विद्युतीय वाहनों (ईवी) पर नई कर व्यवस्था लागू होने के बाद नेपाल में इसे लेकर बहस तेज हो गई है। खासकर 20 से 30 लाख रुपये कीमत वाले ईवी पर कितना शुल्क लगेगा, इस सवाल ने उपभोक्ताओं, व्यवसायियों और कर विशेषज्ञों के बीच नई चर्चा छेड़ दी है। सरकार की ओर से स्पष्टीकरण जारी किया गया है, लेकिन विवाद पूरी तरह खत्म होता नहीं दिख रहा।
आगामी आर्थिक वर्ष के बजट में सरकार ने ईवी पर पहले से लागू उत्पाद शुल्क को हटाकर उसकी जगह “स्वच्छ पूर्वाधार निवेश शुल्क” लागू करने का फैसला किया है। अब शुल्क मोटर की क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि वाहन की कीमत के आधार पर तय किया जाएगा।
नई व्यवस्था में कितनी दरें तय की गईं?
वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले के सचिवालय की ओर से जारी विवरण के अनुसार ईवी पर स्वच्छ पूर्वाधार निवेश शुल्क की दरें इस प्रकार रखी गई हैं।
- 20 लाख रुपये तक के वाहन : 2.5 प्रतिशत
- 20 लाख से 30 लाख रुपये तक : 20 प्रतिशत
- 30 लाख से 40 लाख रुपये तक : 35 प्रतिशत
- 40 लाख से 50 लाख रुपये तक : 70 प्रतिशत
- 50 लाख रुपये से अधिक : 110 प्रतिशत
इसके अलावा 20 प्रतिशत सीमा शुल्क, 5 प्रतिशत सड़क निर्माण शुल्क और 13 प्रतिशत मूल्य अभिवृद्धि कर (वैट) पहले की तरह लागू रहेंगे।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई?
मामला आर्थिक विधेयक की अनुसूची में इस्तेमाल की गई भाषा से जुड़ा है। विधेयक में एक प्रावधान के तहत सभी ईवी पर 20 प्रतिशत स्वच्छ पूर्वाधार निवेश शुल्क का उल्लेख किया गया है। इसके बाद अलग-अलग मूल्य वर्ग के वाहनों के लिए अलग दरें भी दी गई हैं।
यहीं से भ्रम पैदा हुआ। कई जानकारों का कहना है कि 20 से 30 लाख रुपये वाले वाहनों के लिए अलग दर स्पष्ट रूप से नहीं लिखी गई, जिससे व्याख्या को लेकर सवाल उठे। सरकार का तर्क है कि जहां अलग व्यवस्था नहीं दी गई है, वहां मूल 20 प्रतिशत की दर स्वतः लागू मानी जाएगी।
सरकारी स्पष्टीकरण पर भी उठे नए सवाल
सरकार की सफाई आने के बाद भी बहस थमी नहीं। कुछ कर विशेषज्ञों और व्यवसायियों ने ध्यान दिलाया है कि आर्थिक विधेयक की व्यवस्था और सचिवालय की व्याख्या के बीच एक और अंतर दिखाई देता है। उनका कहना है कि 40 से 50 लाख रुपये मूल्य वर्ग के वाहनों पर शुल्क की गणना को लेकर भी अलग-अलग अर्थ निकल रहे हैं।
इसी वजह से यह मांग उठ रही है कि सरकार कर संरचना और उसके लागू होने के तरीके को और स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करे, ताकि भविष्य में किसी तरह की कानूनी या प्रशासनिक उलझन न रहे।
उपभोक्ताओं और बाजार पर क्या असर पड़ेगा?
नई नीति से यह संकेत मिलता है कि सरकार अपेक्षाकृत सस्ते ईवी को बढ़ावा देना चाहती है, जबकि महंगे वाहनों पर ज्यादा कर लगाकर अतिरिक्त राजस्व जुटाने की कोशिश कर रही है। सरकार का कहना है कि इस राशि का उपयोग चार्जिंग स्टेशन, बिजली प्रसारण व्यवस्था और हरित पूर्वाधार के विस्तार में किया जाएगा।
दूसरी ओर, वाहन व्यवसायियों का मानना है कि मध्यम और ऊंची कीमत वाले ईवी की लागत बढ़ सकती है। उनका कहना है कि नई कर व्यवस्था का वास्तविक असर तब सामने आएगा जब कंपनियां संशोधित शुल्क के आधार पर नई कीमतें तय करेंगी।
बजट पेश होने के कुछ ही दिनों में ईवी कर व्यवस्था राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन चुकी है। हालांकि सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की है, लेकिन विधेयक की भाषा, कर की वास्तविक गणना और बाजार पर उसके प्रभाव को लेकर कई सवाल अभी भी जवाब की प्रतीक्षा में हैं।