राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) ने गण्डकी प्रदेश से निर्वाचित केंद्रीय सदस्यों की सूची में किया गया बदलाव वापस ले लिया है। पार्टी ने अब शोम शर्मा को ही केंद्रीय सदस्य बनाए रखने का अंतिम फैसला किया है।
चितवन में हुए महाधिवेशन के आंतरिक चुनाव में शर्मा गण्डकी प्रदेश से चौथे सबसे ज्यादा वोट पाने वाले उम्मीदवार थे। इसके बावजूद पार्टी ने बाद में उनका नाम हटाकर पूजा बास्तोला को सूची में शामिल कर दिया था।
इस फैसले पर सवाल उठे। चुनाव नतीजे और पार्टी की ओर से जारी सूची आपस में मेल नहीं खा रहे थे। आलोचना बढ़ने के बाद रास्वपा को अपना निर्णय फिर बदलना पड़ा।
खोज समाचार ने भी मतगणना से जुड़े वीडियो प्रमाण के आधार पर इस गड़बड़ी पर सवाल उठाया था। खबर सामने आने के बाद पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। लेकिन अब पार्टी के अपने फैसले ने साफ कर दिया है कि शुरुआती सूची पर उठे सवाल बेवजह नहीं थे।
चौथे स्थान पर थे शोम शर्मा
रास्वपा ने महाधिवेशन के आंतरिक चुनाव से 99 केंद्रीय सदस्यों का चयन किया था। चुनाव के लिए राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर अलग-अलग क्षेत्र बनाए गए थे।
प्रदेश कोटे से हर प्रदेश से पांच केंद्रीय सदस्य चुने जाने थे। इनमें कम से कम दो महिलाओं का होना जरूरी था।
गण्डकी में पवित्रा थापा 1,076 वोट लेकर पहले स्थान पर रहीं। मनिष खनाल को 1,052 और सागर भुसाल को 1,040 वोट मिले।
शोम शर्मा 993 वोट के साथ चौथे स्थान पर थे।
पहले चार उम्मीदवारों में केवल पवित्रा थापा महिला थीं। इसलिए पांचवीं सीट पर महिला उम्मीदवार का चयन जरूरी हो गया। पार्टी ने 800 वोट पाने वाली विष्णुकुमारी गुरुङ को निर्वाचित सूची में रखा।
यहीं से विवाद शुरू हुआ।
पूजा बास्तोला को 913 वोट मिले थे। यानी उनके वोट विष्णुकुमारी गुरुङ से 113 ज्यादा थे। इसके बावजूद उनका नाम सूची में नहीं आया।
बास्तोला ने सोशल मीडिया पर प्रेस नोट जारी कर कहा कि मतपरिणाम के आधार पर उन्हें निर्वाचित घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने फैसला नहीं सुधारे जाने पर सर्वोच्च अदालत जाने की चेतावनी भी दी थी।
महिला भागीदारी के नाम पर बदली गई सूची
पूजा बास्तोला की आपत्ति के बाद पार्टी ने केंद्रीय समिति में 51 प्रतिशत महिला भागीदारी सुनिश्चित करने का तर्क दिया। इसी आधार पर शोम शर्मा को हटाकर बास्तोला को केंद्रीय सदस्य बना दिया गया।
लेकिन इससे विवाद खत्म होने के बजाय और बढ़ गया।
सवाल था कि चुनाव में चौथे स्थान पर रहे और निर्वाचित हो चुके उम्मीदवार को बाद की प्रशासनिक गणना के आधार पर कैसे हटाया जा सकता है।
महिला प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना पार्टी की जिम्मेदारी थी। लेकिन इसकी कीमत केवल एक निर्वाचित उम्मीदवार से क्यों वसूली गई, इस पर पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह सवाल उठे।
आलोचकों ने इसे महाधिवेशन में पड़े वोटों का सम्मान न करने वाला फैसला बताया। दबाव बढ़ने के बाद रास्वपा ने फिर सूची बदली और शोम शर्मा की सदस्यता बहाल कर दी।
पूजा से कम वोट के बावजूद गुरुङ क्यों चुनी गईं
शोम शर्मा की वापसी के बाद भी एक सवाल बाकी रहा। पूजा बास्तोला को ज्यादा वोट मिलने के बावजूद विष्णुकुमारी गुरुङ को ही पांचवीं सदस्य क्यों रखा गया?
रास्वपा सांसद शोम शर्मा ने खोज समाचार से बातचीत में कहा कि यह फैसला पार्टी के क्लस्टर संबंधी नियम के आधार पर हुआ है।
उनके मुताबिक गण्डकी में पहले से चौथे स्थान तक रहे सभी उम्मीदवार खस आर्य समुदाय से थे। पार्टी के विधान में पांच सदस्यों के समूह में सामाजिक और जातीय प्रतिनिधित्व भी मिलाने की व्यवस्था है।
ऐसे में कम से कम एक सदस्य जनजाति समुदाय से लिया जाना जरूरी था।
विष्णुकुमारी गुरुङ महिला होने के साथ जनजाति क्लस्टर का भी प्रतिनिधित्व करती हैं। पार्टी का कहना है कि इसी वजह से पूजा बास्तोला से कम वोट पाने के बावजूद गुरुङ को पांचवीं सदस्य के रूप में चुना गया।
अब गण्डकी से पवित्रा थापा और विष्णुकुमारी गुरुङ महिला सदस्य हैं। गुरुङ के चयन से जनजाति क्लस्टर भी पूरा होता है। मनिष खनाल, सागर भुसाल और शोम शर्मा बाकी तीन केंद्रीय सदस्य बने रहेंगे।
बार-बार बदले फैसले ने भरोसे पर सवाल उठाए
मत, महिला प्रतिनिधित्व और सामाजिक क्लस्टर—पार्टी ने इन तीनों आधारों को शुरुआत में ही साफ कर दिया होता तो शायद विवाद इतना नहीं बढ़ता।
लेकिन पहले एक सूची जारी हुई। फिर शोम शर्मा को हटाया गया। अब उन्हें दोबारा सदस्य बनाया गया है।
इन बदलावों ने आंतरिक चुनाव की विश्वसनीयता और पार्टी नेतृत्व की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।
यह मामला राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए भी एक संदेश है। सार्वजनिक फैसलों पर तथ्य के आधार पर उठे हर सवाल को पार्टी विरोधी हमला मान लेना ठीक नहीं है।
सवालों का जवाब गुस्से या गाली से नहीं दिया जा सकता। उसके लिए स्पष्ट नियम, पारदर्शी प्रक्रिया और भरोसेमंद स्पष्टीकरण जरूरी होता है।
रास्वपा ने आखिरकार शोम शर्मा को केंद्रीय सदस्य बनाए रखने का फैसला कर लिया है। लेकिन इस पूरे विवाद ने यह दिखा दिया कि चुनावी नतीजों और समावेशी प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाते समय नियम केवल होना काफी नहीं है। उनका साफ और समान रूप से लागू होना भी जरूरी है।