नेपाल का चाय उद्योग इन दिनों बड़े संकट से गुजर रहा है। भारत ने नेपाली चाय के आयात पर नई प्रक्रिया लागू की है, जिसके बाद देशभर में 53 चाय उद्योग बंद हो चुके हैं। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर स्थिति जल्द नहीं बदली तो 33 और उद्योगों पर ताला लग सकता है।
इसका असर सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं है। एक लाख से ज्यादा मजदूर और 30 हजार से अधिक किसान सीधे प्रभावित हुए हैं। कई परिवारों की आमदनी रुक गई है और चाय क्षेत्र से जुड़े कारोबार पर भी दबाव बढ़ने लगा है।
नेपाल हर साल 1 करोड़ 50 लाख किलो से ज्यादा चाय विदेशों में निर्यात करता रहा है। इससे देश को सालाना लगभग 4 अरब 25 करोड़ नेपाली रुपये की विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। ऐसे में उद्योग जगत इस संकट को सिर्फ व्यापारिक नहीं बल्कि आर्थिक चुनौती के रूप में देख रहा है।
भारत की नई SOP व्यवस्था बनी परेशानी की वजह
चाय व्यवसायियों के अनुसार पिछले करीब एक महीने से भारत में नेपाली चाय भेजने में लगातार दिक्कतें आ रही हैं।
पहले नेपाल से जाने वाले चाय के ट्रकों की सामान्य जांच होती थी और केवल संदेह होने पर कुछ खेपों का परीक्षण किया जाता था। लेकिन अब भारत ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू कर दी है, जिसके तहत सीमा से प्रवेश करने वाली हर चाय खेप का प्रयोगशाला परीक्षण अनिवार्य कर दिया गया है।
उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि जांच प्रक्रिया पूरी होने में 15 से 20 दिन तक लग जाते हैं। इसी कारण भारतीय खरीदार नेपाली चाय लेने से पीछे हट रहे हैं और निर्यात लगभग ठप पड़ गया है।
व्यवसायियों का दावा है कि समस्या चाय की गुणवत्ता से जुड़ी नहीं है। उनका कहना है कि नेपाली चाय पहले से ही जर्मनी, फ्रांस, जापान और अमेरिका जैसे देशों में निर्यात होती रही है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी पहचान बनी हुई है।
भारत पर ज्यादा निर्भरता ने बढ़ाई मुश्किल
नेपाल से निर्यात होने वाली कुल चाय का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा भारत जाता है। बाकी चाय जर्मनी, फ्रांस, जापान, अमेरिका और अन्य देशों के बाजारों में भेजी जाती है।
भारत सबसे बड़ा खरीदार होने के कारण वहां की नीति में बदलाव का सीधा असर नेपाली उद्योग पर पड़ा है। कई गोदामों में बड़ी मात्रा में तैयार चाय जमा हो गई है, लेकिन खरीदार नहीं मिल रहे।
सरकार पर समय रहते पहल न करने का आरोप
चाय उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि उन्होंने एक महीने पहले ही सरकार और संबंधित निकायों को स्थिति से अवगत कराया था।
उनका आरोप है कि समय रहते कोई ठोस पहल नहीं हुई, जिसके कारण इलाम समेत कई क्षेत्रों के उद्योग बंद करने पड़े।
उद्योगपतियों ने नेपाल सरकार से भारत के साथ सरकार-स्तरीय वार्ता शुरू कर समस्या का समाधान निकालने की मांग की है। उनका कहना है कि निर्यात मार्ग सामान्य हुए बिना उद्योगों का संचालन संभव नहीं होगा।
क्या होता है अर्थोडॉक्स चाय?
नेपाल में मुख्य रूप से दो तरह की चाय का उत्पादन होता है—अर्थोडॉक्स और सीटीसी (CTC)।
सीटीसी चाय वही दानेदार चाय है जिसका इस्तेमाल आम तौर पर रोजमर्रा की चाय बनाने में किया जाता है। यह अपेक्षाकृत सस्ती होती है और बाजार में आसानी से उपलब्ध रहती है।
वहीं अर्थोडॉक्स चाय की उत्पादन प्रक्रिया अलग होती है। इसके लिए चाय के पौधे से बेहद कोमल पत्तियां हाथ से चुनी जाती हैं। बाद में विशेष प्रक्रिया से उनका प्रसंस्करण और सुखाने का काम किया जाता है।
तैयार होने पर यह दानेदार नहीं बल्कि सूखी पत्तियों के रूप में दिखाई देती है। उत्पादन लागत अधिक होने के कारण इसकी कीमत भी सीटीसी चाय से ज्यादा होती है।
नेपाल के पहाड़ी और हिमालयी क्षेत्रों में बनने वाली अर्थोडॉक्स चाय की मांग भारत के अलावा जापान, जर्मनी और अन्य विकसित देशों में भी रहती है।
घरेलू बाजार छोटा, निर्यात ही सहारा
अर्थोडॉक्स चाय अपेक्षाकृत महंगी होने के कारण नेपाल के भीतर इसकी खपत सीमित है। यही वजह है कि यह उद्योग लंबे समय से निर्यात बाजार पर निर्भर रहा है।
निर्यात प्रभावित होने के बाद कई उद्योगों के सामने उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो गया है। कारोबारियों का कहना है कि गोदामों में जमा लाखों किलो चाय को बाजार तक पहुंचाने के लिए तत्काल समाधान जरूरी है।
नए बाजारों की तलाश पर जोर
उद्योग जगत का मानना है कि मौजूदा संकट का समाधान केवल भारत के साथ बातचीत तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
उनका कहना है कि नेपाल को दीर्घकालिक रणनीति बनाकर अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अपनी पहुंच बढ़ानी होगी, ताकि भविष्य में किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से पैदा होने वाले जोखिम कम किए जा सकें।
चाय क्षेत्र नेपाल के हजारों किसानों, लाखों मजदूरों और विदेशी मुद्रा आय से जुड़ा हुआ है। इसलिए व्यवसायियों का कहना है कि इसे सिर्फ एक उद्योग की समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए।