गरिमा मामले को ‘मीडिया ट्रायल’ न बनाएं: कानून मंत्री गौतम

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गरिमा मामले को ‘मीडिया ट्रायल’ न बनाएं: कानून मंत्री गौतम

तीन साल की गरिमा के साथ यौन हिंसा और हत्या की घटना ने पूरे नेपाल को झकझोर दिया है। जगह-जगह विरोध हो रहे हैं, कड़ी सजा की मांग उठ रही है और जांच को लेकर भी सवाल पूछे जा रहे हैं। इसी बीच कानून मंत्री सोबिता गौतम ने कहा है कि इस मामले में सबसे जरूरी है निष्पक्ष जांच, सबूतों की सुरक्षा और ऐसी कानूनी कमियों को दूर करना, जिनकी वजह से पीड़ित परिवार को न्याय मिलने में मुश्किल आती है।

गौतम ने फेसबुक पर अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया में कहा कि गरिमा की घटना ने उन्हें सिर्फ कानून मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि एक मां और बेटी के रूप में भी गहराई से प्रभावित किया है।

घटना की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने गृह मंत्री से जांच की स्थिति के बारे में जानकारी ली। उनका कहना है कि अपराध की जांच, संदिग्ध या आरोपी की गिरफ्तारी और कानून-व्यवस्था की सीधी जिम्मेदारी गृह प्रशासन और पुलिस की है। कानून मंत्रालय की भूमिका कानून बनाने, उनकी समीक्षा करने और जरूरी सुधार आगे बढ़ाने की है।

सिर्फ अपराध नहीं, व्यवस्था पर भी सवाल

कानून मंत्री ने इस घटना को केवल एक जघन्य अपराध के रूप में देखने के बजाय समाज और राज्य की पूरी व्यवस्था से जोड़कर देखने की जरूरत बताई है।

उनके मुताबिक सवाल यह भी है कि परिवार, स्कूल और समाज बच्चों को किस तरह की समझ दे रहे हैं। उन्हें सुरक्षा, सहमति, इंसानी व्यवहार और हिंसा के खिलाफ सोच किस तरह सिखाई जा रही है।

इस मामले में एक किशोर पर आरोप लगने की चर्चा के बीच गौतम ने कहा कि यह स्थिति और गंभीर आत्मसमीक्षा की मांग करती है। कानून बदलना जरूरी है, लेकिन सिर्फ संविधान या कानूनी प्रावधान बदल देने से समाज अपने आप सुरक्षित नहीं हो जाता।

बच्चों की परवरिश, शिक्षा और डिजिटल माहौल को लेकर भी जिम्मेदारी तय करनी होगी।

बलात्कार और महिला हिंसा से जुड़े कानूनों की समीक्षा

गौतम के अनुसार कानून मंत्रालय बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़े मामलों में मौजूद कानूनी कमजोरियों का अध्ययन कर चुका है।

इस पर रिपोर्ट भी तैयार हो चुकी है। मंत्रालय अब जरूरी संशोधन संसद तक ले जाने की तैयारी में है।

उन्होंने कहा कि मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालने के शुरुआती समय से ही इस विषय को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन कानून सुधार की प्रक्रिया चल ही रही थी कि गरिमा जैसी घटना सामने आ गई।

इसने फिर सवाल खड़ा किया है कि मौजूदा कानून, जांच व्यवस्था और सुरक्षा प्रणाली बच्चों को वास्तव में कितना बचा पा रही है।

मृत्युदंड की मांग पर क्या बोलीं कानून मंत्री

गरिमा की हत्या के बाद कई जगह प्रदर्शन हुए हैं। कुछ प्रदर्शनकारियों ने दोषी को मृत्युदंड देने की मांग भी की है।

गौतम ने कहा कि लोगों का गुस्सा और पीड़ा स्वाभाविक है, लेकिन सरकार संविधान और कानून से बाहर जाकर सजा तय नहीं कर सकती।

नेपाल के संविधान की धारा 16(2) ऐसे कानून के निर्माण पर रोक लगाती है, जिसमें मृत्युदंड का प्रावधान हो। नेपाल की अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रतिबद्धताएं भी इस विषय से जुड़ी हुई हैं।

उन्होंने संवैधानिक प्रक्रिया की भी याद दिलाई। कानून का मसौदा सरकार तैयार कर सकती है, संसद उसे स्वीकार या अस्वीकार करती है और कानून के आधार पर किसी मामले में सजा तय करने का अधिकार अदालत का है।

गौतम का कहना है कि कानून के शासन की असली परीक्षा वही समय होता है, जब समाज में गुस्सा सबसे ज्यादा हो। अपराधी ही नहीं, सरकार को भी कानून की सीमा में रहना पड़ता है।

जांच से पहले फैसला न सुनाने की अपील

कानून मंत्री ने गरिमा मामले को सोशल मीडिया या सार्वजनिक दबाव के आधार पर तय किए जाने के खिलाफ भी चेताया है।

उनका कहना है कि अपुष्ट जानकारी फैलाना, जांच से जुड़ी बातों की अपनी-अपनी व्याख्या करना और सार्वजनिक बहस के जरिए किसी को दोषी या निर्दोष घोषित कर देना न्यायिक प्रक्रिया को नुकसान पहुंचा सकता है।

उन्होंने निर्मला पंत मामले का भी जिक्र किया। गौतम के मुताबिक संवेदनशील अपराधों में शुरुआती जांच, घटनास्थल से मिले सबूतों की सुरक्षा और जिम्मेदार तरीके से सूचना सार्वजनिक करना बेहद अहम होता है।

शुरुआत में ही सबूत बिगड़ जाएं या जांच गलत दिशा में चली जाए तो सबसे ज्यादा नुकसान पीड़ित परिवार का होता है।

गौतम ने लोगों से सरकार और पुलिस से सवाल पूछते रहने की अपील की। उनका कहना है कि पुलिस से गलती हुई हो तो सवाल होना चाहिए, सरकार से चूक हुई हो तो भी जवाब मांगा जाना चाहिए। लेकिन जांच को तथ्य और सबूत के आधार पर आगे बढ़ने देना उतना ही जरूरी है।

उनके मुताबिक नागरिक और सरकार एक-दूसरे के विरोधी पक्ष नहीं हैं। दोनों का साझा लक्ष्य पीड़ित को न्याय दिलाना होना चाहिए।

पुराने वीडियो पर भी दी सफाई

गरिमा मामले पर बढ़ती बहस के बीच सोबिता गौतम का कई साल पुराना एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर दोबारा सामने आया है।

वीडियो के कुछ हिस्सों को लेकर दावा किया गया कि गौतम ने कभी बलात्कार को सामान्य बताया था। उन्होंने इस व्याख्या को गलत कहा है।

गौतम ने साफ किया कि बलात्कार कभी सामान्य नहीं हो सकता और न ही उसे किसी रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

उनका कहना है कि उस समय उनकी बात का आशय यह था कि यौन हिंसा झेल चुकी महिला को समाज दोबारा शर्म, आरोप और सामाजिक बहिष्कार के बोझ तले न दबाए।

अपराध की जिम्मेदारी पीड़ित की नहीं, अपराध करने वाले की होती है।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कम उम्र में शायद वह अपनी बात उतनी स्पष्ट भाषा में नहीं रख पाई हों, जितनी आज रख सकती हैं। लेकिन उस पुराने बयान को बलात्कार के समर्थन के रूप में पेश करना गलत है।

सात सदस्यीय ‘गरिमा न्याय संकल्प समिति’ बनेगी

गरिमा के माता-पिता के साथ गृह मंत्रालय में हुई मुलाकात के बाद जघन्य अपराधों में मौजूदा कसूर और सजा के प्रावधानों की समीक्षा के लिए सात सदस्यीय ‘गरिमा न्याय संकल्प समिति’ बनाने का फैसला किया गया है।

गौतम के मुताबिक समिति मौजूदा कानूनों का अध्ययन करेगी। नागरिकों की अपेक्षाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा और यह देखा जाएगा कि कानून को कहां ज्यादा प्रभावी और सख्त बनाने की जरूरत है।

समिति को सात दिन के भीतर अपनी रिपोर्ट देने की जिम्मेदारी दी गई है।

गरिमा के पिता की बात का जिक्र करते हुए गौतम ने कहा कि बेटी को न बचा पाने की पीड़ा के बीच भी परिवार चाहता है कि इस घटना के बाद ऐसा कानूनी सुधार हो, जिससे किसी दूसरी बच्ची को वही दर्द न झेलना पड़े।

यही अपेक्षा अब राज्य के सामने जिम्मेदारी भी है और चुनौती भी।

सवाल सिर्फ सजा का नहीं, अपराध रोकने का भी

गरिमा की घटना के बाद बहस अभी ज्यादातर सजा और कानून की सख्ती पर है। गौतम ने इसके साथ अपराध होने से पहले की रोकथाम पर भी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा की जरूरत बताई है।

उनका कहना है कि शिक्षा सिर्फ किताबों का ज्ञान न दे, बच्चों में इंसानियत और दूसरों की सीमाओं का सम्मान भी विकसित करे। परिवार और समाज को हिंसा के खिलाफ समझ पैदा करनी होगी।

पुलिस और जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि सबूत सुरक्षित रहें। कानून ऐसा होना चाहिए कि पीड़ित की न्याय तक पहुंच कमजोर न पड़े।

गौतम ने कहा है कि कानून एक रात में नहीं बदलता और सिर्फ नारों से जांच पूरी नहीं होती। जनआक्रोश जरूरी सवाल उठाता है, लेकिन न्याय का रास्ता आखिरकार कानून, प्रक्रिया और सबूत से ही होकर जाता है।

उन्होंने अपने हिस्से की कानूनी सुधार प्रक्रिया में कोई कमी न छोड़ने की प्रतिबद्धता जताई है।

उनके मुताबिक जहां कानून कमजोर है, वहां उसे बदलना होगा। जहां प्रक्रिया कमजोर है, उसे मजबूत करना होगा। और जहां राज्य चूका है, वहां जवाबदेही तय करनी होगी।

गरिमा का नाम सिर्फ एक दुखद घटना की पहचान बनकर न रह जाए, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की वजह बने जहां हर बच्ची की सुरक्षा को राज्य और समाज अपनी साझा जिम्मेदारी मानें।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।