रास्वपा के पहले महाधिवेशन का अंत, नई टीम बनी लेकिन विवाद नहीं थमे

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राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) का पहला राष्ट्रीय महाधिवेशन आखिरकार तय समय से दो दिन देरी के बाद पूरा हो गया। तीन दिन में समाप्त करने की योजना के साथ शुरू हुआ यह अधिवेशन पांचवें दिन जाकर खत्म हुआ। महाधिवेशन के समापन के साथ पार्टी की नई नेतृत्व टीम का चयन भी हो गया, लेकिन पूरे आयोजन पर विवाद, असंतोष और गुटबाजी के आरोप भी लगातार छाए रहे।

रवि लामिछाने निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष चुने गए हैं। वहीं, पार्टी के वरिष्ठ नेता की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री बालेन शाह संभालेंगे।

उपाध्यक्ष पद पर पुरुष कोटे से स्वर्णिम वाग्ले निर्विरोध निर्वाचित हुए। महिला उपाध्यक्ष के लिए हुए मुकाबले में सोबिता गौतम ने तोशिमा कार्की को हराया। पार्टी ने एक और उपाध्यक्ष मनोनीत करने का फैसला भी किया है।

महासचिव पद के चुनाव में विपिन कुमार आचार्य ने मनीष झा, गणेश कार्की और सागर ढकाल को पीछे छोड़ते हुए जीत दर्ज की। इसके अलावा एक और महासचिव मनोनीत किया जाएगा।

सहमहासचिव पद पर हरि ढकाल, निशा डांगी और आशिम शाह विजयी रहे। इन पदों के लिए कई उम्मीदवार मैदान में थे, लेकिन जीत इन्हीं तीन नेताओं को मिली। पार्टी आगे दो और सहमहासचिव भी मनोनीत करेगी।

19 सदस्यीय पदाधिकारी टीम बनेगी

निर्वाचित पदाधिकारियों के अलावा पार्टी एक प्रवक्ता, तीन सहप्रवक्ता, एक कोषाध्यक्ष और दो सह-कोषाध्यक्ष भी मनोनीत करेगी। चुनाव और मनोनयन के बाद रास्वपा की कुल 19 सदस्यीय पदाधिकारी टीम तैयार होगी।

बताया जा रहा है कि बालेन शाह खेमे के नेताओं को मनोनयन के जरिए जिम्मेदारी देने पर सहमति बनी थी। इसी कारण उस समूह के अधिकांश नेताओं ने कई पदों पर चुनाव नहीं लड़ा।

पार्टी के भीतर शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए रवि लामिछाने समर्थक नेताओं को चुनाव के जरिए और बालेन शाह समर्थक नेताओं को मनोनीत पदों के माध्यम से जिम्मेदारी देने की सहमति बनी।

इसी महाधिवेशन में 99 सदस्यीय केंद्रीय समिति का भी चुनाव पूरा किया गया।

महाधिवेशन में विवाद भी साथ-साथ चले

महाधिवेशन 7 असार से शुरू होकर 9 असार तक खत्म होना था, लेकिन दो पक्षों के बीच सहमति नहीं बनने से कार्यक्रम पांच दिन तक खिंच गया।

करीब चार साल पहले स्थापित रास्वपा के लिए यह पहला राष्ट्रीय महाधिवेशन था। इसे पार्टी के लिए अपनी राजनीतिक पहचान और मजबूत करने का अवसर माना जा रहा था, लेकिन पूरे आयोजन के दौरान कई विवाद सामने आए।

पिछले पांच दिनों में महाधिवेशन को लेकर अव्यवस्था, अंदरूनी खींचतान और तीखी बयानबाजी की चर्चा लगातार होती रही।

पदाधिकारी चुनाव के दौरान भी कुल प्रतिनिधियों में से करीब एक-तिहाई ही मतदान कर सके। कई प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि महज दो मिनट की देरी का हवाला देकर उन्हें वोट डालने से रोक दिया गया।

पार्टी के कई प्रभावशाली नेताओं और रास्वपा से निर्वाचित सांसदों ने भी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सोशल मीडिया के जरिए खुलकर असंतोष जताया।

महाधिवेशन के उद्घाटन के समय रवि लामिछाने और बालेन शाह ने सभी नेताओं से गुटबाजी से बचने की अपील की थी। लेकिन पदाधिकारी चुनाव से पहले कविन्द्र बुढालाकोटी, गणेश पराजुली समेत कुछ नेताओं ने अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर विपिन कुमार आचार्य के समर्थन की घोषणा कर दी। इसके बाद उम्मीदवार गणेश कार्की ने नेतृत्व पर गुटबंदी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया।

सुप्रीम कोर्ट जाने की चेतावनी, प्रतिनिधित्व पर भी बहस

महाधिवेशन के बाद विवाद यहीं नहीं रुका।

गंडकी प्रदेश की प्रतिनिधि पूजा बास्तोला ने आरोप लगाया कि उनसे कम वोट पाने वाले उम्मीदवारों को केंद्रीय सदस्य बना दिया गया, जबकि अधिक मत मिलने के बावजूद उनका नाम सूची में शामिल नहीं किया गया।

उन्होंने दावा किया कि शिकायत दर्ज कराने पर उन्हें धमकी दी गई। अब उन्होंने इस मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने की घोषणा की है।

उधर, नए नेतृत्व को लेकर सामाजिक स्तर पर भी सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि अध्यक्ष से लेकर अधिकांश प्रमुख पदों पर ब्राह्मण और क्षेत्री समुदाय के नेताओं का वर्चस्व है, जबकि दलित और जनजाति समुदायों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिखता।

फिलहाल, महाधिवेशन में निर्वाचित पदाधिकारियों और केंद्रीय सदस्यों का शपथ ग्रहण कार्यक्रम जारी है।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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