मधेश केंद्रित समेत कई दलों ने बनाया ‘अग्रगामी मोर्चा’
पिछले चुनाव के बाद नए राजनीतिक समीकरण की तलाश में जुटे मधेश केंद्रित दलों और दूसरे छोटे राजनीतिक समूहों ने अब एक साझा मोर्चा बनाया है। शनिवार को काठमांडू में ‘अग्रगामी मोर्चा’ की घोषणा की गई। इसमें मधेश की राजनीति में सक्रिय दलों के साथ पूर्वी नेपाल में पहचान की राजनीति करने वाली ताकतें भी शामिल हैं।
मोर्चे ने संघीय व्यवस्था को प्रभावी ढंग से लागू करने, संविधान में संशोधन और राज्य के सभी निकायों में समानुपातिक प्रतिनिधित्व को अपने प्रमुख मुद्दों में रखा है। चुनाव में साझा रणनीति बनाने और जरूरत पड़ने पर संयुक्त राजनीतिक आंदोलन चलाने पर भी दलों के बीच सहमति बनी है।
जनता समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र यादव, जनमत पार्टी के अध्यक्ष डॉ. चंद्रकांत राउत और आम जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रभु साह के नेतृत्व वाले दलों ने मोर्चे के अवधारणा पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
नागरिक उन्मुक्ति पार्टी के संरक्षक रेशमलाल चौधरी भी इस गठजोड़ में शामिल हुए हैं। उनके साथ प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी के अध्यक्ष संतोष परियार, नेपाल संघीय समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष रिजवान अंसारी, बहुजन एकता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. हरिनंदन कुमार रंजन और खम्बुवान राष्ट्रीय मोर्चा के अध्यक्ष रामकुमार राई भी मोर्चे का हिस्सा बने हैं। प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी में जनार्दन शर्मा संरक्षक हैं।
अलग-अलग दल, लेकिन मुद्दों पर साथ चलने की तैयारी
यह किसी एक नई पार्टी के गठन की घोषणा नहीं है। मोर्चे में आए सभी दल अपनी राजनीतिक और संगठनात्मक पहचान बनाए रखेंगे। साझा मुद्दों पर वे एक साथ काम करेंगे।
मोर्चे की अगुवाई आपसी सहमति से तय करने की व्यवस्था रखी गई है। सहमति बनने में मुश्किल होने पर नेतृत्व बारी-बारी से देने का विकल्प भी खुला रखा गया है।
फैसलों में पहले सर्वसम्मति की कोशिश होगी। ऐसा नहीं हो पाने पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए निर्णय लिया जाएगा।
इस नए गठजोड़ की राजनीतिक दिशा भी अवधारणा पत्र में साफ की गई है। लोकतांत्रिक, प्रगतिशील, समाजवादी और समावेशी ताकतों के बीच सहयोग को इसका आधार बनाया गया है। साथ ही नेपाल की संप्रभुता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता, भौगोलिक अखंडता और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई है।
संविधान संशोधन को बनाया बड़ा राजनीतिक मुद्दा
मोर्चे का जोर संविधान संशोधन पर है। उसका निष्कर्ष है कि 2015 में जारी संविधान में मौजूद संरचनात्मक कमियों और अस्पष्टताओं के कारण संघीय व्यवस्था के अमल में दिक्कतें आई हैं। इन समस्याओं को संविधान संशोधन के जरिए संबोधित करने की जरूरत बताई गई है।
सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण का सवाल भी उठाया गया है। मोर्चा स्वतंत्रता, समानता, संघीयता, धर्मनिरपेक्षता और मानव अधिकारों पर आधारित न्यायपूर्ण समाज की बात कर रहा है।
प्रतिनिधित्व का मुद्दा खास तौर पर अहम रखा गया है। मधेशी, आदिवासी-जनजाति, थारू, दलित, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग, दिव्यांग लोगों के साथ लैंगिक और यौन अल्पसंख्यक समुदायों को राज्य के सभी स्तरों पर समानुपातिक प्रतिनिधित्व देने की मांग की गई है।
चुनाव से सड़क तक साझा रणनीति
मोर्चे की योजना केवल साझा राजनीतिक घोषणा तक सीमित रहने की नहीं है। आने वाले चुनावों के लिए मिलकर रणनीति बनाने और जरूरत के मुताबिक संयुक्त रूप से चुनावी मैदान में उतरने की संभावना भी रखी गई है।
राजनीतिक मांगों को लेकर आंदोलन या संघर्ष की जरूरत पड़ी तो उसके कार्यक्रम भी मिलकर चलाए जाएंगे।
यही इस गठजोड़ का सबसे अहम राजनीतिक पहलू है। इसमें शामिल दलों की राजनीतिक पृष्ठभूमि, संगठन और जनाधार अलग-अलग हैं। कुछ की मुख्य ताकत मधेश में है तो कुछ पहचान और समावेशिता की राजनीति के साथ दूसरे क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
अब असली परीक्षा इस बात की होगी कि यह साथ साझा मुद्दों तक सीमित रहता है या अगले चुनाव तक सीटों और उम्मीदवारों के तालमेल में भी बदलता है। आने वाली राजनीतिक गतिविधियां ही इसकी दिशा साफ करेंगी।
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