क्या पुराने दलों को निर्मला पंत पर सवाल का नैतिक हक है?
निर्मला पंत से दुष्कर्म और हत्या का मामला एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। इस बार सवाल राष्ट्रीय सभा में उठा कि आखिर निर्मला को न्याय कब मिलेगा। लेकिन इस सवाल के साथ यह चर्चा भी तेज हो गई कि जिन दलों ने पिछले आठ वर्षों में बारी-बारी से सरकार चलाई, वे सत्ता में रहते हुए इस मामले को अंजाम तक क्यों नहीं पहुंचा सके।
निर्मला पंत की हत्या कोई हालिया घटना नहीं है। इस मामले को आठ साल बीत चुके हैं। इस दौरान नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी समेत कई सरकारें बनीं और बदलीं, लेकिन जांच अब तक किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी।
चार महीने में जवाब मांगने पर उठे सवाल
पुराने राजनीतिक दल अब नई सरकार से पूछ रहे हैं कि निर्मला को न्याय कब मिलेगा। हालांकि आलोचकों का कहना है कि जिन दलों के पास इतने वर्षों तक सत्ता रही, वे खुद इस मामले का समाधान नहीं कर सके। ऐसे में नई सरकार के सत्ता संभालने के कुछ ही महीनों बाद इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाना उनकी नैतिक जिम्मेदारी पर भी सवाल खड़ा करता है।
इसका मतलब यह नहीं कि मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है। सरकार पर भी यह दायित्व है कि मामले की सच्चाई सामने लाए और दोषियों को कानून के दायरे में लाए।
संसद में सवाल, गृहमंत्री का जवाब और माफी
राष्ट्रीय सभा में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (नेकपा) के सांसद विष्णुबहादुर विश्वकर्मा ने सरकार से पूछा कि निर्मला पंत को न्याय आखिर कब मिलेगा।
इस पर गृहमंत्री सुदन गुरुङ ने पलटकर पूछा कि जब पहले आपकी सरकार थी तब न्याय क्यों नहीं दिलाया गया। सदन में उनकी इस प्रतिक्रिया पर सवाल उठे। बाद में गृहमंत्री ने स्वयं स्वीकार किया कि जवाब देने का उनका तरीका उचित नहीं था और उन्होंने वहीं सदन में खड़े होकर माफी भी मांगी।
हालांकि इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह चर्चा भी रही कि निर्मला मामले पर सवाल सिर्फ मौजूदा सरकार से नहीं, बल्कि पिछले आठ वर्षों में सरकार चला चुके सभी दलों से भी पूछा जाना चाहिए।
गृहमंत्री ने यह भी कहा कि मामले की जांच गंभीरता से आगे बढ़ रही है और सरकार इसे प्राथमिकता के साथ देख रही है।
शुरुआती जांच की गलतियों ने बढ़ाई मुश्किल
निर्मला पंत हत्याकांड की जांच शुरुआत से ही विवादों में रही। पुलिस अब तक हजारों लोगों से पूछताछ कर चुकी है। फॉरेंसिक जांच भी हुई और कई लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई, लेकिन मामला अब भी अनसुलझा है।
घटना के बाद समाज में यह धारणा भी मजबूत हुई कि इस अपराध में प्रभावशाली लोगों की भूमिका हो सकती है। इसी वजह से जांच को लेकर लगातार संदेह और विवाद बने रहे।
जांच अधिकारियों पर घटनास्थल से मिले सबूतों को सुरक्षित रखने और वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने में गंभीर लापरवाही के आरोप भी लगे। यह लापरवाही अनजाने में हुई या जानबूझकर, इस सवाल का स्पष्ट जवाब आज तक सामने नहीं आ सका।
सिर्फ राजनीति नहीं, राज्य की विश्वसनीयता का सवाल
प्रारंभिक जांच में हुई कमजोरियों का असर पूरे मामले पर पड़ा और यही वजह मानी जाती है कि आठ साल बाद भी यह प्रकरण उलझा हुआ है। इसलिए कुछ ही महीनों में अंतिम नतीजे की उम्मीद करना व्यावहारिक नहीं माना जा सकता। लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि जांच अनिश्चित समय तक चलती रहे।
निर्मला पंत का मामला अब किसी एक राजनीतिक दल के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप का विषय भर नहीं रह गया है। यह नेपाल पुलिस की जांच व्यवस्था, न्याय प्रणाली और राज्य की जवाबदेही पर खड़ा एक बड़ा सवाल है।
निर्मला को न्याय दिलाना किसी सरकार या दल की राजनीतिक जीत-हार का मुद्दा नहीं, बल्कि राज्य की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है।
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