ट्रोल करने वालों से क्या बोले ज्ञानेन्द्र शाही?
सोशल मीडिया पर लगातार आलोचना और ट्रोलिंग के बाद प्रतिनिधि सभा सदस्य ज्ञानेन्द्र शाही ने फेसबुक पर व्यंग्य से भरा लंबा पोस्ट लिखा है। उन्होंने अपने आलोचकों पर कटाक्ष किया, लेकिन पोस्ट में इस्तेमाल शब्दों और एक जनप्रतिनिधि की सार्वजनिक भाषा को लेकर नई बहस भी शुरू हो गई है।
शाही ने पोस्ट की शुरुआत ‘जापान की शराब कड़ी रही होगी’ जैसे तंज से की। उनका कहना था कि कई वर्षों से मन में दबाकर रखी बातें अब बाहर आ गई हैं। इसी क्रम में उन्होंने लिखा कि सच को ज्यादा समय तक छिपाया नहीं जा सकता।
हालांकि, शाही ने यह साफ नहीं किया कि उनका इशारा किस व्यक्ति या समूह की ओर था।
पोस्ट में कई गुटों पर तीखा कटाक्ष
फेसबुक पोस्ट में शाही ने ‘सहकारी ठग’, ‘गांजेड़ी गैंग’, ‘खराने गैंग’ और ‘टीओबी गैंग’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया है। इन आरोपों के पीछे क्या आधार है और वे किन लोगों को निशाना बना रहे हैं, इसकी कोई जानकारी उन्होंने नहीं दी।
हाल के दिनों में उनकी एक अभिव्यक्ति को लेकर सोशल मीडिया पर कई वीडियो, मीम और रोस्ट बनाए गए थे। शाही का नया पोस्ट उसी आलोचना का जवाब माना जा रहा है।
उन्होंने खुद शराब नहीं पीने का संकेत देते हुए व्यंग्य में लिखा, ‘बिना पिए ही शराब चढ़ गई।’
ट्रोल बनाने वालों से बोले—कमाई करो
शाही ने देश-विदेश में रहने वाले नेपाली युवाओं से कहा कि वे जितना चाहें, उन पर रोस्ट वीडियो बनाएं और स्टेटस लिखें। उन्होंने इसे भी व्यंग्य से जोड़ते हुए कहा कि ऐसा करके अच्छी कमाई हो तो नेपाल लौटने का किराया भी जुटा लें।
उनका यह हिस्सा सोशल मीडिया से कमाई करने वाले कंटेंट क्रिएटर्स पर तंज के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही, शाही ने यह संदेश भी देने की कोशिश की कि ऑनलाइन आलोचना से वे पीछे हटने वाले नहीं हैं।
समर्थन भी मिला, भाषा पर सवाल भी
पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं बंटी हुई हैं। शाही के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने लगातार हो रही ट्रोलिंग का अपने अंदाज में जवाब दिया है।
दूसरी ओर, कई लोगों ने सवाल उठाया कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना चाहिए या नहीं। उनका कहना है कि राजनीतिक असहमति का जवाब व्यक्तिगत कटाक्ष और आरोपों से देना बहस का स्तर गिराता है।
नेपाल की राजनीति में सोशल मीडिया अब केवल सूचना देने का माध्यम नहीं रहा। नेताओं के बयान, समर्थकों की प्रतिक्रिया और विरोधियों की ट्रोलिंग कई बार मुख्य राजनीतिक मुद्दे से ज्यादा चर्चा में आ जाते हैं।
ज्ञानेन्द्र शाही का यह पोस्ट भी अब उसी बहस का हिस्सा बन गया है—जनप्रतिनिधि आलोचना का जवाब किस भाषा में दें और डिजिटल मंचों पर राजनीतिक संवाद की सीमा आखिर क्या हो।
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