार की प्रशासनिक शैली और निर्णय क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं।

महंगाई और जनजीवन के मुद्दे उठाए

विष्ट ने कहा कि सरकार लगातार सुशासन की बात कर रही है, लेकिन बाजार में महंगाई पर नियंत्रण नहीं है। किसानों को समय पर खाद और बीज नहीं मिल रहे हैं, जबकि छात्रों तक जरूरी पाठ्यपुस्तकें भी समय पर नहीं पहुंच पा रही हैं। उनका कहना था कि आम लोगों के दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर सरकार अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखा रही है।

सरकारी खर्च का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने मंत्रियों के सचिवालयों में बड़ी संख्या में सलाहकार नियुक्त किए जाने की चर्चाओं का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, सीमित सरकारी संसाधनों के बीच ऐसे फैसले जनता पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल सकते हैं।

सहकारी पीड़ितों और रास्वपा पर भी टिप्पणी

सांसद विष्ट ने सहकारी संस्थाओं के पीड़ितों को न्याय दिलाने के सवाल पर भी सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि आम लोगों की जमा पूंजी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए राज्य को प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

उन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) की संगठनात्मक व्यवस्था और सदस्यता प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। विष्ट ने दावा किया कि बच्चों को भी पार्टी का सदस्य बनाया गया है और इस मामले में संबंधित पक्ष से स्पष्ट जवाब देने की जरूरत है। साथ ही उन्होंने पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र और महाधिवेशन की प्रक्रिया पर भी कटाक्ष किया।

विदेश नीति और संविधान पर चिंता

विष्ट ने कहा कि नेपाल के कूटनीतिक संबंध भी कमजोर पड़ते दिखाई दे रहे हैं। पासपोर्ट से जुड़े विवादों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि प्रभावित हुई है और सरकार को ऐसे संवेदनशील मामलों में अधिक जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि संविधान पर विभिन्न स्तरों से दबाव बनाने की कोशिश हो रही है। ऐसे समय में इसकी रक्षा सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों की साझा जिम्मेदारी है।

अपने संबोधन के अंत में विष्ट ने कहा कि केवल सोशल मीडिया पर एक-दूसरे की आलोचना करने से देश आगे नहीं बढ़ेगा। उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों के समाधान के लिए राजनीतिक सहमति, संवाद और बेहतर कूटनीतिक समझ विकसित करने की जरूरत पर जोर दिया।

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