बांग्लादेश में आज राष्ट्रपति चुनाव, आलमगीर और अहमद आमने-सामने

Hindi News Desk
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बांग्लादेश में आज राष्ट्रपति चुनाव, आलमगीर और अहमद आमने-सामने

बांग्लादेश की संसद गुरुवार को नया राष्ट्रपति चुनने जा रही है। इस बार फैसला बिना मुकाबले नहीं होगा। सत्तारूढ़ बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपने वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर को मैदान में उतारा है, जबकि जमात-ए-इस्लामी की अगुवाई वाले 11 दलों के विपक्षी गठबंधन ने कर्नल (सेवानिवृत्त) ओली अहमद को उम्मीदवार बनाया है।

राष्ट्रपति का चुनाव सीधे जनता नहीं, सांसद करेंगे। बांग्लादेश में राष्ट्रपति पद के लिए करीब 35 साल बाद मतदान की नौबत आई है। चुनाव आयोग ने जातीय संसद भवन में दोपहर 2 बजे से शाम 5 बजे तक मतदान का समय तय किया है।

हालांकि मुकाबला दो उम्मीदवारों के बीच है, लेकिन संसद का गणित आलमगीर के पक्ष में काफी मजबूत है। फरवरी में सत्ता में लौटी बीएनपी के पास अकेले दो-तिहाई बहुमत है।

349 सांसद डालेंगे राष्ट्रपति चुनाव में वोट

350 सदस्यीय संसद में बीएनपी के 247 सांसद हैं। जमात के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन के पास 81 सीटें हैं। बाकी सीटें छोटे दलों और निर्दलीय सांसदों के पास हैं।

चट्टोग्राम-4 से निर्वाचित उम्मीदवार की उम्मीदवारी अदालत ने रद्द कर दी थी। इस वजह से यह सीट फिलहाल खाली है और राष्ट्रपति चुनाव में कुल 349 सांसद मतदान करेंगे।

यही संख्या इस चुनाव की तस्वीर काफी हद तक साफ कर देती है। अगर बीएनपी के सांसद पार्टी उम्मीदवार के साथ बने रहते हैं तो आलमगीर की जीत में बड़ी बाधा दिखाई नहीं देती।

78 वर्षीय आलमगीर बीएनपी की राजनीति के सबसे पुराने और पहचाने जाने वाले चेहरों में शामिल हैं। प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष तारिक रहमान ने उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया है।

उनके सामने लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के अध्यक्ष कर्नल (सेवानिवृत्त) ओली अहमद, वीर विक्रम हैं। उन्हें जमात-ए-इस्लामी की अगुवाई वाले 11 दलों के गठबंधन ने साझा उम्मीदवार बनाया है।

चुनाव आयोग ने 16 अगस्त को दोनों उम्मीदवारों के नामांकन वैध घोषित किए थे।

सांसदों से वोट मांगते वक्त भावुक हुए आलमगीर

मतदान से एक दिन पहले बुधवार को बीएनपी संसदीय दल की बैठक हुई। इसमें आलमगीर ने पार्टी सांसदों से अपने लिए समर्थन मांगा।

बैठक में मौजूद सांसदों के मुताबिक, अपनी लंबी राजनीतिक यात्रा का जिक्र करते हुए आलमगीर कुछ समय के लिए भावुक भी हो गए। उन्होंने कहा कि इस सफर में उनसे अनजाने में किसी को चोट पहुंची हो या कोई गलती हुई हो तो वे उसके लिए माफी चाहते हैं।

साथ ही उन्होंने देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता से किसी तरह का समझौता नहीं करने की प्रतिबद्धता दोहराई।

आलमगीर का राष्ट्रपति पद तक पहुंचना सिर्फ एक और संवैधानिक नियुक्ति नहीं माना जा रहा। इसकी एक वजह बीएनपी में उनकी लंबी भूमिका भी है।

बीएनपी के मुश्किल दौर में संभाली थी कमान

आलमगीर दो दशक से अधिक समय से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में सक्रिय हैं। 2011 में उन्हें बीएनपी का कार्यवाहक महासचिव बनाया गया था और 2016 में वे औपचारिक रूप से महासचिव बने।

वह दौर भी आया जब पूर्व प्रधानमंत्री और तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष खालिदा जिया जेल में थीं और तारिक रहमान विदेश में थे। उस समय बीएनपी की राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख नेताओं में आलमगीर सबसे आगे रहे।

अर्थशास्त्र की पृष्ठभूमि वाले आलमगीर ने अपनी राजनीति तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के दौर में वामपंथी छात्र आंदोलन से शुरू की थी। 1990 के दशक की शुरुआत में वे बीएनपी से जुड़े।

सरकार में भी उन्हें पहले जिम्मेदारियां मिल चुकी हैं। वे कृषि और नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री रह चुके हैं। इस साल 12 फरवरी के चुनाव के बाद बीएनपी की सत्ता में वापसी हुई तो उन्हें स्थानीय सरकार मंत्री बनाया गया।

राष्ट्रपति चुनाव में जीत मिलने पर वे बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति होंगे।

शाहाबुद्दिन के इस्तीफे से खाली हुआ पद

यह चुनाव तय कार्यकाल पूरा होने के बाद नहीं हो रहा है। राष्ट्रपति मोहम्मद शाहाबुद्दिन ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए 24 जुलाई को इस्तीफा दे दिया था।

शाहाबुद्दिन अप्रैल 2023 से राष्ट्रपति थे। उनका पांच साल का कार्यकाल अभी पूरा नहीं हुआ था।

उनके पद छोड़ने के बाद संवैधानिक व्यवस्था के तहत संसद के स्पीकर हाफिज उद्दिन अहमद कार्यवाहक राष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

बांग्लादेश के संविधान में राष्ट्रपति पद खाली होने पर 90 दिनों के भीतर नया राष्ट्रपति चुनने का प्रावधान है। देश में संसदीय शासन व्यवस्था है, इसलिए राष्ट्रपति का चुनाव संसद के सदस्य करते हैं।

गुरुवार को मतदान और मतगणना के बाद विजेता का नाम साफ हो जाएगा। नए राष्ट्रपति को शुक्रवार शाम बंगभवन के दरबार हॉल में शपथ दिलाने की तैयारी है।

राष्ट्रपति का पद औपचारिक, लेकिन सियासी मायने बढ़े

बांग्लादेश की संसदीय व्यवस्था में राष्ट्रपति मुख्य रूप से संवैधानिक राष्ट्रप्रमुख हैं। रोजमर्रा की सत्ता प्रधानमंत्री और सरकार के हाथ में रहती है, फिर भी राष्ट्रपति के पास कुछ अहम संवैधानिक जिम्मेदारियां हैं।

प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश की नियुक्ति उनमें शामिल है। राष्ट्रपति सशस्त्र बलों के सर्वोच्च कमांडर भी होते हैं, हालांकि सामान्य परिस्थितियों में इन अधिकारों का इस्तेमाल प्रधानमंत्री की सलाह के मुताबिक होता है।

हाल के राजनीतिक बदलावों ने इस पद को लेकर चर्चा बढ़ाई है। आम चुनाव कराने के लिए फिर लाई गई कार्यवाहक सरकार की व्यवस्था में संक्रमण के समय राष्ट्रपति की भूमिका पहले की तुलना में अधिक अहम हो सकती है।

बीएनपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में संविधान में बदलाव कर राष्ट्रपति संस्था को अधिक अधिकार देने की प्रतिबद्धता भी जताई थी।

इसी वजह से आलमगीर जैसे लंबे राजनीतिक अनुभव वाले नेता को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने के फैसले को केवल एक औपचारिक पद भरने के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे आने वाले समय की राजनीतिक और संवैधानिक जरूरतों का हिसाब भी जुड़ा है।

फिलहाल फैसला सांसदों के हाथ में है। दो उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन 247 सांसदों के साथ बीएनपी का स्पष्ट बहुमत चुनाव को आलमगीर के पक्ष में झुकाता दिख रहा है।

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