नारायणी के खतरे में सुस्ता, बस्ती बचाने को जनश्रमदान से तटबंध
नारायणी नदी का बहाव बढ़ने के साथ ही सुस्ता के लोगों की चिंता फिर बढ़ गई है। नदी किनारे बसे इलाकों में कटान और पानी घुसने का खतरा है। स्थायी तटबंध का काम सीमा से जुड़े विवाद और प्रशासनिक अड़चनों में फंसा है, इसलिए फिलहाल गांव के लोग खुद बोरे और बालू लेकर नदी किनारे जुटे हैं।
सुस्ता गांवपालिका-5 के सुस्ता थारूटोल से लेकर नेपाल-भारत सीमा के पास सिमल के पेड़ वाले इलाके तक अस्थायी तटबंध बनाया जा रहा है। बुधवार से स्थानीय लोगों के साथ नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस के जवान भी इस काम में लगे हैं।
नदी का पानी बस्ती की तरफ न आए, इसके लिए बालू और मिट्टी से भरे बोरे किनारे पर लगाए जा रहे हैं। इन्हें नाइलन की रस्सियों से बांधा जा रहा है। जहां कटान का खतरा ज्यादा है, वहां अतिरिक्त अवरोध तैयार किए जा रहे हैं।
सुस्ता बचाओ अभियान के प्रवक्ता रविन्द्र जैसवाल के मुताबिक, अभी सबसे जरूरी काम बस्ती को बचाना है। नारायणी में पानी और बढ़ने की आशंका को देखते हुए स्थानीय लोग और तीनों सुरक्षा बल चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं।
जैसवाल ने कहा, “अभी हमारी पहली प्राथमिकता गांव को डूबने और नदी के कटान से बचाना है। जब तक स्थायी समाधान नहीं होता, स्थानीय लोगों के श्रम और उपलब्ध साधनों से अस्थायी बांध बना रहे हैं।”
स्थायी तटबंध का काम अब तक क्यों नहीं बढ़ा
सुस्ता में हर साल की तरह इस बार भी अस्थायी इंतजाम किए जा रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों की चिंता सिर्फ मौजूदा बाढ़ तक सीमित नहीं है। वे लंबे समय से नारायणी के कटान को रोकने के लिए स्थायी तटबंध की मांग कर रहे हैं।
नारायणी सिंचाई तथा जल उत्पन्न प्रकोप व्यवस्थापन आयोजना, भरतपुर ने पहले ठेका प्रक्रिया के जरिए स्थायी तटबंध बनाने की तैयारी की थी। स्थानीय लोगों के अनुसार, सीमावर्ती क्षेत्र में निर्माण के लिए भारतीय पक्ष से ऊपरी स्तर की मंजूरी जरूरी बताए जाने के बाद काम आगे नहीं बढ़ सका।
इससे पहले स्थानीय लोगों ने अपने स्तर पर एक अस्थायी तटबंध बनाया था। आरोप लगा था कि भारतीय सीमा सुरक्षा बल एसएसबी ने उसे तोड़ दिया। मामला सामने आने के बाद सुस्ता का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में आया था।
स्थानीय प्रशासन और संबंधित निकायों के बीच बातचीत भी हुई, लेकिन स्थायी संरचना बनाने का रास्ता तत्काल नहीं निकल सका। अब बारिश बढ़ने और नारायणी का जलस्तर ऊपर जाने के बीच पूरा जोर फिलहाल बस्ती को तत्काल बचाने पर है।
सरकार से बोरे और रस्सी, गांव से बालू और श्रम
अस्थायी तटबंध के लिए नारायणी सिंचाई तथा नेपाल गंडक पश्चिम नहर सिंचाई व्यवस्थापन कार्यालय ने बोरे और नाइलन की रस्सी उपलब्ध कराई है। स्थानीय लोग भी अपने स्तर पर बोरे, बालू और दूसरी जरूरी सामग्री जुटा रहे हैं।
नदी की स्थिति लगातार देखी जा रही है। बहाव और बढ़ा तो काम का दायरा भी बढ़ाना पड़ सकता है। जैसवाल के मुताबिक, जरूरत पड़ने पर ज्यादा लोगों और सामग्री को लगाकर उन हिस्सों को सुरक्षित करने की कोशिश की जाएगी, जहां कटान का खतरा अधिक है।
सुस्ता के लोगों के लिए बालू से भरे बोरे लगाकर नदी रोकने की यह कोशिश नई नहीं है। बरसात में नारायणी का कटान और बाढ़ यहां बार-बार बस्ती के लिए खतरा बनते रहे हैं। अस्थायी बांध कुछ समय के लिए पानी रोक सकता है, लेकिन स्थानीय लोग इसे समस्या का स्थायी हल नहीं मानते।
उनकी मांग है कि नेपाल और भारत के संबंधित निकाय सीमा से जुड़े तकनीकी और प्रशासनिक सवालों का समाधान निकालें और स्थायी तटबंध का काम आगे बढ़ाएं।
फिलहाल उस समाधान का इंतजार जारी है। नदी का पानी बढ़ रहा है और सुस्ता के लोग सरकारी बोरे और रस्सियों, अपने जुटाए बालू और सामूहिक मेहनत के सहारे बस्ती बचाने में लगे हैं।
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