कर्णाली प्रदेश में नेपाली कांग्रेस और एमाले की सत्ता साझेदारी टूटने के कगार पर पहुंच गई है। सरकार में शामिल कांग्रेस के चारों मंत्रियों ने सोमवार सुबह एक साथ इस्तीफा दे दिया। इसके बाद मुख्यमंत्री यामलाल कँडेल की सरकार के सामने बहुमत और नए राजनीतिक समर्थन का सवाल खड़ा हो गया है।
कांग्रेस का कहना है कि प्रदेश सरकार का नेतृत्व बारी-बारी से करने की सहमति हुई थी, लेकिन एमाले ने उस पर आगे बढ़ने की इच्छा नहीं दिखाई। इसी नाराजगी के बीच पार्टी ने अपने मंत्रियों को सरकार से वापस बुला लिया।
आर्थिक मामलों और योजना मंत्री राजीवविक्रम शाह, जलस्रोत और ऊर्जा मंत्री विजया बुढा, सामाजिक विकास मंत्री घनश्याम भंडारी और उद्योग, पर्यटन, वन तथा पर्यावरण मंत्री सुरेश अधिकारी ने पद छोड़ा है।
चारों मंत्रियों का इस्तीफा मुख्यमंत्री कँडेल को सौंप दिया गया है। सुरेश अधिकारी के मुताबिक, मंत्रिपरिषद की बैठक के दौरान इस्तीफे औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री के सामने रखे गए।
आलोपालो नेतृत्व की सहमति पर बढ़ा विवाद
कांग्रेस नेताओं की मुख्य नाराजगी सरकार के नेतृत्व को लेकर है। दोनों दलों के बीच अलग-अलग प्रदेशों में बारी-बारी से सरकार चलाने की समझ बनी थी। कांग्रेस का दावा है कि कर्णाली में भी यही व्यवस्था लागू होनी थी।
लेकिन समय बीतने के बाद भी मुख्यमंत्री बदलने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी।
सुरेश अधिकारी ने कहा कि सरकार का नेतृत्व आलोपालो करने पर पहले सहमति बनी थी। उनके मुताबिक एमाले उस सहमति को लागू करने के लिए तैयार नहीं दिखा, इसलिए कांग्रेस के मंत्रियों ने सरकार छोड़ने का फैसला किया।
मंत्रियों के इस्तीफे को कांग्रेस की ओर से राजनीतिक दबाव बढ़ाने के कदम के रूप में भी देखा जा रहा है। हालांकि पार्टी ने अभी तक सरकार को दिया समर्थन औपचारिक रूप से वापस लेने की घोषणा नहीं की है।
समर्थन वापसी का फैसला होने पर मुख्यमंत्री कँडेल को प्रदेशसभा में अपना बहुमत साबित करने की स्थिति का सामना करना पड़ सकता है।
कांग्रेस ने कहा- अभी नई सरकार पर फैसला नहीं
सामाजिक विकास मंत्री रहे घनश्याम भंडारी ने इस्तीफे को तुरंत सत्ता परिवर्तन की तैयारी से जोड़ने से बचने को कहा है।
उनके अनुसार कांग्रेस के मंत्रियों ने मुख्यमंत्री के लिए रास्ता साफ किया है और उनसे जनता के काम प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने को कहा है।
भंडारी ने कहा, “हमने मार्ग प्रशस्त किया है। अब जनता के काम अच्छे तरीके से कीजिए।”
कांग्रेस के नेतृत्व में नई सरकार बनाने की तैयारी से जुड़े सवाल पर उन्होंने कहा कि पार्टी के भीतर अभी कोई ठोस फैसला नहीं हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस फिलहाल अपने अगले कदम को लेकर आंतरिक चर्चा में है।
राजीवविक्रम शाह इस समय स्वास्थ्य उपचार के लिए थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में हैं। विदेश जाने से पहले ही उन्होंने अपना इस्तीफा कांग्रेस संसदीय दल के नेता जीवनबहादुर शाही को सौंप दिया था।
शाह ने कहा है कि उन्होंने संसदीय दल के निर्देश पर पद छोड़ा है।
सात सदस्यीय मंत्रिपरिषद में कांग्रेस के चार मंत्री थे
कर्णाली प्रदेश की सात सदस्यीय मंत्रिपरिषद में कांग्रेस के चार और एमाले के तीन मंत्री थे। संख्या और मंत्रालयों के लिहाज से सरकार में कांग्रेस की मौजूदगी मजबूत थी।
ऐसे में चारों मंत्रियों के एक साथ बाहर होने के बाद मंत्रिपरिषद का पुनर्गठन जरूरी हो गया है।
मुख्यमंत्री यामलाल कँडेल 27 चैत 2080 को माओवादी केंद्र के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे। बाद में केंद्र की सत्ता का समीकरण बदला और कांग्रेस-एमाले गठबंधन बना। इसका असर कर्णाली की सरकार पर भी पड़ा।
इसी राजनीतिक समझ के तहत साउन 2081 में कांग्रेस कर्णाली सरकार में शामिल हुई थी।
अब वही साझेदारी नेतृत्व के सवाल पर उलझ गई है।
मुख्यमंत्री के सामने समर्थन जुटाने की चुनौती
कर्णाली प्रदेशसभा में कुल 40 सदस्य हैं। कांग्रेस और एमाले के गठबंधन के आधार पर सरकार चल रही थी। कांग्रेस के सरकार से बाहर आने के बाद मुख्यमंत्री कँडेल का राजनीतिक आधार पहले की तुलना में कमजोर हुआ है।
फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि कांग्रेस केवल मंत्रियों को वापस बुलाकर दबाव बनाए रखती है या सरकार से समर्थन भी वापस लेती है।
दूसरी ओर एमाले को मंत्रिपरिषद के खाली पद भरने के साथ विधानसभा में जरूरी समर्थन बनाए रखने की रणनीति भी तय करनी होगी। इसके लिए उसे मौजूदा दलों से नए सिरे से बातचीत करनी पड़ सकती है।
कांग्रेस नेतृत्व में सरकार बनाने का विकल्प भी खुला है, लेकिन इसके लिए पार्टी को अन्य दलों का समर्थन जुटाना होगा। अभी कांग्रेस की ओर से इस दिशा में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।
चार मंत्रियों का इस्तीफा केवल मंत्रिपरिषद में बदलाव नहीं है। इससे कर्णाली में कांग्रेस और एमाले के बीच बढ़ता अविश्वास खुलकर सामने आ गया है।
अब प्रदेश की अगली सत्ता तस्वीर इस बात से तय होगी कि कांग्रेस समर्थन पर क्या फैसला करती है और एमाले बहुमत बचाने के लिए किस दल की ओर हाथ बढ़ाता है।