रावल आयोग की रिपोर्ट लागू, 1,859 रोपनी सरकारी जमीन वापस लेने की तैयारी

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नेपाल सरकार ने एक ऐसे पुराने मामले को फिर से सक्रिय करने का फैसला किया है, जिस पर पिछले तीन दशक से चर्चा तो होती रही, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी। मंत्रिपरिषद की हालिया बैठक में रावल आयोग की रिपोर्ट लागू करने का निर्णय लिया गया है। सरकार का मानना है कि इससे काठमांडू महानगर क्षेत्र में अतिक्रमण की गई 1,859 रोपनी से अधिक सरकारी जमीन वापस सरकारी नाम पर आ सकती है।

इस फैसले के बाद राजधानी के विभिन्न इलाकों में सरकारी जमीन पर बने मकानों, दीवारों और अन्य संरचनाओं को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। अनुमान है कि संबंधित जमीन की मौजूदा बाजार कीमत 2 खर्ब नेपाली रुपये से भी अधिक हो सकती है।

क्या था रावल आयोग?

रावल आयोग का गठन लोकतंत्र बहाली के शुरुआती दौर में किया गया था। उस समय काठमांडू घाटी में जमीन की कीमत तेजी से बढ़ रही थी और सरकारी, सार्वजनिक तथा गुठी की जमीन निजी स्वामित्व में जाने के आरोप लगातार सामने आ रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला की सरकार ने पूर्व सचिव रामबहादुर रावल की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय आयोग बनाया। आयोग को 2021 साल की नापी को आधार मानकर सरकारी जमीन पर हुए अतिक्रमण की जांच करने की जिम्मेदारी दी गई थी।

तीन साल की जांच में क्या मिला?

आयोग ने करीब तीन वर्षों तक काठमांडू महानगर के सभी वार्डों में विस्तृत अध्ययन और नापजांच की थी।

रिपोर्ट में कहा गया कि महानगर क्षेत्र की कुल सार्वजनिक जमीन में से 1,859 रोपनी 14 आना 3 पैसा 3 दाम जमीन विभिन्न तरीकों से अतिक्रमण की चपेट में आ चुकी थी।

जांच के दौरान करीब 2,070 कित्तों में फैली इस जमीन पर 8 हजार से ज्यादा व्यक्ति और संस्थाओं की संलग्नता होने का उल्लेख किया गया था।

रिपोर्ट में क्या सिफारिश की गई थी?

साल 2052 में सरकार को सौंपी गई लगभग 1,350 पृष्ठों की रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए गए थे।

  • अतिक्रमित जमीन को तत्काल सरकारी नाम पर वापस लाया जाए।
  • सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों के लालपुर्जे रद्द किए जाएं।
  • दोषी व्यक्तियों और संस्थाओं पर कानूनी कार्रवाई हो।
  • भूमि प्रशासन से जुड़े जिम्मेदार कर्मचारियों की भी जवाबदेही तय की जाए।
  • सार्वजनिक जमीन का डिजिटल अभिलेख तैयार किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट भी दे चुका है निर्देश

रिपोर्ट लागू न होने पर वर्ष 2060 में अधिवक्ता प्रकाशमणि शर्मा सहित कुछ नागरिकों ने सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया था।

लंबी सुनवाई के बाद 2067 में सर्वोच्च अदालत ने सरकार को रावल आयोग की रिपोर्ट को प्राथमिकता के साथ लागू करने का निर्देश दिया। अदालत ने सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा को राज्य की जिम्मेदारी बताते हुए अतिक्रमित जमीन खाली कराने और कानूनी संरक्षण सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया था।

तीन दशक तक क्यों अटकी रही कार्रवाई?

रावल आयोग की रिपोर्ट लंबे समय तक फाइलों में ही सीमित रही। विभिन्न राजनीतिक दलों, प्रशासनिक तंत्र और प्रभावशाली कारोबारी समूहों के बीच मौजूद हितों के टकराव को इसकी बड़ी वजह माना जाता रहा है।

रिपोर्ट को लेकर समय-समय पर यह भी चर्चा होती रही कि इसमें कई प्रभावशाली व्यक्तियों और संस्थानों से जुड़े संवेदनशील विवरण शामिल हैं। इसी कारण रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और उस पर कार्रवाई करने में लगातार देरी होती रही।

सरकारी जमीन की कीमत कितनी हो सकती है?

आयोग द्वारा चिन्हित 1,859 रोपनी जमीन लगभग 29,758 आना के बराबर मानी जाती है।

काठमांडू के न्युरोड, बानेश्वर, चाबहिल, थापाथली और बौद्ध जैसे क्षेत्रों में जमीन की कीमत आज कई जगह प्रति आना 70 लाख से लेकर 1 करोड़ नेपाली रुपये या उससे भी अधिक बताई जाती है। इसी आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि विवादित जमीन का कुल मूल्य 2 खर्ब रुपये से ऊपर पहुंच सकता है।

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती

मंत्रिपरिषद के फैसले के बाद अब भूमि व्यवस्था मंत्रालय और गृह मंत्रालय को आगे की प्रक्रिया संभालनी होगी।

हालांकि स्थिति पहले जैसी नहीं है। जिन जमीनों की पहचान तीन दशक पहले हुई थी, उनमें से कई बार-बार खरीदी और बेची जा चुकी हैं। कई मामलों में मौजूदा मालिक चौथी या पांचवीं पीढ़ी के खरीदार हो सकते हैं।

ऐसे में जमीन वापस लेने की प्रक्रिया केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि कानूनी और राजनीतिक चुनौती भी बन सकती है।

फिर भी यदि सरकार अपने फैसले को प्रभावी ढंग से लागू कर पाती है, तो इसे नेपाल में सरकारी संपत्ति की पुनर्प्राप्ति और भू-माफिया के खिलाफ सबसे बड़े अभियानों में से एक माना जाएगा।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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