मदन भंडारी की 75वीं जयंती पर काठमांडू में आयोजित एक विचार गोष्ठी ने देश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। कार्यक्रम में चार पूर्व प्रधानमंत्री एक ही मंच पर नजर आए, जिसके बाद वाम दलों के बीच संभावित राजनीतिक सहयोग को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं।
मदन भंडारी फाउंडेशन की ओर से राष्ट्रीय सभागृह में आयोजित इस कार्यक्रम में नेपाल के प्रधानमंत्री और एमाले अध्यक्ष केपी शर्मा ओली, नेकपा के संयोजक पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’, सह-संयोजक माधव कुमार नेपाल और वरिष्ठ नेता झलनाथ खनाल शामिल हुए। पूर्व राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी की मौजूदगी ने भी कार्यक्रम को खास बना दिया।
हाल के दिनों में नेपाल की वाम राजनीति में संवाद और साझा रणनीति को लेकर लगातार चर्चा चल रही है। ऐसे माहौल में इन शीर्ष नेताओं का एक मंच पर आना सिर्फ औपचारिक उपस्थिति नहीं माना जा रहा। राजनीतिक हलकों में इसे भविष्य की संभावित दिशा से जोड़कर देखा जा रहा है।
इससे पहले विराटनगर में आयोजित एक कार्यक्रम में प्रचंड ने कहा था कि एमाले के साथ संसद और सड़क, दोनों स्तरों पर मिलकर काम करने का माहौल बन रहा है। उनके अनुसार, फिलहाल पार्टी एकीकरण की स्थिति नहीं है, लेकिन साझा मुद्दों पर सहयोग की समझ विकसित हुई है।
प्रचंड ने अपने राजनीतिक जीवन में कई बार बड़े बदलाव करने का जिक्र करते हुए यह भी संकेत दिया था कि आगामी महाधिवेशन के बाद एक नया राजनीतिक मोड़ देखने को मिल सकता है। उन्होंने इसे अपने राजनीतिक सफर का “अंतिम क्रमभंग” बताते हुए पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं से उसके लिए तैयार रहने की अपील की थी।
आज के संदेश पर टिकी निगाहें
इसी पृष्ठभूमि में मदन भंडारी जयंती कार्यक्रम में मौजूद नेताओं के संबोधन और उनके बीच दिखाई देने वाले राजनीतिक संकेतों पर सबकी नजर रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में वाम दलों के बीच सहयोग किस दिशा में बढ़ता है, इसकी शुरुआती झलक ऐसे आयोजनों से मिल सकती है। इसलिए इस कार्यक्रम को केवल स्मृति समारोह नहीं, बल्कि नेपाल की बदलती राजनीतिक तस्वीर के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।