नेपाल के पूर्वी पहाड़ी इलाकों में उगाई जाने वाली चाय इस समय गंभीर संकट से गुजर रही है। झापा जिले की 30 चाय फैक्ट्रियां गुरुवार से बंद हो गई हैं। इससे पहले इलाम में 53 उद्योगों ने काम रोक दिया था। दोनों जिलों को मिलाकर अब बंद चाय उद्योगों की संख्या 83 तक पहुंच गई है।
उद्योग बंद होने का असर सीधे किसानों और मजदूरों पर पड़ रहा है। चाय क्षेत्र से जुड़े संगठनों का कहना है कि 1 लाख 60 हजार से अधिक श्रमिक और उनके परिवार इस संकट से प्रभावित हुए हैं। सिर्फ झापा में ही 60 हजार से ज्यादा लोगों की रोजी-रोटी पर खतरा मंडरा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि अगर जल्द समाधान नहीं निकला तो खेतों और बागानों में तैयार चाय की पत्तियां समय पर प्रसंस्करण के लिए नहीं पहुंच पाएंगी। ऐसी स्थिति में किसानों की मेहनत और अरबों रुपये मूल्य की उपज बर्बाद होने का खतरा है।
भारत में नई प्रक्रिया बनी बड़ी वजह
चाय उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि संकट की जड़ भारत में नेपाली चाय के निर्यात पर बढ़ी प्रशासनिक बाधाएं हैं। नेपाल की बड़ी मात्रा में चाय भारतीय बाजार में जाती है। ऐसे में सीमा पर पैदा हुई नई दिक्कतों ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया है।
उद्योगों के अनुसार, भारत ने 2026 से लागू नई मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत नेपाल से आने वाली हर खेप की अलग-अलग जांच शुरू की है। परीक्षण रिपोर्ट आने में 15 से 20 दिन तक लग रहे हैं। इस कारण चाय लेकर जाने वाले ट्रक सीमा पर फंसने लगे हैं।
इस प्रक्रिया ने निर्यात की लागत बढ़ा दी है। साथ ही भारतीय खरीदार भी नेपाली चाय खरीदने को लेकर पहले की तुलना में ज्यादा सतर्क हो गए हैं।
गुणवत्ता पर दुनिया की मुहर, फिर भी परेशानी
दिलचस्प बात यह है कि जिस गुणवत्ता को लेकर निर्यात में मुश्किलें खड़ी हो रही हैं, उसी नेपाली चाय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार सराहना मिल रही है।
चीन में आयोजित दूसरे अंतरराष्ट्रीय चाय गुणवत्ता प्रतियोगिता में नेपाली कंपनियों ने स्वर्ण और रजत पदक हासिल किए थे। वहीं अमेरिका की नॉर्थ अमेरिकन टी चैंपियनशिप में नेपाल की हिमालयन गोल्ड ब्लैक टी को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ ब्लैक टी का सम्मान मिल चुका है।
नेपाल सरकार भी “नेपाल टी–क्वालिटी फ्रॉम द हिमालयाज” नाम से आधिकारिक गुणवत्ता पहचान कार्यक्रम चला चुकी है, ताकि वैश्विक बाजार में नेपाली चाय की अलग पहचान बनाई जा सके।
दार्जिलिंग से प्रतिस्पर्धा की चर्चा
चाय क्षेत्र के जानकार इस विवाद के पीछे बाजार प्रतिस्पर्धा को भी एक कारण मानते हैं।
उनका कहना है कि दार्जिलिंग क्षेत्र के कई चाय बागान काफी पुराने हो चुके हैं और उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। दूसरी ओर इलाम और नेपाल के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों की ऑर्थोडॉक्स चाय ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मजबूत जगह बनाई है।
बेहतर गुणवत्ता और अपेक्षाकृत कम कीमत के कारण नेपाली चाय की मांग बढ़ी है। उद्योग जगत का आरोप है कि इसी वजह से कुछ कारोबारी समूहों ने भारत सरकार पर कड़े नियम लागू करने का दबाव बनाया।
हालांकि इस दावे पर भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
सवाल सिर्फ कारोबार का नहीं
नेपाल और भारत के बीच व्यापारिक संबंध लंबे समय से गहरे रहे हैं। भारत नेपाल का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। नेपाल का अधिकांश आयात भारत से होता है और भारतीय वस्तुओं के लिए नेपाल महत्वपूर्ण बाजार माना जाता है।
ऐसे समय में, जब चाय तोड़ने और निर्यात का प्रमुख मौसम शुरू हो चुका है, अचानक लागू हुई नई प्रक्रियाओं ने चिंता बढ़ा दी है। उद्योग जगत का कहना है कि बिना पर्याप्त तैयारी और सहूलियत के नियमों में बदलाव का सबसे बड़ा असर किसानों, मजदूरों और छोटे उद्योगों पर पड़ता है।
इसी कारण दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय बातचीत की मांग तेज हो रही है।
कूटनीतिक पहल में देरी का आरोप
उद्योग क्षेत्र का एक वर्ग मानता है कि भारत में नियमों के बदलाव के दौरान नेपाल की ओर से समय रहते प्रभावी कूटनीतिक पहल नहीं हो सकी।
उनका कहना है कि देश के भीतर राजनीतिक बदलाव और सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया के कारण सरकार का ध्यान लंबे समय तक आंतरिक मामलों पर केंद्रित रहा। इसी दौरान चाय निर्यात से जुड़ी समस्या गंभीर होती चली गई।
चाय उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क है कि यदि शुरुआती चरण में ही दिल्ली स्थित नेपाली दूतावास, भारत के वाणिज्य मंत्रालय और अन्य संबंधित निकायों के साथ सक्रिय संवाद शुरू किया जाता, तो हालात इतने खराब नहीं होते।
नई बाजार रणनीति की मांग
फिलहाल इलाम और झापा में 83 उद्योग बंद हो चुके हैं और इसका असर लाखों लोगों के जीवन पर पड़ रहा है। इसलिए इसे केवल चाय उद्योग की समस्या नहीं माना जा रहा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार से जुड़ा बड़ा मुद्दा समझा जा रहा है।
सरोकार वाले पक्षों का कहना है कि नेपाल सरकार को भारत के साथ तत्काल सरकार-स्तरीय वार्ता शुरू करनी चाहिए। साथ ही लंबे समय के लिए ऐसी रणनीति तैयार करनी होगी जिससे नेपाली चाय केवल भारतीय बाजार पर निर्भर न रहे।
अमेरिका, यूरोप, जापान और मध्य पूर्व जैसे बाजारों में पहुंच बढ़ाने की मांग भी इसी कारण जोर पकड़ रही है। उद्योग जगत का मानना है कि अगर समय रहते वैकल्पिक बाजार नहीं खोजे गए तो आज का यह संकट आने वाले वर्षों में और गहरा सकता है।