गृह मंत्री बोले- नेपाल में फांसी की सजा का कानून नहीं
तीन साल की गरिमा चौधरी के साथ हुए जघन्य अपराध के बाद नेपाल में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। बारा की इस बच्ची को न्याय दिलाने की मांग अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़क तक पहुंच गई है। शनिवार को काठमांडू के शांतिबाटिका और आसपास के इलाके में प्रदर्शन हुआ, जहां लोगों ने दोषियों के लिए सबसे कड़ी सजा की मांग की।
प्रदर्शन में फांसी की सजा का मुद्दा भी जोर से उठा। कई लोगों की मांग थी कि बच्चों और महिलाओं के खिलाफ ऐसे अपराध करने वालों के लिए मृत्युदंड का कानून बनाया जाए।
इसी बीच गृह मंत्री सुदन गुरुङ ने कहा है कि लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है, लेकिन जांच और न्याय की प्रक्रिया पर असर डालने वाली गतिविधियों से बचना जरूरी है। उनका कहना है कि सरकार इस मामले में शुरू से सक्रिय है और जांच को संवेदनशील तरीके से आगे बढ़ाया जा रहा है।
मामले में गिरफ्तारियां, पुलिस की भूमिका भी जांच के दायरे में
गृह मंत्री के मुताबिक, घटना में शामिल होने के आरोप में कुछ लोगों को पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है। गरिमा के माता-पिता की शिकायत के आधार पर जांच के लिए चार और लोगों को हिरासत में लिया गया है।
मामले के शुरुआती चरण में पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे। लापरवाही की आशंका सामने आने के बाद संबंधित पुलिस अधिकारियों की जांच और उन पर कार्रवाई की प्रक्रिया भी शुरू की गई है।
सरकार के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जांच में कोई ऐसी कमी न रह जाए, जिसका फायदा बाद में आरोपी उठा सकें।
गुरुङ ने साफ कहा है कि जांच का आधार सबूत होना चाहिए। कोशिश यह होनी चाहिए कि दोषी बच न पाए और किसी निर्दोष को गलत तरीके से मामले में न फंसाया जाए।
फांसी की मांग तेज, लेकिन संविधान में इसकी जगह नहीं
गरिमा के मामले ने मृत्युदंड को लेकर पुरानी बहस फिर सामने ला दी है। शनिवार के प्रदर्शन में भी बड़ी संख्या में लोग फांसी की सजा की मांग करते दिखे।
लेकिन मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था में नेपाल में ऐसा कानून बनाना संभव नहीं है।
नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 16 की उपधारा 2 में किसी व्यक्ति को मृत्युदंड देने वाला कानून बनाने की मनाही है। नेपाल मृत्युदंड खत्म करने से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से भी बंधा हुआ है।
गृह मंत्री ने इसी कानूनी स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार आवेग में कानूनी प्रक्रिया से बाहर जाकर फैसला नहीं कर सकती। फिलहाल ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि जांच मजबूत हो, सबूत सुरक्षित रहें और अदालत तक ऐसा मामला पहुंचे जिसमें दोषी के बच निकलने की गुंजाइश न रहे।
लोगों की नाराजगी अपनी जगह है। लेकिन इस मामले का कानूनी रास्ता गिरफ्तारी, जांच, अभियोजन और अदालत के फैसले से होकर ही जाएगा।
महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध पर कानून बदलने की तैयारी
सरकार का कहना है कि इस घटना के बाद केवल एक मामले की जांच तक सीमित रहने के बजाय महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले गंभीर अपराधों से जुड़े कानूनों की भी समीक्षा की जा रही है।
गृह मंत्री गुरुङ के अनुसार, कानून, न्याय और संसदीय मामलों की मंत्री सोबिता गौतम ने सरकार में आने के बाद ऐसे जघन्य अपराधों से जुड़े मौजूदा कानूनी अवरोध हटाने के मुद्दे को प्राथमिकता दी है।
जरूरी कानूनी संशोधन का मसौदा तैयार कर उसे संसदीय प्रक्रिया में ले जाने की तैयारी भी चल रही है।
हालांकि कानून बदलने की प्रक्रिया तुरंत पूरी नहीं होती। गृह मंत्री का कहना है कि इसे बहाना बनाकर मौजूदा व्यवस्था के भीतर होने वाली कार्रवाई को कमजोर नहीं किया जा सकता।
गृह मंत्री की अपील- जांच से पहले फैसला न सुनाएं
गरिमा के लिए बढ़ते जनदबाव के बीच गृह मंत्री ने अपुष्ट सूचनाओं और सोशल मीडिया पर चल रही अटकलों को लेकर भी सावधानी बरतने को कहा है।
उनका कहना है कि सरकार से सवाल पूछना, कमियां दिखाना और जवाबदेही मांगना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन जांच पूरी होने से पहले किसी को दोषी ठहराना या मामले को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बनाना आखिरकार न्याय की प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है।
उन्होंने ‘मीडिया ट्रायल’ से भी बचने की अपील की है।
संवेदनशील आपराधिक मामलों में पहले भी जांच की कमियों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में गरिमा का मामला पुलिस और सरकार दोनों के लिए एक परीक्षा बन गया है। सबूत सुरक्षित रखना, वैज्ञानिक तरीके से जांच करना और शुरुआती स्तर पर होने वाली गलतियों को रोकना बेहद अहम है।
सड़क का गुस्सा अब न्यायिक नतीजे की मांग कर रहा है
गरिमा के साथ हुई घटना ने एक परिवार को गहरे दर्द में डाला है, लेकिन इसका असर उससे कहीं बड़ा है। खासकर बच्चों की सुरक्षा को लेकर समाज में फिर डर और बेचैनी बढ़ी है।
प्रदर्शन में उठ रही फांसी की मांग इसी गुस्से की तीव्रता दिखाती है। दूसरी तरफ सरकार पर यह दबाव है कि वह केवल आश्वासन न दे, बल्कि जांच और अभियोजन में भी अपनी गंभीरता साबित करे।
गृह मंत्री ने भी कहा है कि पहली प्राथमिकता गरिमा को न्याय दिलाना है।
लेकिन सवाल केवल इस एक मामले तक सीमित नहीं है। यह भी देखना होगा कि महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ गंभीर अपराध रोकने के लिए मौजूदा कानून, पुलिस जांच और संस्थागत व्यवस्था कितनी असरदार है।
सड़क पर उतरे लोगों की मांग साफ है—गरिमा के मामले में कोई दोषी न बचे, जांच में लापरवाही न हो और भविष्य में किसी दूसरी बच्ची को ऐसी पीड़ा न झेलनी पड़े।
अब सरकार की बातों पर भरोसा तभी बनेगा, जब उसका असर जांच, अभियोजन और अदालत तक पहुंचने वाले मजबूत मामले में दिखेगा।
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