मधेश में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के भीतर तनाव अब खुलकर सामने आने लगा है। जिस प्रदेश ने चुनाव में पार्टी को सबसे बड़ा राजनीतिक सरप्राइज दिया था, वहीं अब संगठन के अंदर गुटबाज़ी, टिकट राजनीति और नेताओं के बीच टकराव बढ़ता दिख रहा है।
प्रतिनिधि सभा की 32 सीटों वाले मधेश प्रदेश में रास्वपा ने चुनाव के दौरान अभूतपूर्व समर्थन हासिल किया था। पार्टी को यहां ऐसी सफलता मिली जिसकी उम्मीद खुद पार्टी नेतृत्व ने भी शायद नहीं की थी। लेकिन चुनाव खत्म हुए अभी दो महीने भी पूरे नहीं हुए कि मधेश में पार्टी की आंतरिक स्थिति असहज होने लगी है।
स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष बढ़ रहा है। आरोप यह भी लगने लगे हैं कि “नई पार्टी” कहे जाने के बावजूद कई नेता पुरानी पार्टियों वाली राजनीति ही दोहरा रहे हैं।
इसका सबसे बड़ा दृश्य शुक्रवार को बारा जिले में देखने को मिला।
बारा में जिला बैठक के दौरान हंगामा
कलैया के एक होटल में चल रही रास्वपा की जिला विस्तारित बैठक उस समय तनावपूर्ण हो गई जब पार्टी कार्यकर्ताओं ने वहीं से निर्वाचित चार सांसदों के खिलाफ नारेबाज़ी शुरू कर दी।
बैठक स्थल पर अचानक अफरा-तफरी जैसी स्थिति बन गई। पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा और स्थिति बिगड़ने की आशंका देखते हुए चारों सांसदों को सुरक्षा घेराबंदी में कार्यक्रम स्थल से बाहर निकाला गया। बाहर दोनों गुटों के कार्यकर्ताओं के बीच धक्का-मुक्की भी हुई।
बारा से निर्वाचित सांसद रहबर अंसारी, अरबिंद साह, गणेश धिमाल और चंदन सिंह कार्यक्रम में मौजूद थे।
विवाद की जड़ हाल ही में पूर्व जिला सभापति चंदन स्वर्णकार को पार्टी से निष्कासित किया जाना बताया जा रहा है। पार्टी ने उनकी साधारण सदस्यता तक रद्द कर दी थी।
स्वर्णकार बारा में रास्वपा संगठन के भीतर लंबे समय से सक्रिय चेहरा रहे हैं। स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है।
उनके समर्थकों का आरोप है कि जिला अधिवेशन से पहले उन्हें रास्ते से हटाने के लिए कार्रवाई की गई।
नई पार्टी, लेकिन पुराने तौर-तरीकों के आरोप
मधेश में रास्वपा को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब यही उठने लगा है कि क्या पार्टी भी धीरे-धीरे उन्हीं राजनीतिक संस्कारों में फंसती जा रही है जिनके खिलाफ जनता ने उसे समर्थन दिया था।
पार्टी के कई जिला, प्रदेश और स्थानीय स्तर के नेता पहले कांग्रेस, एमाले, माओवादी और मधेशवादी दलों में सक्रिय रह चुके हैं। वहां अवसर नहीं मिलने के बाद वे रास्वपा में आए।
लेकिन अब कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनने लगी है कि चेहरे भले नए हों, राजनीतिक व्यवहार वही पुराना है।
गुटबंदी, शक्ति प्रदर्शन, टिकट के लिए खींचतान और संगठन पर नियंत्रण की राजनीति अब खुलकर दिखने लगी है।
यही कारण है कि मधेश में पार्टी के भीतर बेचैनी बढ़ रही है।
अमरेश कुमार सिंह पहले ही दे चुके थे संकेत
कुछ दिन पहले सांसद अमरेश कुमार सिंह ने भी एक मीडिया इंटरव्यू में रास्वपा के भीतर चल रही खींचतान को लेकर संकेत दिए थे।
मधेश में इस चुनाव में जीते कई चेहरे “बालेन लहर” के सहारे उभरे माने जाते हैं, लेकिन अमरेश कुमार सिंह को अलग तरह का नेता माना जाता है। वे पहले भी कांग्रेस और स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत चुके हैं और क्षेत्र में उनकी अपनी राजनीतिक पकड़ रही है।
इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि पार्टी के भीतर निजी स्वार्थ और गुटीय राजनीति बढ़ने लगी है।
उस समय रास्वपा समर्थकों ने उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। लेकिन बारा की घटना के बाद अब वही सवाल फिर उठने लगे हैं।
चंदन स्वर्णकार ने लगाए गंभीर आरोप
रास्वपा ने स्वर्णकार पर आर्थिक अनियमितता और चुनाव के दौरान अपनी ही पार्टी के उम्मीदवारों को हराने की कोशिश करने जैसे आरोप लगाए हैं।
पार्टी अनुशासन आयोग की सिफारिश के बाद केंद्रीय समिति ने उनके खिलाफ कार्रवाई की।
लेकिन स्वर्णकार का दावा है कि मामला राजनीतिक बदले की भावना से जुड़ा है।
उन्होंने हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में आरोप लगाया कि चुनाव के समय कई लोगों से टिकट दिलाने के नाम पर आवेदन फॉर्म भरवाए गए और उनसे 25-25 हजार रुपये लिए गए।
लेकिन टिकट बाद में उन लोगों को दे दिए गए जो दूसरी पार्टियों से आकर रास्वपा में शामिल हुए थे।
स्वर्णकार का कहना है कि उन्होंने पार्टी के भीतर बार-बार यह मुद्दा उठाया कि जिन लोगों से पैसे लिए गए थे, उन्हें या तो अवसर दिया जाए या उनका पैसा लौटाया जाए।
उनके मुताबिक, इसी के बाद निर्वाचित सांसद उनसे नाराज़ हो गए।
उन्होंने यह भी दावा किया कि स्थानीय चुनाव से पहले कुछ सांसद मेयर और वॉर्ड अध्यक्ष के टिकट बांटने के वादे कर रहे थे, जबकि केंद्र से इस तरह की मनमानी रोकने का निर्देश था।
स्वर्णकार का आरोप है कि जिला अधिवेशन में उन्हें सभापति पद की दौड़ से बाहर करने के लिए ही उनके खिलाफ कार्रवाई करवाई गई।
इसी वजह से उनके समर्थकों ने शुक्रवार को चारों सांसदों का विरोध किया।
स्थानीय चुनाव से पहले बढ़ रही खींचतान
भारी पुलिस उपस्थिति के बीच कार्यक्रम आखिरकार पूरा हुआ, लेकिन इस घटना ने रास्वपा के भीतर चल रही गहरी प्रतिस्पर्धा को उजागर कर दिया है।
मधेश में अब असली लड़ाई संगठन और टिकट वितरण पर पकड़ बनाने की दिखाई दे रही है।
रास्वपा का मधेश में अभी मजबूत संस्थागत ढांचा नहीं बन पाया है। चुनाव के दौरान युवा असंतोष, व्यवस्था विरोधी माहौल और बालेन शाह की लोकप्रियता के कारण पार्टी को तेज समर्थन मिला था।
लेकिन उस चुनावी लहर को स्थायी संगठन में बदलना अब पार्टी के लिए चुनौती बनता जा रहा है।