सुस्ता की आवाज़: सीमा पर बसे लोगों की उम्मीद अब सरकार से

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नेपाल के नवलपरासी जिले के सुस्ता क्षेत्र के लोग एक बार फिर अपनी समस्याओं को लेकर राजधानी पहुंचे हैं। उनकी मांग नई नहीं है। वे चाहते हैं कि राज्य उन्हें पूरी तरह नेपाली नागरिक के रूप में स्वीकार करे, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करे और वर्षों से चले आ रहे सीमा संबंधी सवालों का समाधान निकाले।

इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में कई तरह की राजनीतिक बहसें चल रही हैं। कोई पूछ रहा है कि पहले की सरकारों ने यह काम क्यों नहीं किया, तो कोई इसे किसी राजनीतिक दल से जोड़कर देख रहा है। लेकिन सीमा पर रहने वाले लोगों का कहना है कि उनकी समस्या किसी दल या सरकार से बड़ी है। यह सीधे नागरिक अधिकार और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का विषय है।

सीमा का सवाल राजनीति से बड़ा है

सुस्ता के लोगों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी जमीन, पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सीमावर्ती इलाके में रहने के कारण उन्हें कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

ऐसे में उनकी मांग है कि सरकार उन्हें सुरक्षा दे, नागरिकता से जुड़े मुद्दों का समाधान करे, भूमि स्वामित्व के दस्तावेज उपलब्ध कराए और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करे।

इसलिए इस विषय को किसी राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय राष्ट्रीय हित के नजरिए से समझने की जरूरत है।

अधिकांश सीमा तय, लेकिन सुस्ता और कालापानी अब भी विवाद में

नेपाल और भारत के बीच अधिकांश सीमा निर्धारण का काम पूरा हो चुका है। दोनों देशों की ओर से अलग-अलग समय पर यह कहा गया है कि करीब 97 प्रतिशत सीमा का निर्धारण हो चुका है।

हालांकि सुस्ता और कालापानी ऐसे प्रमुख क्षेत्र हैं, जहां सीमा विवाद अब भी बना हुआ है।

ये विवाद हाल के वर्षों में पैदा नहीं हुए। इनका इतिहास कई दशकों ही नहीं, बल्कि लगभग दो शताब्दियों तक फैला हुआ माना जाता है। ऐसे में इनके समाधान के लिए ऐतिहासिक दस्तावेजों, मानचित्रों, तथ्यों और गंभीर कूटनीतिक पहल की आवश्यकता है।

इसी वजह से लोगों की अपेक्षा है कि वर्तमान सरकार भी इस मुद्दे को प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाए।

सुस्ता के लोगों के संघर्ष को राजनीतिक रंग न दें

सुस्ता के निवासी वर्षों से सीमावर्ती क्षेत्र में रहकर अपनी जमीन और पहचान बचाने की कोशिश करते रहे हैं। राजधानी पहुंचकर उन्होंने अपनी समस्याओं को सरकार के सामने रखा है।

ऐसे में उनके आंदोलन को किसी दल से जोड़ना या उन्हें राजनीतिक टिप्पणी का विषय बनाना उचित नहीं माना जा रहा है।

सीमा पर रहने वाले नागरिक किसी भी देश की पहली सुरक्षा पंक्ति होते हैं। इसलिए उनकी समस्याएं केवल स्थानीय मुद्दे नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व का विषय हैं।

सरकार की जिम्मेदारी और नागरिकों की भूमिका

सीमा विवाद का समाधान करना किसी एक राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि राज्य की जिम्मेदारी है। सरकार चाहे किसी भी दल की हो, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह सीमावर्ती नागरिकों की समस्याओं का समाधान करने के लिए ठोस कदम उठाए।

साथ ही नागरिकों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे ऐसे राष्ट्रीय मुद्दों पर राजनीतिक विभाजन से ऊपर उठकर सोचें और समाधान की दिशा में सकारात्मक माहौल बनाएं।

सुस्ता के लोगों की मांग है कि सरकार उनकी नागरिक सुविधाओं और अधिकारों को सुनिश्चित करे तथा शेष सीमा विवादों के समाधान के लिए प्रभावी पहल करे।

सीमा पर रहने वाले नागरिकों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकार किसी एक दल का एजेंडा नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय हित से जुड़े ऐसे विषयों पर एकजुट सोच और जिम्मेदार पहल ही स्थायी समाधान का रास्ता बना सकती है।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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