नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी विज्ञापन केवल सरकारी मीडिया को देने का फैसला रद्द कर दिया है। अदालत के आदेश के बाद निजी अखबार, रेडियो, टेलीविजन और ऑनलाइन मीडिया भी सरकारी विज्ञापन और सार्वजनिक सूचनाएं हासिल कर सकेंगे।
न्यायाधीश शारंगा सुवेदी और नृपध्वज निरौला की संयुक्त पीठ ने मंगलवार को प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय के सर्कुलर के खिलाफ उत्प्रेषण आदेश जारी किया।
इस फैसले का असर संघीय सरकार तक सीमित नहीं रहेगा। प्रदेश सरकार, स्थानीय निकाय और सार्वजनिक कोष से चलने वाली संस्थाएं भी अब निजी मीडिया में विज्ञापन और सूचनाएं प्रकाशित या प्रसारित कर सकेंगी।
अदालत के फैसले का पूरा पाठ अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। विस्तृत आदेश तैयार हो चुका है और दो दिनों के भीतर जारी किए जाने की जानकारी दी गई है। पूरा फैसला आने के बाद यह साफ होगा कि सरकारी निर्णय किन कानूनी और संवैधानिक आधारों पर रद्द किया गया।
सरकारी मीडिया को ही विज्ञापन देने का था आदेश
प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय ने 2082 चैत्र 18 को सचिव स्तर से फैसला कर एक सर्कुलर जारी किया था।
इसमें नेपाल सरकार, प्रदेश सरकार, स्थानीय निकाय, उनके अधीन आने वाले कार्यालयों और सार्वजनिक धन इस्तेमाल करने वाली संस्थाओं को अपने विज्ञापन और सूचनाएं सरकारी स्वामित्व वाले मीडिया में ही देने को कहा गया था।
सर्कुलर के मुताबिक विज्ञापन गोरखापत्र संस्थान, रेडियो नेपाल, नेपाल टेलीविजन और दूसरे सरकारी मीडिया संस्थानों के जरिए ही जारी किए जाने थे।
इससे लंबे समय से सरकारी विज्ञापन प्रकाशित और प्रसारित करते आ रहे निजी मीडिया संस्थान अचानक व्यवस्था से बाहर हो गए थे। सबसे ज्यादा चिंता छोटे और मध्यम मीडिया संस्थानों ने जताई थी, जिनकी आय का बड़ा हिस्सा सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर है।
फैसले के पांच दिन बाद अदालत पहुंचा मामला
सरकार के सर्कुलर के पांच दिन बाद, चैत्र 23 को नेपाल मीडिया सोसाइटी की ओर से अधिवक्ता अनंतराज लुइँटेल ने सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर की थी।
रिट में कहा गया था कि निजी मीडिया को सरकारी विज्ञापन से अलग करना केवल आर्थिक फैसला नहीं है। इससे स्वतंत्र मीडिया को कमजोर करने और प्रेस की आजादी को सीमित करने का खतरा पैदा होता है।
याचिकाकर्ता ने सरकारी निर्णय और सर्कुलर को रद्द करने की मांग की थी। साथ ही सरकार को ऐसे कदम उठाने से रोकने के लिए निषेधाज्ञा और परमादेश जारी करने का अनुरोध भी किया गया था।
मामले में अंतिम बहस असार 22 और 23 को हुई। बहस पूरी होने के करीब एक सप्ताह बाद अदालत ने फैसला सुनाया।
विज्ञापन पर एकाधिकार के खिलाफ दी गई दलील
याचिकाकर्ता पक्ष के वकीलों ने अदालत में कहा कि सरकारी विज्ञापन किसी कार्यालय की इच्छा से बांटी जाने वाली सुविधा नहीं है। यह सार्वजनिक धन से जुड़ा मामला है, इसलिए इसका वितरण कानून, पारदर्शिता और समान व्यवहार के आधार पर होना चाहिए।
उनका तर्क था कि निजी मीडिया को अचानक विज्ञापन से वंचित करना आर्थिक नाकेबंदी जैसा कदम है। विज्ञापन कानून और नियमावली में समानुपातिक वितरण की व्यवस्था होने के बावजूद सरकार कुछ चुने हुए मीडिया संस्थानों को ही विज्ञापन नहीं दे सकती।
बहस के दौरान विज्ञापन बोर्ड के अधिकार क्षेत्र का सवाल भी उठाया गया। यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय के सर्कुलर के जरिए प्रदेश और स्थानीय सरकारों के खर्च तथा निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप किया गया।
सरकारी पक्ष ने फैसले का बचाव करते हुए कहा था कि विज्ञापन वितरण में होने वाली रकम की हेराफेरी, अपारदर्शी कारोबार और भ्रष्टाचार रोकने के लिए यह व्यवस्था लाई गई थी।
सरकार की ओर से यह दलील भी दी गई कि निजी मीडिया के लिए अधिक व्यवस्थित और अधिकार आधारित नई नीति तैयार की जा रही है।
दोनों पक्षों से वरिष्ठ वकीलों ने की बहस
नेपाल मीडिया सोसाइटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सतिसकृष्ण खरेल, रमेश बडाल, ललितबहादुर बस्नेत और दिनेश त्रिपाठी ने बहस की।
अधिवक्ता अनंतराज लुइँटेल, विकास भट्टराई, कीर्तिनाथ शर्मा पौडेल, विशाल थापा, दुर्वाशा लुइँटेल, रामप्रसाद पुडासैनी, डॉ. बालकृष्ण चापागाईं और डॉ. प्रेमराज सिलवाल समेत अन्य कानून व्यवसायी भी सुनवाई में शामिल हुए।
सरकार की ओर से महान्यायाधिवक्ता नारायणदत्त कँडेल और नायब महान्यायाधिवक्ता उद्धवप्रसाद पुडासैनी ने पक्ष रखा।
निजी मीडिया को मिली तत्काल राहत
रिट दायर करने वाले अधिवक्ता अनंतराज लुइँटेल ने फैसले को निजी मीडिया के साथ हुए भेदभाव का अंत बताया है।
उनके मुताबिक सरकार का असंवैधानिक फैसला अदालत से सुधारा जाना पूरे मीडिया क्षेत्र के लिए अहम उपलब्धि है। इससे राज्य के निकायों को भविष्य में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े फैसले लेते समय संवैधानिक सीमाओं का ध्यान रखना होगा।
हालांकि रिट में मांगे गए परमादेश और दूसरे आदेशों पर अदालत ने क्या कहा है, इसकी जानकारी पूरा फैसला आने के बाद ही मिलेगी।
सड़क पर विरोध के बाद शुरू हुई थी कानूनी लड़ाई
सरकार की एकद्वार विज्ञापन नीति के खिलाफ पत्रकारों और मीडिया संगठनों ने लगातार विरोध किया था।
नेपाल पत्रकार महासंघ ने इसे प्रेस की आजादी और निजी मीडिया की आर्थिक नींव पर हमला बताते हुए देशव्यापी आंदोलन चलाया। महासंघ ने सभी 77 जिलों के प्रशासन कार्यालयों के सामने धरना दिया और ज्ञापन भी सौंपे।
कई मीडिया संस्थानों ने संपादकीय, पहले पन्ने और सोशल मीडिया के जरिए सरकारी फैसले का विरोध किया था।
मीडिया एलायंस नेपाल, नेपाल मीडिया सोसाइटी और विज्ञापन संघ नेपाल समेत अन्य संगठनों ने कहा था कि सरकारी मीडिया को विज्ञापन का एकाधिकार देने से व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा, स्वतंत्र पत्रकारिता और नागरिकों के सूचना पाने के अधिकार पर असर पड़ेगा।
इन संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश का स्वागत किया है।
अब पारदर्शिता के साथ बराबरी की चुनौती
अदालत के आदेश से निजी मीडिया को सरकारी विज्ञापन देने में लगी रोक हट गई है। लेकिन विज्ञापन किस प्रक्रिया, मापदंड और अनुपात में बांटे जाएंगे, यह संबंधित कानून, नियमावली और फैसले के पूरे पाठ से और साफ होगा।
यह विवाद सिर्फ विज्ञापन से होने वाली कमाई का नहीं था।
बड़ा सवाल यह था कि क्या राज्य सार्वजनिक धन बांटते समय सरकारी और निजी मीडिया के बीच भेदभाव कर सकता है। क्या आर्थिक फैसले के जरिए स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव बनाया जा सकता है। और सरकारी सूचना आम लोगों तक पहुंचाने के लिए किस तरह की व्यवस्था होनी चाहिए।
इसी बीच सरकार ने विज्ञापन बाजार में अपारदर्शी लेनदेन, छिपे कमीशन और वित्तीय गड़बड़ी रोकने के उद्देश्य से ‘राष्ट्रीय विज्ञापन नीति, 2083’ जारी की है।
नीति में विज्ञापन से जुड़े वित्तीय कारोबार की जानकारी सार्वजनिक करने, राष्ट्रीय विज्ञापन सूचना बैंक बनाने और डिजिटल विज्ञापन तथा प्रायोजित सामग्री को नियमों के दायरे में लाने की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
अब सरकार के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। सार्वजनिक खर्च में पारदर्शिता भी कायम करनी होगी और मीडिया संस्थानों के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा तथा समान व्यवहार भी सुनिश्चित करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश ने फिलहाल इतना साफ कर दिया है कि व्यवस्था सुधारने के नाम पर प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कमजोर नहीं किया जा सकता।