सहकारी ठगी मामलों के लिए समर्पित अदालत की मांग
सहकारी ठगी के मामलों में वर्षों तक अदालतों में सुनवाई लंबी खिंचने से हजारों जमाकर्ताओं को अपने पैसे और न्याय, दोनों के लिए इंतजार करना पड़ता है। अब नेपाल सरकार ऐसे मामलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने की दिशा में कदम बढ़ा रही है।
इसी पहल के तहत भूमि व्यवस्था, सहकारी तथा गरीबी निवारण मंत्रालय ने सहकारी अपराध से जुड़े मामलों का बोझ उठाने वाली जिला अदालतों में समर्पित पीठ (डेडिकेटेड बेंच) गठित करने की सिफारिश करते हुए अपनी अध्ययन रिपोर्ट सर्वोच्च अदालत को सौंप दी है।
मंत्री प्रतिभा रावल ने मंत्रालय की ओर से गठित अध्ययन कार्यदल के सदस्यों के साथ प्रधान न्यायाधीश डॉ. मनोज शर्मा को यह रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया है कि सहकारी ठगी के मामलों का तेजी से निपटारा सुनिश्चित करने के लिए जरूरत के अनुसार विशेष पीठ संचालित की जानी चाहिए।
सर्वोच्च अदालत के निर्देश के बाद हुआ अध्ययन
यह अध्ययन सर्वोच्च अदालत के 11 माघ 2082 (नेपाली संवत) को दिए गए निर्देशात्मक आदेश के बाद किया गया। अदालत ने कहा था कि जिन जिला अदालतों में सहकारी अपराध से जुड़े मामलों का दबाव अधिक है, वहां समर्पित पीठ की जरूरत है या नहीं, इसका अध्ययन कर आवश्यक कदम उठाए जाएं।
इसके बाद मंत्रालय ने एक कार्यदल बनाकर स्थिति का अध्ययन कराया।
सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, भरोसे पर भी असर
कार्यदल की रिपोर्ट में सहकारी ठगी को सामान्य वित्तीय धोखाधड़ी से अलग प्रकृति का अपराध बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे मामलों का असर केवल हजारों बचतकर्ताओं की जमा पूंजी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सहकारी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और पूरे वित्तीय तंत्र की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
इसी वजह से इन मामलों की न्यायिक सुनवाई को विशेष प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है।
देरी से बढ़ती हैं पीड़ितों की मुश्किलें
रिपोर्ट में कहा गया है कि जब मामले लंबे समय तक अदालतों में लंबित रहते हैं तो पीड़ितों के लिए अपनी जमा राशि वापस पाने की प्रक्रिया और कठिन हो जाती है। न्याय मिलने में देरी होती है, जबकि कानूनी प्रक्रिया लंबी खिंचने का लाभ आरोपियों को मिलने का भी खतरा रहता है।
कार्यदल का निष्कर्ष है कि समर्पित पीठ की व्यवस्था लागू होने से मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, सहकारी क्षेत्र में लोगों का भरोसा दोबारा मजबूत होगा और वित्तीय सुशासन को भी बल मिलेगा।
अब इस रिपोर्ट पर सर्वोच्च अदालत विचार करेगी। यदि इसकी सिफारिशें लागू होती हैं तो सहकारी ठगी के मामलों की सुनवाई को अधिक व्यवस्थित और तेज बनाने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।
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