नुवाकोट की तादी नदी के पुल की सच्चाई क्या है?

Hindi News Desk
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नुवाकोट की तादी नदी के पुल की सच्चाई क्या है?

नुवाकोट के देवीघाट में तादी नदी पर नेपाली सेना तेजी से लोहे का पुल तैयार कर रही है। 55 जवानों की टीम मौके पर काम में जुटी है और अगले कुछ दिनों में पुल को वाहनों के लिए खोलने की तैयारी है। लेकिन पुल पूरा होने से पहले ही सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीर फैल गई, जिसमें वह बनकर तैयार दिख रहा है।

बताया गया है कि यह तस्वीर एआई की मदद से बनाई गई थी। मामला तब और गंभीर हो गया जब यही तस्वीर सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के सांसदों और गृह मंत्री सुदन गुरुङ के सोशल मीडिया अकाउंट तक पहुंच गई।

सवाल पुल के निर्माण पर नहीं है। पुल वास्तव में बन रहा है और काम काफी तेजी से आगे बढ़ा है। सवाल उस तस्वीर का है, जिसने निर्माण पूरा होने से पहले ही लोगों के बीच ऐसा संदेश पहुंचाया कि पुल तैयार हो चुका है।

60 मीटर लंबे पुल पर तेजी से काम

विदुर नगरपालिका-5 के देवीघाट में तादी नदी पर करीब 60 मीटर लंबा एक्रो ब्रिज बनाया जा रहा है। पुल की चौड़ाई करीब साढ़े पांच मीटर होगी और इसकी भार क्षमता 50 टन तक बताई गई है।

निर्माण 19 भदौ से शुरू हुआ था। नेपाली सेना के मुताबिक, पुल जोड़ने का काम कल शाम तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।

इसके बाद परीक्षण और सुरक्षा जांच होगी। सब कुछ योजना के मुताबिक रहा तो अगले तीन से चार दिनों में इस पुल से वाहनों की आवाजाही शुरू की जा सकती है।

यानी फिलहाल तस्वीर साफ है—पुल तेजी से बन रहा है, लेकिन अभी पूरी तरह तैयार नहीं हुआ है।

सांसदों और गृह मंत्री ने भी साझा की तस्वीर

इसी बीच सोशल मीडिया पर पुल की एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसमें निर्माण पूरा हो चुका दिखाई देता है। वास्तविक स्थिति से अलग इस तस्वीर को एआई से तैयार किया गया बताया गया है।

यह तस्वीर रास्वपा सांसद गणेश पराजुली और राजीव खत्री के साथ गृह मंत्री सुदन गुरुङ के सोशल मीडिया पर भी पोस्ट हुई।

तस्वीर की सच्चाई को लेकर सवाल उठे और आलोचना बढ़ी तो राजीव खत्री और गृह मंत्री गुरुङ के अकाउंट से संबंधित सामग्री हटा दी गई। गणेश पराजुली के सोशल मीडिया पर यह सामग्री अभी भी देखी जा सकती है।

यहीं से मामला सिर्फ एक गलत तस्वीर का नहीं रह जाता।

मंत्री या सांसद जब किसी आपदा, राहत या पुनर्निर्माण से जुड़ी जानकारी साझा करते हैं तो आम लोग उसे सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट की तरह नहीं देखते। पद के कारण उस सूचना को भरोसेमंद या आधिकारिक मान लेने की संभावना ज्यादा होती है।

ऐसे में सामग्री हटाना गलती सुधारने का एक तरीका जरूर है, लेकिन उससे पहले वह कितने लोगों तक पहुंच चुकी थी और लोगों के बीच क्या धारणा बनी, यह सवाल अपनी जगह बना रहता है।

असली काम के बीच नकली तस्वीर की चर्चा

देवीघाट में जमीन पर हो रहा काम खुद एक महत्वपूर्ण खबर है। सेना के जवान समय के दबाव के बीच पुल तैयार कर रहे हैं। लक्ष्य है कि जल्द परीक्षण पूरा हो और यातायात फिर से सहज बनाया जा सके।

विपद् के बाद कृष्णभीर में रास्ता खोलने की कोशिश से लेकर नुवाकोट में यह अस्थायी पुल तैयार करने तक सरकार और सुरक्षा निकाय अलग-अलग जगह काम कर रहे हैं।

लेकिन वास्तविक प्रगति दिखाने के लिए जब एआई से बनी या गलत तस्वीर सामने आती है तो असर उलटा भी पड़ सकता है।

लोगों को अगर लगे कि जो काम अभी हुआ ही नहीं, उसे पहले से पूरा दिखाया जा रहा है, तो बाद में वास्तविक उपलब्धि पर भी शक पैदा हो सकता है। इसका नुकसान उन लोगों के काम को भी होता है जो फिल्ड में दिन-रात जुटे हैं।

देवीघाट का मामला इसी वजह से महत्वपूर्ण है। यहां काम की रफ्तार को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने की जरूरत ही नहीं थी। वास्तविक निर्माण अपने आप में बताने लायक है।

सार्वजनिक पद पर सूचना की जिम्मेदारी भी बड़ी

सोशल मीडिया अब सांसदों, मंत्रियों और राजनीतिक दलों के लिए जनता से सीधे संवाद का बड़ा माध्यम है। लेकिन इसी के साथ एक जिम्मेदारी भी जुड़ती है—साझा की जा रही जानकारी सही है या नहीं, इसकी जांच।

खासकर आपदा, बचाव, पुनर्निर्माण और सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़े मामलों में जल्द पोस्ट करने से ज्यादा जरूरी सही जानकारी देना है।

किसी सामान्य यूजर से गलती हो सकती है और सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति से भी। फर्क उसके असर का है। मंत्री या सांसद की पोस्ट कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंच सकती है और उसे ज्यादा भरोसे के साथ देखा जा सकता है।

इस घटना ने रास्वपा के भीतर भी सोशल मीडिया पर साझा होने वाली सामग्री की तथ्य-जांच और जवाबदेही का सवाल खड़ा किया है। हालांकि यह कसौटी किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं हो सकती। सत्ता में हो या विपक्ष में, सार्वजनिक जिम्मेदारी वाले हर व्यक्ति के लिए यही मानक होना चाहिए।

गलत जानकारी सामने आने के बाद उसे सुधारना भी इसी जिम्मेदारी का हिस्सा है। जरूरत हो तो गलती स्वीकार करना और माफी मांगना भी। सिर्फ पोस्ट हटा देने से पहले फैल चुकी गलत धारणा अपने आप खत्म नहीं होती।

आधिकारिक अपडेट पर भरोसा क्यों जरूरी

नेपाली सेना आपदा के दौरान चल रहे बचाव, पुनर्स्थापना और पुनर्निर्माण के काम की जानकारी अपने आधिकारिक सोशल मीडिया माध्यमों से भी देती रही है।

देवीघाट समेत किसी जगह सेना क्या काम कर रही है, कितनी प्रगति हुई है और टीम किस तरह तैनात है, इसकी जानकारी नागरिक आधिकारिक ‘नेपाल आर्मी’ फेसबुक पेज पर फोटो, वीडियो और लिखित अपडेट के जरिए देख सकते हैं। इस पेज के करीब 6 लाख 48 हजार फॉलोअर्स हैं।

देवीघाट का पुल भी जल्द तैयार होने की ओर है। फिल्ड में जवान मौजूद हैं, निर्माण जारी है और पुल खोलने से पहले परीक्षण की योजना भी तय है।

ऐसे में उपलब्धि दिखाने के लिए कृत्रिम तस्वीर की जरूरत नहीं पड़ती।

आपदा के समय तस्वीर कितनी आकर्षक है, इससे ज्यादा जरूरी यह है कि सूचना कितनी सही है।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।