करीब आठ साल बाद निर्मला पन्त हत्या मामला एक बार फिर नेपाल में राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। कंचनपुर के पत्रकार खेम भंडारी को जिला और उच्च अदालत के फैसले के आधार पर गिरफ्तार किए जाने के बाद इस मामले को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। इसी बीच सरकार ने मामले की दोबारा जांच की दिशा में भी कदम बढ़ाए हैं।
नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक दानबहादुर कार्की के निर्देश पर 2082 चैत 14 गते एसएसपी कृष्ण पंगेनी के नेतृत्व में 15 सदस्यीय जांच समिति बनाई गई है। वहीं गृह मंत्री सुदन गुरुङ ने भी संकेत दिया है कि निर्मला पन्त मामले में आंतरिक स्तर पर जांच आगे बढ़ रही है।
ऐसे में सवाल फिर वही है—खेम भंडारी कौन हैं और निर्मला पन्त मामले में उनकी भूमिका क्या रही?
खेम भंडारी कौन हैं?
खेम भंडारी लंबे समय से पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं। वह कंचनपुर के महेन्द्रनगर से प्रकाशित होने वाले ‘मानसखण्ड दैनिक’ के संचालक और प्रधान संपादक हैं।
निर्मला पन्त मामले में उनका नाम इसलिए लगातार चर्चा में रहा क्योंकि उन्होंने अपनी खबरों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए। उनका कहना था कि पुलिस असली आरोपी तक पहुंचने के बजाय एक मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को फंसाकर मामले को बंद करना चाहती थी।
दूसरी ओर उनके आलोचकों का आरोप रहा कि उन्होंने बिना पर्याप्त सबूत के मामले को प्रभावशाली लोगों से जोड़कर भ्रम पैदा किया।
निर्मला पन्त हत्याकांड में क्या हुआ था?
साल 2075 के साउन 10 गते निर्मला पन्त होमवर्क करने के लिए घर से निकली थीं। अगले दिन उनका शव एक गन्ने के खेत में मिला।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बलात्कार के बाद गला दबाकर हत्या किए जाने की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की।
करीब तीन सप्ताह बाद, 2075 के भदौ 2 गते पुलिस ने दिलीपसिंह विष्ट को गिरफ्तार किया और दो दिन बाद उन्हें हत्या और बलात्कार के आरोपी के रूप में सार्वजनिक किया।
लेकिन यहीं से विवाद शुरू हो गया।
स्थानीय लोगों का कहना था कि दिलीपसिंह विष्ट मानसिक रूप से अस्वस्थ थे। इसी आधार पर खेम भंडारी ने लगातार सवाल उठाए कि कहीं किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बचाने के लिए उन्हें आरोपी तो नहीं बनाया गया।
उनकी रिपोर्टों के बाद कंचनपुर में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए और मामला पूरे नेपाल में चर्चा का विषय बन गया।
डीएनए रिपोर्ट ने बदल दी जांच की दिशा
पुलिस हिरासत में दिलीपसिंह विष्ट ने अपराध स्वीकार करने का बयान दिया था और पुलिस ने उसी आधार पर अपनी जांच लगभग पूरी कर ली थी।
लेकिन अदालत में मामला पहुंचने के बाद वैज्ञानिक जांच ने तस्वीर बदल दी।
निर्मला पन्त के शरीर से लिए गए वैजाइनल स्वैब से मिले डीएनए और दिलीपसिंह विष्ट के डीएनए का मिलान नहीं हुआ। रिपोर्ट पूरी तरह नकारात्मक आई।
इसके बाद पुलिस की पूरी जांच पर सवाल उठे और दिलीपसिंह विष्ट रिहा हो गए।
रिहाई के बाद उन्होंने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान दबाव और यातना देकर उनसे अपराध कबूल करवाया गया था।
खेम भंडारी पर मुकदमे क्यों दर्ज हुए?
मामले के दौरान खेम भंडारी ने अपनी रिपोर्टों में तत्कालीन कंचनपुर पुलिस प्रमुख एसपी डिल्लीराज विष्ट के बेटे किरणराज विष्ट का नाम भी जोड़ा। उनका आरोप था कि प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए जांच को गलत दिशा दी गई।
बाद में पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि दिलीपसिंह विष्ट और खेम भंडारी के बीच रिश्तेदारी थी। इसके बाद भंडारी पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने परिचित को बचाने के लिए बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाए।
इसके बाद उनके खिलाफ अलग-अलग मामले अदालत पहुंचे।
सबसे पहले अदालत की अवमानना का मामला दर्ज हुआ। अदालत ने उन्हें दोषी मानते हुए एक रुपये जुर्माना और एक घंटे की कैद की सजा सुनाई।
इसके बाद किरणराज विष्ट ने चरित्र हनन का मुकदमा दायर किया। उनका कहना था कि बिना किसी प्रमाण के उनका नाम हत्या मामले से जोड़ा गया।
2082 के जेठ महीने में कंचनपुर जिला अदालत ने खेम भंडारी को एक महीने की कैद, 10 हजार नेपाली रुपये जुर्माना और किरणराज विष्ट को एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया।
भंडारी ने इस फैसले को प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताते हुए उच्च अदालत दीपायल के महेन्द्रनगर इजलास में अपील की।
लेकिन 2082 चैत में उच्च अदालत ने जिला अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए सात दिन अतिरिक्त कैद और 2,100 रुपये का अतिरिक्त जुर्माना भी जोड़ दिया।
अब दोनों अदालतों के फैसलों के अनुसार उन्हें कुल एक महीना सात दिन की कैद, 12 हजार 100 रुपये जुर्माना और एक लाख रुपये क्षतिपूर्ति देनी होगी।
इसी फैसले को लागू करते हुए जिला प्रहरी कार्यालय कंचनपुर ने उन्हें गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद जेल भेज दिया।
उधर, निर्मला पन्त मामले को लेकर नई जांच समिति के गठन और राजनीतिक स्तर पर फिर से चर्चा शुरू होने के बाद एक बार फिर यह उम्मीद जगी है कि वर्षों से लंबित इस चर्चित मामले की जांच किसी ठोस निष्कर्ष तक पहुंच सकती है।