# जेनजी आंदोलन पर मानवाधिकार आयोग की 29 पन्नों की रिपोर्ट में क्या है ?
भदौ 23 और 24 को हुए जेनजी आंदोलन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा सार्वजनिक की गई 29 पन्नों की रिपोर्ट ने नेपाल की राजनीति और सामाजिक माहौल में बड़ी बहस खड़ी कर दी है।
आयोग ने अपनी रिपोर्ट में आंदोलन शुरू होने के कारण, आंदोलन कैसे हिंसक बना, किन लोगों की भूमिका देखी गई, सुरक्षा निकाय कहाँ चूके और किन लोगों के खिलाफ जांच तथा कार्रवाई की सिफारिश की गई है, इन सभी विषयों को विस्तार से रखा है।
आंदोलन क्यों शुरू हुआ ?
आयोग के अनुसार तत्कालीन के पी शर्मा वलि सरकार ने संविधान और मानवाधिकार की भावना के विपरीत जाकर मंत्रिपरिषद के निर्णय के आधार पर सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की थी।
इसी फैसले के कारण युवाओं में भारी असन्तोष बढ़ा और यही जेनजी आंदोलन का मुख्य कारण बना।
शांतिपूर्ण आंदोलन अचानक हिंसक कैसे बना ?
रिपोर्ट में आयोग ने भदौ 23 के शांतिपूर्ण बताए गए आंदोलन के अचानक उग्र होने के पीछे दो मुख्य कारण बताए हैं।
पहला कारण TOB लिखी हुई टी–शर्ट पहनने वाले और टैटू बनवाए हुए बाइकर्स समूह का आंदोलन में शामिल होना बताया गया है।
दूसरा कारण “हामी नेपाल” संस्था के अध्यक्ष और वर्तमान रास्व्प्पा सांसद सुदन गुरुङ द्वारा आंदोलन की अगुवाई करना बताया गया है।
आयोग के अनुसार जेनजी अभियंताओं ने काठमांडू जिला प्रशासन से शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति ली थी। लेकिन आंदोलन शुरू होने से पहले ही सुदन गुरुङ की टीम ने तीन एम्बुलेंस और कुछ स्वयंसेवकों को आंदोलन स्थल के आसपास तैयार रखा था।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि जेनजी आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने सुदन गुरुङ को आंदोलन में शामिल न होने की चेतावनी दी थी।
आयोग की रिपोर्ट को आधार मानें तो भदौ 23 का आंदोलन हिंसक बनने में सुदन गुरुङ, हामी नेपाल और TOB समूह को मुख्य भूमिका में देखा गया है।
AI के जरिए भ्रम फैलाया गया ?
आयोग ने दावा किया है कि आंदोलन के दौरान सोशल मीडिया के जरिए योजनाबद्ध तरीके से भ्रम फैलाया गया।
रिपोर्ट के अनुसार “नेपाल प्रहरी” नाम से एक फेक फेसबुक पेज बनाकर यह प्रचार किया गया कि अगर स्कूल ड्रेस पहनकर आंदोलन में आया जाए तो पुलिस गोली नहीं चलाएगी।
आयोग का दावा है कि इसके लिए विभिन्न AI तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।
सिंहदरबार से सुप्रीम कोर्ट तक आगजनी की तैयारी ?
आयोग के अनुसार भदौ 24 को काठमांडू के महत्वपूर्ण सरकारी निकायों जैसे सिंहदरबार और सर्वोच्च अदालत तक को निशाना बनाने की तैयारी की गई थी।
रिपोर्ट में कहा गया है कि आंदोलन शुरू होने से पहले ही कुछ समूहों ने पेट्रोल बम तैयार किए थे।
आयोग ने इस घटना को केवल भीड़ नियंत्रण से बाहर जाने वाली घटना नहीं बल्कि योजनाबद्ध हिंसक गतिविधि के रूप में देखा है।
किन लोगों पर कार्रवाई की सिफारिश ?
रिपोर्ट में कई राजनीतिक नेताओं, सुरक्षा अधिकारियों, अभियंताओं, कलाकारों और यूट्यूबर्स के नाम लेकर जांच की सिफारिश की गई है।
सिफारिश सूची में तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी शर्मा वलि, तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक, रास्वपा सभापति रबि लामिछाने, शुशिला कार्की, ओम प्रकाश अर्याल, गौरि बहादुर कार्की, पृथ्वी सुब्बा गुरुङ, सुदन गुरुङ और TOB समूह का नाम शामिल है।
रास्वपा सांसदों से लेकर यूट्यूबर्स तक जांच के दायरे में
आयोग ने गणेश कार्की, सुलभ खरेल, बब्लु गुप्ता, कृष्ण कार्की, डा. तोषिमा कार्की, राजिव खत्री, शोम शर्मा, केपी खनाल, दिपक बोहरा, पुरुषोत्तम यादव, मनिश झा, ज्वाला संग्रौला, आशिका तामाङ्ग और हरि ढकाल सहित कई नामों का उल्लेख किया है।
इसी तरह जेनजी अभियंता रक्षा बम, हेमराज थापा, विमल पन्त, खेमराज साउद, अमनप्रताप अधिकारी, विवेक थपलिया, सिसन बानिया, असिम मान बस्नेत, यूट्यूबर भाग्य न्यौपाने, टंक दाहाल, रुटिन अफ नेपाल बन्द के संचालक भिक्टर पौडेल, अंकित मल्ल, उमेश बोहरा, शिव यादव, विनोद देउवा और सरु सुनुवार का नाम भी रिपोर्ट में शामिल किया गया है।
पूर्व सचिव भिम उपाध्याय, रवि किरण हमाल, कलाकार निश्चल वस्नेत, दुर्गा प्रसाई, उर्जा बराल, जेरी ताम्राकार, हेमसागर बिद्रोही, वुद्ध छिरिङ्ग, सन्तोष राजावादी, अमित खनाल, दिपक देवकोटा, गौरब बराल, हिमानी राज्य लक्ष्मी सिंह और यूट्यूबर निशान मैनाली पर भी जांच की सिफारिश की गई है।
सुरक्षाकर्मियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर भी सवाल
आयोग ने तत्कालीन प्रहरी महानिरीक्षक चन्द्र कुवेर खापुङ, अतिरिक्त प्रहरी महानिरीक्षक दान बहादुर कार्की, प्रहरी नायब महानिरीक्षक ओम बिक्रम राणा, वरिष्ठ प्रहरी उपरीक्षक विश्व अधिकारी, तत्कालीन सशस्त्र प्रहरी महानिरीक्षक राजु अर्याल, अतिरिक्त सशस्त्र प्रहरी महानिरीक्षक नारायण प्रसाद पौडेल और सशस्त्र प्रहरी उपरीक्षक जीवन के.सी. पर भी जांच की सिफारिश की है।
इसी तरह तत्कालीन प्रमुख जिल्ला अधिकारी छविलाल रिजाल, राष्ट्रिय अनुसन्धान विभाग के प्रमुख हुतराज थापा, निर्देशक कृष्ण खनाल और बानेश्वर तथा संसद भवन क्षेत्र में तैनात सुरक्षाकर्मियों को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए जिम्मेदार माना गया है।
रबि लामिछाने ‘जेल ब्रेक’ मामले में आयोग ने क्या कहा ?
आयोग ने रिपोर्ट में रबि लामिछाने के नख्खु कारागार से बाहर निकलने के मामले को भी गंभीर रूप से उठाया है।
आयोग के अनुसार सुरक्षा कारणों का हवाला देकर रबि लामिछाने के जेल से बाहर आने की खबर फैलने के बाद देशभर के कई कैदियों ने भी जेल तोड़ने की कोशिश की थी।
इसी दौरान भदौ 25 को सुरक्षा बलों की गोली लगने से विभिन्न कारागारों और बाल सुधार केन्द्रों में 10 कैदियों और बालबन्दियों की मौत हुई थी।
आयोग ने इस मामले में रबि लामिछाने और तत्कालीन जेल प्रशासक सत्यराज जोशी पर गहरी जांच की सिफारिश की है।
गोली चलाने के आदेश पर आयोग की टिप्पणी
आयोग ने भदौ 24 की घटना को स्पष्ट रूप से आपराधिक घटना बताया है।
साथ ही आयोग ने कहा है कि तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक और तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी शर्मा वलि केवल “हमने गोली चलाने का आदेश नहीं दिया” कहकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
बालेन शाह का नाम रिपोर्ट में क्यों नहीं ?
रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा प्रधानमंत्री बालेन शाह का नाम रिपोर्ट में शामिल न होने को लेकर हुई।
जबकि आंदोलन से पहले और आंदोलन के दौरान बालेन शाह के फेसबुक स्टेटसों को काफी प्रभावशाली माना गया था।
काठमांडू के मेयर रहते हुए बालेन शाह ने अपनी पत्नी की सरकारी गाड़ी को ट्राफिक पुलिस द्वारा रोके जाने के बाद फेसबुक पर सिंहदरबार जलाने जैसी चेतावनी दी थी।
भदौ 23 की रात उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री ओलि को निशाना बनाते हुए आक्रोशपूर्ण स्टेटस भी लिखा था, जो कुछ ही घंटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच गया था।
मानवाधिकार आयोग ने बालेन शाह से लगभग दो घंटे पूछताछ की थी, लेकिन सार्वजनिक रिपोर्ट में उनका नाम कहीं भी शामिल नहीं किया गया।
सेना की भूमिका पर भी आयोग के सवाल
आयोग ने निष्कर्ष निकाला है कि देशभर में हिंसा फैलने के दौरान नेपाली सेना ने पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाई।
राष्ट्रपति भवन की सुरक्षा के लिए भी सेना प्रभावी तरीके से आगे नहीं बढ़ी, ऐसा आयोग का कहना है।
आयोग ने यह भी कहा कि जांच के दौरान सेना ने पूरा सहयोग नहीं किया।
हालांकि सेना ने लिखित जवाब में कहा कि सरकार द्वारा औपचारिक निर्णय न लेने के कारण 23 और 24 भदौ को सेना परिचालन नहीं किया गया था।
लेकिन आयोग ने सवाल उठाया कि फिर 24 भदौ की रात बिना औपचारिक निर्णय के सेना सड़कों पर कैसे उतर गई।
क्या आयोग की सिफारिशें लागू होंगी ?
आयोग ने रिपोर्ट में जिन लोगों के नाम लिए गए हैं, उन्हें छह महीने तक निलम्बित कर जांच करने की सिफारिश की है।
यदि यह रिपोर्ट लागू होती है तो रास्व्प्पा के कई नेता, कार्यकर्ता, अभियंता, यूट्यूबर और सुरक्षाकर्मी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
हालांकि अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सरकार अपने ही प्रभावशाली नेताओं और सहयोगियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच करने की हिम्मत दिखाएगी या नहीं।