11 दिन में खुला कृष्णभीर का रास्ता

Hindi News Desk
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11 दिन में खुला कृष्णभीर का रास्ता

रसुवा की बाढ़ के बाद काठमांडू घाटी में बढ़े LPG गैस संकट के बीच धादिंग के कृष्णभीर से राहत की खबर आई है। पृथ्वी राजमार्ग के इस हिस्से में बाढ़ से पूरी तरह बह चुकी सड़क को सड़क विभाग ने करीब 11 दिन की मशक्कत के बाद अस्थायी रूप से खोल दिया है।

रास्ता बंद होने का सीधा असर काठमांडू की गैस सप्लाई पर पड़ा था। भारत से आने वाले बड़े गैस बुलेट आगे नहीं बढ़ पा रहे थे। पहले से बनी किल्लत इसके बाद और गंभीर हो गई।

गैस संकट का मामला राजनीतिक स्तर तक पहुंचा और इसी बीच गौरीकुमारी यादव को उद्योग मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा।

अब कृष्णभीर से गाड़ियों की आवाजाही शुरू होने के बाद काठमांडू में गैस की आपूर्ति धीरे-धीरे सामान्य होने की उम्मीद है। आने वाले त्योहारों को देखते हुए भी इस रास्ते का खुलना अहम माना जा रहा है।

रास्ता खुला है, लेकिन खतरा अभी टला नहीं

सड़क विभाग ने फिलहाल पहाड़ी हिस्से को काटकर वाहनों के लिए ट्रैक तैयार किया है। इससे यातायात तो शुरू हो गया, लेकिन कृष्णभीर की कमजोर जमीन को देखते हुए इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।

भोटेकोसी में आई बाढ़ इतनी तेज थी कि कृष्णभीर में सड़क का हिस्सा लगभग पूरी तरह बह गया। काठमांडू को तराई से जोड़ने वाले पृथ्वी राजमार्ग पर यातायात ठप हो गया और मालवाहक गाड़ियों की आवाजाही भी रुक गई।

अब अस्थायी ट्रैक बनने से तत्काल समस्या कुछ कम हुई है। लेकिन असली चुनौती इस रास्ते को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की है।

भूगर्भविदों के मुताबिक कृष्णभीर की पहाड़ी में मिट्टी और चट्टानों की बनावट काफी ढीली है। ढलान भी बहुत तेज है। बारिश का पानी जमीन में जाने के बाद मिट्टी जल्दी कमजोर पड़ती है और उसके खिसकने का खतरा बढ़ जाता है।

दूसरी तरफ नीचे बह रही त्रिशूली नदी लगातार पहाड़ी के निचले हिस्से को काटती रहती है। यानी सड़क के ऊपर पहाड़ का दबाव है और नीचे नदी से कटाव का खतरा।

कृष्णभीर में पहिरों का 26 साल पुराना इतिहास

कृष्णभीर की यह समस्या नई नहीं है। करीब 26 साल पहले, विक्रम संवत 2056/57 के आसपास, यह इलाका नेपाल में पहिरों के लिए सबसे खतरनाक जगहों में गिना जाता था।

हालत ऐसी थी कि सामान्य बारिश के बाद भी सड़क कई दिनों और कभी-कभी हफ्तों तक बंद रहती थी। काठमांडू की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होती। सामान लेकर निकले ट्रक और यात्री रास्ते में ही फंस जाते थे।

इसके बाद करीब विक्रम संवत 2060 में नेपाली इंजीनियरों ने यहां बायो-इंजीनियरिंग का सहारा लिया।

पहाड़ी ढलान पर अम्रिसो, बांस और बाबियो जैसे पौधे लगाए गए। जमीन के अंदर जमा होने वाले पानी को निकालने के लिए नालियां बनाई गईं और कमजोर हिस्सों को रोकने के लिए दीवारें खड़ी की गईं।

यह प्रयोग काफी हद तक सफल रहा। करीब दो दशक तक कृष्णभीर में पुराने दौर जैसी लगातार समस्या नहीं आई। यहां किए गए बायो-इंजीनियरिंग के काम को देखने के लिए विदेशों से भी इंजीनियर पहुंचते थे।

लेकिन इस साल की भीषण बाढ़ ने हालात फिर बदल दिए। लगभग 20 साल से टिके सड़क और पहाड़ी संरक्षण के काम को बाढ़ ने गंभीर नुकसान पहुंचाया।

पहाड़ काटकर सड़क निकालने से बढ़ सकती है मुश्किल

अभी सबसे बड़ी चिंता अस्थायी सड़क बनाने के तरीके को लेकर है। काठमांडू की ओर यातायात ज्यादा समय तक बंद न रहे, इसलिए पहाड़ी की तरफ काटकर नया ट्रैक निकाला गया है।

विशेषज्ञों की चिंता है कि कमजोर पहाड़ को नीचे से काटने पर ऊपर के हिस्से को मिलने वाला प्राकृतिक सहारा और कम हो सकता है। ऐसे में बारिश होने या लगातार भारी वाहनों की आवाजाही से पैदा होने वाले कंपन के बीच फिर पहिरा गिरने का जोखिम बना रहेगा।

यानी अभी खुला रास्ता तत्काल जरूरत पूरी कर सकता है, लेकिन इसी ट्रैक पर लंबे समय तक निर्भर रहना आसान नहीं होगा।

कृष्णभीर के लिए पुल या सुरंग की जरूरत

कृष्णभीर की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए अब स्थायी विकल्प पर काम करने की जरूरत सामने आई है।

भूगर्भविदों और इंजीनियरों के मुताबिक कमजोर पहाड़ी को लगातार काटते रहना समस्या को और जटिल बना सकता है। एक विकल्प त्रिशूली नदी के ऊपर ऐसा पुल या फ्लाईओवर बनाना है, जिससे कृष्णभीर के संवेदनशील हिस्से को ही पार किया जा सके।

दूसरा विकल्प सुरंग मार्ग का है। इससे सड़क को कमजोर ढलान और नदी के कटाव वाले हिस्से से दूर ले जाया जा सकता है।

फिलहाल अस्थायी सड़क खुलने से काठमांडू की आपूर्ति व्यवस्था को राहत मिलने की उम्मीद है। लेकिन कृष्णभीर का पुराना इतिहास यही बताता है कि सिर्फ ट्रैक खोल देना काफी नहीं होगा। स्थायी समाधान के बिना बारिश और बाढ़ के हर बड़े दौर में पृथ्वी राजमार्ग का यह हिस्सा फिर चुनौती बन सकता है।

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