ज्ञानेन्द्र शाही ने प्रचंड, ओली और देउवा की संपत्ति पर उठाए सवाल
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (राप्रपा) के नेता ज्ञानेन्द्र शाही ने नेपाल के प्रमुख राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं और उनके करीबी लोगों की संपत्ति को लेकर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक जीवन और सत्ता के आसपास रहने वाले लोगों से जुड़ी करोड़ों रुपये की संपत्ति की चर्चा हो रही है तो उसका वैध स्रोत भी सामने आना चाहिए।
शाही ने फेसबुक पर माओवादी केंद्र के अध्यक्ष पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’, नेकपा एमाले के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली और नेपाली कांग्रेस के पूर्व सभापति शेरबहादुर देउवा के करीबी लोगों का नाम लेते हुए सवाल किए हैं।
हालांकि, जिन रकम का उन्होंने जिक्र किया है, उन्हें भ्रष्टाचार से कमाई गई संपत्ति साबित करने वाला कोई आधिकारिक निष्कर्ष सामने नहीं रखा गया है। शाही ने भी अपनी पोस्ट में इन्हें किसी अदालत या जांच एजेंसी से प्रमाणित भ्रष्टाचार के तौर पर पेश नहीं किया है। उनका जोर संपत्ति का स्रोत सार्वजनिक करने पर है।
50 करोड़ से 20 करोड़ तक की रकम पर सवाल
शाही की पोस्ट में सबसे पहले प्रचंड की बेटी गंगा दाहाल और जीवन आचार्य से जोड़कर करीब 50 करोड़ रुपये की संपत्ति का सवाल उठाया गया है।
इसी तरह उन्होंने ओली के करीबी बताए जाने वाले राजेश बज्राचार्य के संदर्भ में 20 से 25 करोड़ रुपये और देउवा के करीबी भानु देउवा के नाम से 18 से 20 करोड़ रुपये की संपत्ति की चर्चा की है।
ये आंकड़े फिलहाल शाही की ओर से सार्वजनिक रूप से उठाए गए दावों और सवालों का हिस्सा हैं। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई जांच प्रतिवेदन, अदालत का फैसला या अधिकार प्राप्त सरकारी निकाय का निष्कर्ष नहीं है, जिसके आधार पर इन रकम को गैरकानूनी संपत्ति कहा जा सके।
यही फर्क इस पूरे मामले में अहम है। किसी नेता या उसके करीबी पर राजनीतिक आरोप लगना एक बात है, जबकि आय से अधिक या गैरकानूनी संपत्ति साबित होना दूसरी।
शाही की मांग- पहले संपत्ति का स्रोत बताएं
शाही ने अपनी पोस्ट में इसी मुद्दे को राजनीतिक जवाबदेही से जोड़ा है। उनका कहना है कि पहले संपत्ति कहां से आई, इसका स्रोत दिखाया जाए और उसके बाद राजनीति की बात की जाए।
साथ ही उनका कहना है कि अगर भ्रष्टाचार साबित होता है तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए।
इस बयान के जरिए शाही ने केवल कुछ व्यक्तियों पर सवाल नहीं उठाए हैं। उन्होंने उस पुराने मुद्दे को भी फिर सामने ला दिया है, जो नेपाल की राजनीति में बार-बार उठता रहा है—नेताओं, उनके परिवार और सत्ता के आसपास प्रभाव रखने वाले लोगों की आर्थिक पारदर्शिता।
आरोप से आगे जांच और प्रमाण जरूरी
किसी व्यक्ति के पास बड़ी संपत्ति होना अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है। असली सवाल यह होता है कि संपत्ति किस आय से बनी, उसका रिकॉर्ड क्या है, संबंधित कारोबार और लेनदेन कैसे हुए और उस पर लागू कर तथा दूसरे कानूनी दायित्व पूरे किए गए या नहीं।
ऐसे मामलों में संपत्ति विवरण, वैध आमदनी के स्रोत, कारोबारी रिकॉर्ड, कर से जुड़े दस्तावेज और जरूरत पड़ने पर अधिकार प्राप्त निकाय की जांच ही किसी ठोस निष्कर्ष का आधार बन सकती है।
सोशल मीडिया पर उठे सवाल या राजनीतिक बयान जांच की मांग का आधार बन सकते हैं, लेकिन उन्हें अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
अब सवाल जवाबदेही का भी
नेपाल की राजनीति में नेताओं और उनके करीबियों की संपत्ति को लेकर आरोप नए नहीं हैं। चुनावी राजनीति से लेकर संसद और सार्वजनिक मंचों तक ऐसे सवाल समय-समय पर उठते रहे हैं। मुश्किल तब होती है जब बहस आरोप और जवाबी आरोप तक सीमित रह जाती है।
शाही की ताजा पोस्ट ने इसी वजह से आर्थिक पारदर्शिता का सवाल फिर सामने रखा है।
अगर सार्वजनिक रूप से बताई जा रही करोड़ों रुपये की संपत्ति के दावे सही हैं तो उसके स्रोत और कानूनी स्थिति की जांच जरूरी है। अगर दावे गलत या आधारहीन हैं तो संबंधित लोगों की ओर से तथ्य और दस्तावेज के साथ उनका खंडन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
आखिरकार फैसला राजनीतिक बयान से नहीं, प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया से होना है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में प्रभाव रखने वाले लोगों से संपत्ति के स्रोत पर जवाब मांगना भी जवाबदेही की उसी बहस का हिस्सा है।
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