काठमांडू में दलाई लामा जन्मदिन: नेपाल के लिए क्यों बना कूटनीतिक सिरदर्द

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काठमांडू में कुछ दिन पहले दलाई लामा का जन्मदिन मनाया गया। पहली नजर में यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम जैसा दिखता है, लेकिन नेपाल की राजनीति और कूटनीति में इसने नई बहस खड़ी कर दी है।

बहस इसलिए भी बढ़ी है, क्योंकि दलाई लामा और तिब्बत से जुड़े किसी भी कार्यक्रम को चीन बहुत संवेदनशील नजर से देखता है। नेपाल की स्थिति अलग है। एक तरफ चीन है, दूसरी तरफ भारत। बीच में नेपाल। ऐसे में तिब्बत से जुड़ी छोटी दिखने वाली गतिविधि भी कभी-कभी बड़े कूटनीतिक सवाल में बदल जाती है।

नेपाल लंबे समय से एक चीन नीति का समर्थन करता आया है। सरकार बार-बार कहती रही है कि नेपाली जमीन का इस्तेमाल किसी भी पड़ोसी देश के खिलाफ नहीं होने दिया जाएगा। लेकिन दलाई लामा के जन्मदिन जैसे कार्यक्रमों में अगर राजनीतिक संदेश, फ्री तिब्बत से जुड़े नारे या विदेशी कूटनीतिक मौजूदगी दिखती है, तो मामला सिर्फ धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं रहता।

नेपाल के लिए यह मामला इतना संवेदनशील क्यों है

नेपाल का भूगोल ही उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। उत्तर में चीन का तिब्बत क्षेत्र और दक्षिण में भारत। दोनों बड़े पड़ोसी। दोनों की अपनी सुरक्षा चिंता।

तिब्बत चीन के लिए केवल एक भूभाग नहीं है। चीन इसे अपनी राष्ट्रीय अखंडता से जोड़कर देखता है। ताइवान, हांगकांग और तिब्बत जैसे मुद्दों पर चीन की प्रतिक्रिया अक्सर सख्त रहती है। इसलिए दलाई लामा से जुड़ा कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम बीजिंग की नजर में राजनीतिक संकेत बन सकता है।

नेपाल में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थी भी रहते हैं। वे कई दशक पहले तिब्बत से भागकर नेपाल और भारत आए थे। नेपाल ने मानवीय आधार पर उन्हें जगह दी, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों को लेकर हमेशा सावधानी बरतने की कोशिश की है।

यही संतुलन सबसे कठिन है।

एक तरफ धार्मिक स्वतंत्रता और शरणार्थियों की मानवीय संवेदनशीलता है। दूसरी तरफ चीन के साथ संबंध, सीमा सुरक्षा और नेपाल की अपनी कूटनीतिक मजबूरी।

तिब्बत, दलाई लामा और चीन का पुराना विवाद

आज के तनाव को समझने के लिए तिब्बत का इतिहास देखना जरूरी है। करीब सात दशक पहले तिब्बत की अपनी अलग पहचान थी। वहां दलाई लामा को धार्मिक और राजनीतिक नेतृत्व के रूप में माना जाता था। तिब्बती समाज बौद्ध धर्म, मठों और अपनी सांस्कृतिक परंपराओं के इर्द-गिर्द चलता था।

1949 में चीन में माओ त्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सरकार बनी। इसके बाद तिब्बत पर चीन की पकड़ मजबूत करने की प्रक्रिया तेज हुई। 1950 में चीनी सेना ने तिब्बत की ओर सैन्य कार्रवाई शुरू की और पूर्वी तिब्बत के अहम क्षेत्र चाम्डो पर कब्जा कर लिया।

इसके बाद तिब्बती नेतृत्व पर दबाव बढ़ा। 1951 में तिब्बती प्रतिनिधियों ने बीजिंग में 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए। चीन इसे तिब्बत के शांतिपूर्ण एकीकरण का दस्तावेज मानता है। तिब्बती पक्ष के कई लोग इसे दबाव में किया गया समझौता बताते रहे हैं।

समझौते में तिब्बत की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का सम्मान करने की बात थी। लेकिन बाद के वर्षों में चीन पर तिब्बती मठों, धार्मिक संस्थाओं और सांस्कृतिक जीवन पर नियंत्रण बढ़ाने के आरोप लगते रहे।

1959 का विद्रोह और दलाई लामा का पलायन

1959 में तिब्बत में चीन के खिलाफ बड़ा विद्रोह हुआ। ल्हासा में हालात तेजी से बिगड़े। तिब्बती जनता के बीच यह डर फैल गया कि दलाई लामा को हिरासत में लिया जा सकता है या उनकी जान को खतरा हो सकता है।

इसके बाद 14वें दलाई लामा तिब्बत से बाहर निकले। वे हिमालयी रास्तों से होते हुए भारत पहुंचे। उनके साथ हजारों तिब्बती भी शरणार्थी बनकर नेपाल और भारत की ओर आए।

आज दलाई लामा भारत के हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में रहते हैं। वहीं से निर्वासित तिब्बती नेतृत्व की धार्मिक और राजनीतिक गतिविधियां चलती हैं।

यहीं से चीन की चिंता भी शुरू होती है। बीजिंग दलाई लामा को केवल धार्मिक नेता के रूप में नहीं देखता। चीन उन्हें तिब्बत से जुड़े अलगाववादी राजनीतिक अभियान का प्रतीक मानता है।

खम्पा विद्रोह ने नेपाल को क्या सिखाया

नेपाल के लिए तिब्बत का मुद्दा केवल विचारधारा या कूटनीति का मामला नहीं रहा। इसका सीधा सुरक्षा असर भी नेपाल ने झेला है।

1960 के दशक से लेकर 1974 तक खम्पा लड़ाकों ने चीन के खिलाफ सशस्त्र गतिविधियां चलाईं। इन लड़ाकों ने नेपाल के मुस्तांग क्षेत्र को अपने आधार क्षेत्र के रूप में इस्तेमाल किया। मुस्तांग की भौगोलिक स्थिति उनके लिए अनुकूल थी। ऊंचे पहाड़, कठिन रास्ते और तिब्बत से नजदीकी।

नेपाल की जमीन से चीन के खिलाफ छापामार कार्रवाई होना काठमांडू के लिए गंभीर समस्या बन गया। यह सिर्फ सुरक्षा चुनौती नहीं थी, बल्कि नेपाल की संप्रभुता पर भी सवाल था।

बाद में राजा वीरेन्द्र के शासनकाल में नेपाली सेना को मुस्तांग में कार्रवाई के लिए भेजा गया। 1974 में खम्पा गतिविधियों को खत्म कराया गया। लड़ाकों को आत्मसमर्पण करना पड़ा।

इस घटना ने नेपाल की विदेश नीति को एक साफ संदेश दिया था। नेपाल की जमीन किसी बाहरी शक्ति के रणनीतिक खेल की जगह नहीं बन सकती।

CIA, भारत और खम्पा गतिविधियों का संदर्भ

खम्पा विद्रोह को लेकर लंबे समय से यह दावा किया जाता रहा है कि इन लड़ाकों को अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA और भारत से मदद मिली थी। मदद में प्रशिक्षण, हथियार और आर्थिक सहयोग जैसे आरोप भी जुड़े रहे हैं।

उस दौर में शीत युद्ध का समय था। अमेरिका चीन और कम्युनिस्ट विस्तार को लेकर चिंतित था। भारत और चीन के रिश्ते भी 1962 के युद्ध के बाद बेहद तनावपूर्ण थे। ऐसे माहौल में तिब्बत का मुद्दा बड़ी शक्तियों के लिए रणनीतिक औजार बन गया।

यही वजह है कि तिब्बत को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई बार “Tibet Card” के रूप में देखा जाता है।

नेपाल इसी खेल के बीच फंसा था। और यही डर आज भी जिंदा है कि कहीं पुरानी गलती नए रूप में वापस न आ जाए।

दलाई लामा के जन्मदिन पर चीन की नजर क्यों रहती है

दलाई लामा का जन्मदिन तिब्बती समुदाय के लिए भावनात्मक और धार्मिक महत्व रखता है। दुनिया के कई देशों में तिब्बती समुदाय इसे मनाता है। लेकिन नेपाल में यह कार्यक्रम अलग अर्थ ले लेता है।

अगर समारोह निजी धार्मिक आयोजन तक रहे, तो बात अलग है। लेकिन अगर इसमें राजनीतिक नारे, फ्री तिब्बत से जुड़े संदेश या विदेशी कूटनीतिज्ञों की मौजूदगी दिखे, तो चीन इसे सुरक्षा संकेत के तौर पर पढ़ सकता है।

काठमांडू में दलाई लामा का जन्मदिन मनाया जाना इसलिए चर्चा में आया है। राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में सवाल उठ रहे हैं कि ऐसे कार्यक्रमों को लेकर सरकार की निगरानी और नीति कितनी स्पष्ट है।

नेपाल को यह भी देखना पड़ता है कि कहीं कोई समूह नेपाली जमीन का इस्तेमाल चीन के खिलाफ संदेश देने के लिए तो नहीं कर रहा।

भारत, अमेरिका और चीन के बीच नेपाल की मुश्किल

नेपाल पर बाहरी दबाव नया नहीं है। भारत का नेपाल में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रभाव रहा है। चीन ने पिछले वर्षों में नेपाल में अपनी उपस्थिति बढ़ाई है। अमेरिका की दिलचस्पी भी नेपाल में अलग-अलग परियोजनाओं और रणनीतिक स्तर पर बढ़ी है।

ऐसे माहौल में तिब्बत से जुड़ा कोई भी मुद्दा केवल नेपाल-चीन संबंध तक सीमित नहीं रहता। यह भारत, अमेरिका और चीन के बीच बड़ी रणनीतिक खींचतान से भी जुड़ सकता है।

चीन को यह आशंका रहती है कि उसके खिलाफ तिब्बत का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर नेपाल में ऐसे कार्यक्रम बार-बार राजनीतिक रंग लेने लगें, तो बीजिंग की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।

नेपाल के लिए चुनौती यही है कि वह किसी भी शक्ति का मैदान न बने।

Gen-Z आंदोलन और TOB को लेकर आरोप

नेपाल में 2082 साल के भदौ 23 और 24 को हुए Gen-Z आंदोलन के दौरान भी तिब्बती गतिविधियों को लेकर चर्चा तेज हुई थी। उस समय TOB यानी Tibetan Original Blood Group नाम के बाइकर समूह पर आंदोलन को भड़काने के आरोप लगे।

इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और राजनीतिक व्याख्या अलग विषय है। लेकिन इतना साफ है कि चीन ऐसे संकेतों को बहुत ध्यान से देखता है।

बीजिंग के लिए नेपाल सिर्फ पड़ोसी देश नहीं, बल्कि उसकी दक्षिणी सुरक्षा सीमा से जुड़ा संवेदनशील क्षेत्र है। इसलिए काठमांडू में दलाई लामा से जुड़ा कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम चीन की सुरक्षा दृष्टि में दर्ज होता है।

सरकार के सामने असली परीक्षा

नेपाल सरकार के सामने रास्ता आसान नहीं है। वह धार्मिक स्वतंत्रता को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकती। तिब्बती शरणार्थियों की मानवीय स्थिति को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन नेपाल चीन के साथ अपने संबंधों को भी जोखिम में नहीं डाल सकता।

इसीलिए नीति साफ और व्यवहार संतुलित होना चाहिए।

सरकार को यह संदेश देना होगा कि नेपाल में धार्मिक कार्यक्रम हो सकते हैं, लेकिन नेपाली जमीन से किसी पड़ोसी देश के खिलाफ राजनीतिक या सैन्य गतिविधि नहीं चलेगी। यह संदेश चीन को भी जाना चाहिए और उन समूहों को भी जो नेपाल को रणनीतिक मंच बनाना चाहते हैं।

देरी, अस्पष्टता या प्रशासनिक लापरवाही कभी-कभी बड़ी कूटनीतिक परेशानी बन जाती है।

छोटी घटना, बड़ा कूटनीतिक अर्थ

दलाई लामा के जन्मदिन का मामला केवल एक समारोह का सवाल नहीं है। यह नेपाल की विदेश नीति, सुरक्षा सोच और पड़ोसी संबंधों की परीक्षा है।

नेपाल को चीन से संबंध संभालने हैं। भारत से भी संतुलन रखना है। अमेरिका जैसी शक्ति के साथ भी संवाद जारी रखना है। और इन सबके बीच अपनी संप्रभुता बचाए रखनी है।

यही सबसे कठिन काम है।

खम्पा विद्रोह का इतिहास नेपाल को पहले ही चेतावनी दे चुका है। किसी बाहरी शक्ति की रणनीति में फंसना छोटे देशों के लिए महंगा पड़ सकता है। आज दुनिया में यूक्रेन जैसे उदाहरण भी सामने हैं, जहां बड़ी शक्तियों की टकराहट ने एक देश को भारी विनाश की ओर धकेल दिया।

नेपाल को ऐसी स्थिति से दूर रहना होगा।

काठमांडू में हुआ दलाई लामा जन्मदिन समारोह इसलिए सामान्य घटना नहीं माना जा रहा। यह नेपाल को फिर याद दिला रहा है कि भूराजनीतिक रूप से संवेदनशील देश में छोटे कार्यक्रम भी बड़े संदेश बन जाते हैं। और कभी-कभी वही संदेश कूटनीतिक संकट की शुरुआत कर सकते हैं।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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