काठमांडू के कीर्तिपुर स्थित होल्डिंग सेंटर में रह रहे सुकुम्बासी परिवारों की समस्या उठाने पहुंचे चार लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है। इनमें तीन जेनजी कार्यकर्ता और एक सुकुम्बासी नेता शामिल हैं।
पुलिस ने नरेन्द्र खड्का, माजिद अंसारी, नहेन्द्र खड्का और सरिश्मा थापा को होल्डिंग सेंटर से नियंत्रण में लिया। नरेन्द्र खुद को सुकुम्बासी समुदाय का नेता बताते हैं। बाकी तीनों को जेनजी अभियान से जुड़ा कार्यकर्ता बताया गया है।
इन लोगों पर सरकार के खिलाफ बोलने और होल्डिंग सेंटर में रह रहे परिवारों को भड़काने का आरोप लगाया गया है। हालांकि घटनास्थल से सामने आए वीडियो और कार्यकर्ताओं के बयानों ने पुलिस कार्रवाई पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
नागरिकों की समस्या सुनने गए लोगों को ही हिरासत में लेने से सरकार की कार्यशैली पर भी बहस शुरू हो गई है। खासकर इसलिए कि यही जेनजी समूह खुद को उस राजनीतिक बदलाव का हिस्सा बताता रहा है, जिसने मौजूदा सरकार के सत्ता में आने का रास्ता बनाया।
माजिद अंसारी के चेहरे पर चोट, मारपीट का आरोप
पुलिस कार्रवाई के बाद सार्वजनिक हुए एक वीडियो में माजिद अंसारी के चेहरे पर चोट के निशान दिखाई दे रहे हैं। उनके चेहरे पर खून की कुछ बूंदें भी नजर आती हैं।
अंसारी ने कहा कि उन्हें कीर्तिपुर के पुलिस बिट में रखा गया है। उन्होंने पुलिस पर मारपीट करने का आरोप लगाते हुए नाक और मुंह से खून आने की बात कही है।
जेनजी कार्यकर्ता अमित ऊर्जा का कहना है कि जेनजी मूवमेंट अलायंस के प्रतिनिधि होल्डिंग सेंटर में रह रहे परिवारों की हालत समझने पहुंचे थे। इसी दौरान पुलिस ने उनके साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की।
पुलिस की ओर से इन आरोपों पर विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है। लेकिन चोट लगे चेहरे का वीडियो फैलने के बाद सवाल सिर्फ गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहा। अब पुलिस के व्यवहार और बल प्रयोग को लेकर भी जवाब मांगा जा रहा है।
बागमती किनारे से हटाकर फिर नदी के पास बसाया
होल्डिंग सेंटर की मौजूदा हालत इस पूरे विवाद की जड़ में है।
सरकार ने बागमती नदी किनारे बनी सुकुम्बासी बस्ती को हटाकर परिवारों को कीर्तिपुर के राधास्वामी सत्संग भवन में रखा है। यह जगह भी नदी और खोला क्षेत्र के पास है। बरसात में यहां पानी भरने का खतरा नया नहीं है।
हाल की डुबान के बाद यह सवाल और गंभीर हो गया है कि नदी किनारे से हटाए गए लोगों को फिर ऐसी जगह क्यों भेजा गया, जहां हर साल बाढ़ का खतरा बना रहता है।
सरकार में इंजीनियर, योजनाकार और विशेषज्ञ होने के बावजूद स्थानांतरण से पहले इस जोखिम का आकलन क्यों नहीं किया गया? यह सवाल अब प्रभावित परिवार ही नहीं, आम नागरिक भी पूछ रहे हैं।
प्रधानमंत्री ने संसद में कहा था कि सुकुम्बासी बस्तियां हर साल डूबती हैं, जिससे जान-माल का नुकसान होता है। उनके मुताबिक बरसात से पहले परिवारों को उनके हित में हटाया गया।
लेकिन बागमती का पानी कीर्तिपुर के होल्डिंग सेंटर तक पहुंच सकता है, यह बात योजना बनाते समय क्यों नहीं सोची गई?
एक असुरक्षित किनारे से उठाकर दूसरे जोखिम वाले इलाके में रख देना पुनर्वास नहीं माना जा सकता। खासकर तब, जब वहां रहने के लिए जरूरी बुनियादी व्यवस्था भी पूरी न हो।
न खाना पर्याप्त, न पानी और बिजली की व्यवस्था
बस्ती पर डोजर चलाने से पहले सरकार के पास स्पष्ट पुनर्वास योजना होनी चाहिए थी। जिन परिवारों के घर तोड़े गए, उनके भोजन, पानी, रहने की जगह, इलाज और सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार की थी।
लेकिन होल्डिंग सेंटर में रह रहे परिवार लगातार अव्यवस्था की शिकायत कर रहे हैं।
वहां पर्याप्त खाना और पीने का पानी नहीं है। बिजली की समस्या बनी हुई है। साफ-सफाई और सुरक्षा का इंतजाम भी कमजोर बताया जा रहा है। छोटे बच्चों की पढ़ाई रुक गई है।
घर खो चुके लोग अब एक ऐसी जगह रहने को मजबूर हैं, जहां उन्हें यह तक पता नहीं कि आगे उनका क्या होगा।
ऐसे हालात में गुस्सा होना अस्वाभाविक नहीं है। अपना घर टूटते देखने, बच्चों की पढ़ाई छूटने और रोजमर्रा की जिंदगी बिखर जाने के बाद कोई परिवार चुप कैसे रह सकता है?
लेकिन सरकार और पुलिस का ध्यान शिकायतें सुनने से अधिक इस बात पर दिखाई दे रहा है कि वहां कौन गया, किसने सरकार के खिलाफ बोला और किसने प्रभावित लोगों की आवाज रिकॉर्ड की।
यही इस मामले का सबसे परेशान करने वाला हिस्सा है।
समस्या उठाने वालों पर ही कार्रवाई क्यों?
हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे प्रभावित परिवारों की स्थिति समझने और उनकी बात बाहर लाने पहुंचे थे। पुलिस का आरोप है कि उन्होंने सुकुम्बासी समुदाय को उकसाने की कोशिश की।
यहां सरकार को साफ करना होगा कि किसी नागरिक का अपनी परेशानी बताना या सरकार से सवाल करना उकसावा कैसे हो गया।
जिन लोगों का घर तोड़ा गया है, उन्हें मीडिया के सामने रोने, नाराजगी जताने और अपनी समस्या रखने का अधिकार है। उनकी आवाज रोकने से न तो पुनर्वास पूरा होगा और न होल्डिंग सेंटर की हालत सुधरेगी।
नेपाल की राजनीति में नेताओं के तीखे और कई बार हिंसक संकेत देने वाले बयान नई बात नहीं हैं। सत्ता और विपक्ष के बड़े नेता सार्वजनिक मंचों से कठोर भाषा बोलते रहे हैं।
फिर एक बेघर नागरिक के गुस्से में दिए गए बयान को गिरफ्तारी का आधार क्यों बनाया जा रहा है? सरकार को इस फर्क का जवाब देना होगा।
कानून लागू करना पुलिस का काम है। मगर कानून का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए होने लगे तो सरकार की नीयत पर सवाल उठना तय है।
जनता का गुस्सा केवल कीर्तिपुर तक सीमित नहीं
सरकार के सामने सिर्फ सुकुम्बासी पुनर्वास का मुद्दा नहीं है। असार खत्म होने को है, लेकिन कई किसान खेत में डालने के लिए खाद नहीं पा रहे हैं।
सिंचाई के लिए मोटर चलाने भर का वोल्टेज कई जगह नहीं मिल रहा। बाजार में रोजमर्रा की चीजें लगातार महंगी हो रही हैं। आम परिवार का खर्च बढ़ा है, आमदनी नहीं।
सरकार बने तीन महीने के भीतर करीब एक खरब रुपये कर्ज बढ़ने का सवाल भी उठ रहा है। प्रधानमंत्री के आसपास के लोगों के भाई-बहनों और रिश्तेदारों को सरकारी नियुक्तियां दिए जाने के आरोपों ने भी सरकार की छवि पर असर डाला है।
मंत्रियों के सौ दिन पूरे होने के बाद भी जमीन पर काम की रफ्तार बेहद धीमी दिखाई देती है।
ऐसे माहौल में नागरिकों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए किसी बाहरी व्यक्ति की जरूरत नहीं पड़ती। सरकार के अपने फैसले, अधूरी तैयारी और जवाबदेही की कमी ही नाराजगी बढ़ाने के लिए काफी हैं।
सत्ता में बैठे लोगों को यह भी समझना होगा कि सरकारी गाड़ी कुछ समय के लिए रोके जाने पर उन्हें जितना गुस्सा आता है, उससे कहीं अधिक पीड़ा उस परिवार को होगी जिसका घर तोड़ दिया गया और बच्चे की पढ़ाई बंद हो गई।
गिरफ्तारी नहीं, व्यवस्था सुधारने की जरूरत
कीर्तिपुर की घटना में सबसे जरूरी सवाल यही है कि सरकार अपनी गलती सुधारना चाहती है या सवाल उठाने वालों को चुप कराना।
होल्डिंग सेंटर डूब रहा है। परिवारों के पास पर्याप्त भोजन, पानी और सुरक्षित रहने की जगह नहीं है। बच्चे स्कूल से बाहर हैं। भविष्य को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं है।
इन मुद्दों का जवाब गिरफ्तारी नहीं हो सकती।
सरकार को तत्काल होल्डिंग सेंटर की सुरक्षा जांच करानी चाहिए। प्रभावित परिवारों के लिए सुरक्षित आवास, भोजन, स्वास्थ्य सेवा, साफ पानी और बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था करनी होगी। पुलिस कार्रवाई और कथित मारपीट की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है।
कुछ समर्थकों की लगातार तारीफ से कोई सरकार सफल नहीं हो जाती। असली परीक्षा तब होती है, जब सबसे कमजोर नागरिक न्याय और मदद मांगने उसके सामने खड़ा होता है।
कीर्तिपुर में चार लोगों की हिरासत ने सरकार के सामने सीधा सवाल रख दिया है—वह नागरिकों की समस्या हल करेगी या समस्या बताने वालों को ही पकड़ती रहेगी?
सरकार सख्ती कर सकती है, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्ता की ताकत और नागरिकों पर अत्याचार एक बात नहीं है। हद पार होने पर नुकसान आखिर सरकार का ही होता है।