नेपाल की राजनीति में श्रम मंत्री रामजी यादव को लेकर सवाल लगातार तेज हो रहे हैं। सरकार में शामिल होने के करीब 78 दिन बाद भी उनके मंत्रालय के कामकाज को लेकर विपक्ष ही नहीं, बल्कि राजनीतिक हलकों और जनस्तर पर भी असंतोष देखने को मिल रहा है। अब उनकी अपनी पार्टी के केंद्रीय सदस्य के चुनाव में हार ने इस बहस को और गहरा कर दिया है।
खोज समाचार इससे पहले भी दो अलग-अलग रिपोर्ट और वीडियो के जरिए यह सवाल उठा चुका है कि विदेश में काम करने वाले नेपाली नागरिकों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले श्रम मंत्रालय में अपेक्षित गति और परिणाम क्यों नहीं दिख रहे हैं।
बालेन सरकार के गठन को अब 92 दिन पूरे हो चुके हैं। सरकार ने शुरुआती 100 दिनों में कई ठोस काम पूरे करने का वादा किया था। लेकिन कुछ मंत्रालयों की धीमी कार्यशैली पूरे मंत्रिमंडल के प्रदर्शन पर सवाल खड़े कर रही है। इन्हीं मंत्रालयों में श्रम मंत्रालय भी शामिल माना जा रहा है।
राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) की चुनावी सफलता में विदेशों में रह रहे नेपाली नागरिकों की बड़ी भूमिका मानी जाती है। ऐसे में विदेशी रोजगार से जुड़े मामलों की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्रालय से लोगों की उम्मीदें भी सबसे अधिक थीं।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि मंत्री रामजी यादव के कार्यकाल में अब तक आम लोगों को महसूस होने वाले बड़े सुधार नहीं दिखे। मंत्रालय की ओर से कुछ मैनपावर कंपनियों पर छापेमारी की कार्रवाई जरूर हुई, लेकिन उससे आगे कोई व्यापक सुधार नजर नहीं आया।
इसके उलट, इसी सरकार के मंत्री सुदन गुरुङ के मंत्रालय में पिछले तीन महीनों के दौरान कई बदलावों की चर्चा रही है। यही तुलना अब श्रम मंत्रालय के प्रदर्शन पर भी सवाल खड़े कर रही है।
पार्टी चुनाव में अकेले मंत्री रहे पराजित
रास्वपा के हालिया महाधिवेशन में यादव समेत आठ मंत्रियों ने पार्टी के केंद्रीय सदस्य पद के लिए चुनाव लड़ा था। इनमें सात मंत्री निर्वाचित हो गए, जबकि रामजी यादव को हार का सामना करना पड़ा।
कानूनी रूप से इस हार का उनके मंत्री पद पर कोई असर नहीं पड़ता। वह फागुन 21 के आम चुनाव में सप्तरी-2 सीट से जनमत पार्टी के अध्यक्ष सीके राउत को हराकर सांसद बने थे। इसलिए मंत्री बने रहने का उनका अधिकार बरकरार है।
लेकिन राजनीतिक हलकों में इसे नैतिक जिम्मेदारी के नजरिए से भी देखा जा रहा है।
पुराने राजनीतिक उदाहरण की भी चर्चा
नेपाल की राजनीति में इससे पहले भी ऐसा उदाहरण सामने आ चुका है।
साल 2021 में नेपाली कांग्रेस के 14वें महाधिवेशन में तत्कालीन रक्षा मंत्री मिनेन्द्र रिजाल महामंत्री पद का चुनाव हार गए थे। शुरुआती नतीजों से हार तय होने के बाद ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से इस्तीफे की घोषणा कर दी थी और अंतिम परिणाम आते ही प्रधानमंत्री शेरबहादुर देउवा को अपना इस्तीफा सौंप दिया था।
उस समय रिजाल ने कहा था कि पार्टी के भीतर घटते समर्थन के बाद मंत्री पद पर बने रहना उनकी नैतिकता के अनुरूप नहीं है।
हालांकि ऐसा कोई संवैधानिक या कानूनी प्रावधान नहीं है कि पार्टी का आंतरिक चुनाव हारने वाला मंत्री इस्तीफा दे। फिर भी इस पुराने उदाहरण के कारण रामजी यादव को लेकर नैतिक बहस तेज हो गई है।
श्रम मंत्रालय पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
नेपाल से हर दिन हजारों लोग रोजगार के लिए विदेश जाते हैं। लेकिन इसी प्रक्रिया में एजेंटों, मैनपावर कंपनियों और विभिन्न स्तरों पर ठगी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।
कई नेपाली नागरिक नेपाल से ही लाखों रुपये देकर विदेश जाने को मजबूर होते हैं। विदेश पहुंचने के बाद भी तय काम नहीं मिलना, वेतन न मिलना, महिलाओं के शोषण और वापसी के टिकट तक में ठगी जैसी समस्याएं लगातार सामने आती रही हैं।
आलोचकों का कहना है कि इतने संवेदनशील क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालने वाले मंत्रालय से तेज सुधार और प्रभावी व्यवस्था की उम्मीद थी, लेकिन अब तक वैसा परिणाम दिखाई नहीं दिया।
इसी वजह से खोज समाचार का मानना है कि यदि मंत्री रामजी यादव स्वयं नैतिक आधार पर फैसला नहीं लेते हैं, तो रास्वपा को श्रम मंत्रालय में ऐसे सांसद को जिम्मेदारी देनी चाहिए जो तेजी से काम कर सके और विदेशी रोजगार क्षेत्र में फैली अनियमितताओं पर प्रभावी कार्रवाई कर सके।
खोज समाचार पहले भी इस मुद्दे को लगातार उठाता रहा है। संपादकीय दृष्टिकोण से फिलहाल बागलुङ से निर्वाचित सांसद सोम शर्मा को श्रम मंत्रालय के लिए उपयुक्त विकल्प माना गया है। इस विषय पर खोज समाचार पहले ही विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित कर चुका है।