सुनसरी घटना पर संसद गरमाई, सरकार पर नैतिक दबाव
सुनसरी के कप्तानगंज में हुई हिंसक घटना अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है। एक व्यक्ति की मौत और कई लोगों के घायल होने के बाद यह मुद्दा संघीय संसद तक पहुंच गया है। प्रतिनिधि सभा की बैठक में प्रमुख विपक्षी दल नेकपा (एमाले) और राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) ने सरकार की भूमिका, पुलिस कार्रवाई और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई।
सरकार की जवाबदेही पर विपक्ष के सवाल
करीब 14 दिन बाद हुई प्रतिनिधि सभा की बैठक में एमाले संसदीय दल की उपनेता पद्मा अर्याल ने कहा कि सुनसरी की घटना राज्य की शांति और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। उनका आरोप था कि सरकार कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफल रही है।
उन्होंने पुराने एक मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि जब अतीत में काठमांडू में गोलीबारी हुई थी, तब तत्कालीन सरकार से नैतिक और राजनीतिक जिम्मेदारी तय करने की मांग की गई थी। ऐसे में अब सुनसरी में एक नागरिक की मौत होने पर वर्तमान प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
अर्याल ने यह भी कहा कि देश में कानून-व्यवस्था लगातार कमजोर होती दिख रही है और हिंसक हालात को नियंत्रित करने में राज्य प्रभावी ढंग से सामने नहीं आ पाया।
राप्रपा ने पूछा- गोली चलाने का आदेश किसने दिया?
राप्रपा सांसद खुश्बु ओली ने बोलबम धार्मिक यात्रा के दौरान हुई हिंसा को लेकर सरकार से स्पष्ट और भरोसेमंद जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की।
उन्होंने कहा कि पुलिस की ओर से गोली चलने के मामले में सरकार, जिला प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों के अलग-अलग बयान सामने आए हैं। इससे लोगों के बीच भ्रम और अविश्वास बढ़ा है।
ओली ने कहा कि प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के जरिए पुलिस फायरिंग की बात स्वीकार की थी, लेकिन अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि गोली चलाने का आदेश किसने दिया। उनके मुताबिक स्थानीय प्रशासन और पुलिस के अलग-अलग दावों से घटना की वास्तविक तस्वीर अभी भी स्पष्ट नहीं है।
उन्होंने इस पूरे मामले की निष्पक्ष और त्वरित जांच के लिए उच्चस्तरीय आयोग गठित करने की मांग की। साथ ही कहा कि ओमप्रकाश मेहता की मौत और अन्य लोगों के घायल होने की घटना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है और पीड़ित परिवार को न्याय मिलना चाहिए।
धार्मिक तनाव पर संवाद की जरूरत
खुश्बु ओली ने कहा कि प्रशासन यदि धार्मिक तनाव से निपटने के लिए केवल ध्वनि नियंत्रण जैसे उपायों पर जोर देता है तो इससे मूल समस्या का समाधान नहीं होगा।
उनका कहना था कि यदि ध्वनि संबंधी कोई नियम बनाया जाता है तो वह सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। किसी एक समुदाय को अलग तरीके से देखने से सामाजिक अविश्वास और तनाव बढ़ सकता है।
उन्होंने सरकार का ध्यान धार्मिक सहिष्णुता, धर्मांतरण, सीमा पार से होने वाली अवैध आवाजाही और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों की ओर भी दिलाया। उनका कहना था कि तराई-मधेश में समय-समय पर सामने आने वाले धार्मिक तनाव का समाधान केवल सुरक्षा बलों की तैनाती या निषेधाज्ञा से संभव नहीं है।
ओली ने सुझाव दिया कि स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दलों, धार्मिक नेताओं और विभिन्न समुदायों के बीच नियमित संवाद की स्थायी व्यवस्था बनाई जाए, ताकि विवाद बढ़ने से पहले ही समाधान का रास्ता निकाला जा सके।
संसद में उठे सवालों ने साफ कर दिया है कि सुनसरी की घटना अब सिर्फ एक स्थानीय हिंसक घटना नहीं मानी जा रही। विपक्ष सरकार की जवाबदेही, पुलिस के बल प्रयोग, धार्मिक सद्भाव और लोगों के भरोसे से जुड़े पहलुओं पर स्पष्ट जवाब चाहता है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार जांच, जिम्मेदारी तय करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाती है।
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