नेपाल में नई सरकार बनने के समय सुदन गुरुङ को गृह मंत्रालय सौंपे जाने पर खूब सवाल उठे थे। उनके अनुभव और प्रशासन चलाने की क्षमता को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी बहस हुई। कई लोगों ने इसे सरकार की शुरुआती गलत नियुक्ति तक बताया।
करीब चार महीने बाद तस्वीर कुछ बदली हुई दिख रही है।
हाल की दो संवेदनशील घटनाओं में गुरुङ खुद पीड़ितों के बीच पहुंचे। अस्पताल में मौजूद रहे, परिवार के साथ लंबी बातचीत की और विस्थापित लोगों की शिकायत सुनने के लिए दूसरे मंत्रियों को लेकर राहत स्थल तक गए।
इन कोशिशों से सभी समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं। लेकिन इतना जरूर हुआ है कि संकट में फंसे नागरिकों को सरकार का कोई चेहरा अपने सामने दिखाई दिया।
नेपाल की प्रशासनिक व्यवस्था में यह सामान्य बात नहीं है। मंत्री अक्सर रिपोर्ट मंगाते हैं, अधिकारियों को निर्देश देते हैं और मंत्रालय से स्थिति की जानकारी लेते हैं। पीड़ित परिवार के बीच बैठना, रात तक अस्पताल में रहना या समाधान निकलने तक सीधे बातचीत में जुटे रहना कम ही दिखता है।
राहदानी विभाग के बाहर एक युवक की मौत
कुछ दिन पहले काठमांडू स्थित राहदानी विभाग के बाहर मुगु के 25 वर्षीय गणेश नेपाली ने आत्मदाह का प्रयास किया था। गंभीर हालत में उन्हें वीर अस्पताल ले जाया गया।
घटना की जानकारी मिलने के बाद गृहमंत्री गुरुङ अस्पताल पहुंचे। उन्होंने डॉक्टरों से इलाज की स्थिति समझी और घटना से जुड़ी जानकारी ली।
अगले दिन गणेश की मौत हो गई।
एक युवा का सरकारी कार्यालय के सामने खुद को आग लगा लेना केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं थी। इस घटना ने सरकारी सेवा तक नागरिक की पहुंच, कर्मचारियों के व्यवहार और प्रशासन की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।
सड़क से संसद तक नाराजगी दिखाई दी। सोशल मीडिया पर भी सरकार की आलोचना हुई। मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में बदलने का खतरा था, जबकि परिवार अपने सदस्य की मौत का जवाब और सम्मानजनक समाधान चाहता था।
गुरुङ ने काठमांडू के प्रमुख जिला अधिकारी, महानगरपालिका के प्रतिनिधियों और संबंधित पक्षों को साथ लेकर परिवार से बातचीत शुरू की। करीब 48 घंटे तक अलग-अलग स्तर पर चर्चा चली। इसके बाद सरकारी पक्ष और परिवार के बीच नौ बिंदुओं पर सहमति बनी।
तत्काल संकट को शांत करने में यह बातचीत अहम रही। समय रहते संवाद शुरू नहीं होता तो स्थिति और तनावपूर्ण हो सकती थी।
पत्नी की नागरिकता का मामला भी सुलझा
गणेश की पत्नी एकमाया नेपाली की नागरिकता से जुड़ी समस्या भी इसी दौरान सामने आई।
सामान्य प्रक्रिया के अनुसार यह काम मुगु में पूरा होना था। लेकिन विभिन्न सरकारी निकायों के बीच काठमांडू से समन्वय किया गया और नागरिकता जारी कराई गई। बाद में गृहमंत्री ने खुद एकमाया को नागरिकता सौंपी।
इसे किसी मंत्री का उपकार नहीं कहा जा सकता। नागरिकता पाना एक नागरिक का अधिकार है। पीड़ित परिवार की बात सुनना और प्रशासनिक अड़चन हटाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
फिर भी यह घटना बताती है कि इच्छा हो तो सरकारी मशीनरी तेजी से चल सकती है।
दूसरी तरफ यही सवाल भी उठता है कि नियमित व्यवस्था से होने वाला काम किसी की मौत और मंत्री के सीधे हस्तक्षेप के बाद ही क्यों हुआ। एक सामान्य नागरिक को अपना अधिकार पाने के लिए संकट की आखिरी सीमा तक क्यों पहुंचना पड़ा?
गुरुङ की सक्रियता की चर्चा करते समय इस कमजोरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने तत्काल समस्या संभाली, लेकिन उसी प्रक्रिया ने प्रशासन की गहरी खामियां भी सामने रख दीं।
खरिपाटी में विस्थापित परिवारों के बीच सात मंत्री
गणेश नेपाली के परिवार से बातचीत चल ही रही थी कि सरकार के सामने एक और मानवीय संकट खड़ा हो गया।
काठमांडू में बागमती नदी के किनारे से हटाए गए सुकुम्बासी परिवारों को पहले कीर्तिपुर के होल्डिंग सेंटर में रखा गया था। वहां पानी भरने के बाद उन्हें भक्तपुर के खरिपाटी भेजा गया।
नदी किनारे के खतरे से बचाने के नाम पर हटाए गए लोग सरकारी व्यवस्था के भीतर फिर डूबान और असुरक्षा का सामना करने लगे।
इन परिवारों को केवल छत की जरूरत नहीं थी। भोजन, स्वास्थ्य, बच्चों की पढ़ाई, रोजमर्रा की कमाई और सम्मानजनक व्यवहार भी उतने ही जरूरी थे। लेकिन शुरुआती व्यवस्थापन में इन बुनियादी जरूरतों की तैयारी कमजोर दिखाई दी।
तनाव बढ़ने से पहले गृहमंत्री गुरुङ छह अन्य मंत्रियों के साथ खरिपाटी पहुंचे। एक साथ सात मंत्रियों का विस्थापित लोगों के बीच जाना सामान्य दृश्य नहीं था।
मंत्रियों की मौजूदगी से उस दिन सभी समस्याएं हल नहीं हुईं। स्थायी आवास भी नहीं मिला। फिर भी लंबे समय से खुद को अनसुना महसूस कर रहे लोगों को सरकार के सामने सीधे अपनी बात रखने का मौका मिला।
गुरुङ ने विस्थापित समुदाय के साथ राज्य की ओर से हुए व्यवहार पर माफी भी मांगी।
सत्ता में रहने वाले नेता आम तौर पर अपनी कमजोरी स्वीकार करने से बचते हैं। ऐसे माहौल में माफी का अपना अर्थ है। लेकिन उसकी असली कीमत आगे होने वाले काम से तय होगी।
खरिपाटी में परिवारों को दिया जा रहा खाना रोकने की शिकायत भी सामने आई थी। गृहमंत्री की पहल के बाद भोजन वितरण दोबारा शुरू कराया गया।
यह फिलहाल राहत है, समाधान नहीं।
सरकार को अब सुरक्षित बसोबास, स्वास्थ्य सेवा, बच्चों की शिक्षा, रोजगारी और लंबे समय की पुनर्वास योजना पर साफ जवाब देना होगा। लोगों को एक अस्थायी जगह से दूसरी अस्थायी जगह भेजते रहना पुनर्वास नहीं कहा जा सकता।
बिना तैयारी के फैसले का बोझ
सुकुम्बासी बस्ती हटाने के फैसले पर शुरू से सवाल उठते रहे हैं। पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना बस्ती खाली कराने से सबसे ज्यादा असर महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और रोज कमाकर खाने वाले परिवारों पर पड़ा।
जिस समय यह फैसला लागू हुआ, गुरुङ गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी में नहीं थे।
उन पर आय के स्रोत से मेल न खाने वाली संपत्ति का आरोप लगने के बाद जांच के लिए उन्हें मंत्रालय से बाहर रखा गया था। उस दौरान गृह मंत्रालय प्रधानमंत्री बालेन शाह के मातहत था। उपलब्ध स्रोत सामग्री में उसी अवधि में काठमांडू की सुकुम्बासी बस्तियां हटाने का निर्देश दिए जाने का उल्लेख है।
गृह मंत्रालय में लौटने के बाद गुरुङ अब उस फैसले से पैदा हुए गुस्से और अव्यवस्था को संभालने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
इसे नुकसान कम करने की कार्रवाई भी कहा जा सकता है।
सरकार के भीतर एक फर्क साफ नजर आता है। कहीं फैसले पर्याप्त तैयारी के बिना लिए जा रहे हैं। फिर उन फैसलों का सामाजिक असर संभालने के लिए किसी मंत्री को खुद मैदान में उतरना पड़ रहा है।
यह तरीका लंबे समय तक नहीं चल सकता।
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं हुई?
गुरुङ की मौजूदा सक्रियता के साथ उन पर लगे आरोपों का सवाल खत्म नहीं हो जाता।
संपत्ति से जुड़े आरोपों की जांच के बाद उन्हें दोबारा गृह मंत्रालय सौंपा गया, लेकिन जांच समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई। यह पारदर्शिता से जुड़ा गंभीर विषय है।
किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति पर आरोप लगे हों और औपचारिक जांच हुई हो तो नागरिकों को उसका नतीजा जानने का अधिकार है। केवल पद पर वापसी को बेगुनाही का पूरा जवाब नहीं माना जा सकता।
गुरुङ को इस मामले में खुलापन दिखाना होगा। जांच रिपोर्ट में क्या पाया गया, आरोप किस आधार पर सही या गलत ठहराए गए और उन्हें दोबारा जिम्मेदारी देने का आधार क्या था—सरकार को इन सवालों का साफ जवाब देना चाहिए।
मैदान में सक्रिय रहना अच्छी बात है। लेकिन सार्वजनिक विश्वास केवल सक्रियता से नहीं बनता। पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है।
एक मंत्री की दौड़ से व्यवस्था नहीं बदलती
पिछली घटनाओं में गुरुङ सरकार और नागरिक के बीच सीधा संवाद कराने वाले प्रमुख चेहरे के रूप में सामने आए हैं।
वह अस्पताल पहुंचे। मृतक के परिवार के साथ बैठे। अधिकारियों को एक जगह लाए। विस्थापित बस्ती में गए। सरकारी व्यवहार पर माफी मांगी।
यह सब गृह मंत्री की जिम्मेदारी का ही हिस्सा है। इसे असाधारण उपलब्धि बताकर जरूरत से ज्यादा महिमामंडित करना ठीक नहीं होगा।
लेकिन उस राजनीतिक संस्कृति में, जहां कई मंत्री सिंहदरबार से बाहर निकलने से बचते हैं, इस सक्रियता को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है।
असल सवाल अब यह है कि क्या गुरुङ की यह कार्यशैली व्यवस्था में कोई बदलाव ला पाएगी।
राहदानी विभाग के बाहर एक नागरिक आत्मदाह की कोशिश तक क्यों पहुंचा? एक गरीब परिवार को नागरिकता के लिए संकट का इंतजार क्यों करना पड़ा? हटाए गए परिवारों के लिए सुरक्षित स्थान की तैयारी पहले क्यों नहीं हुई? राहत स्थल पर खाना कैसे रुक गया?
इन सवालों का जवाब किसी एक मंत्री की मौजूदगी नहीं, संस्थागत सुधार है।
सरकारी कार्यालयों में सेवा आसान करनी होगी। शिकायत सुनने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी। अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करनी होगी। संकट पैदा होने से पहले जोखिम पहचानना होगा।
वरना हर मामले में मंत्री को खुद पहुंचना पड़ेगा और व्यवस्था उनके लौटते ही फिर पुराने ढर्रे पर चली जाएगी।
अब सचिवालय की कार्यशैली भी सवालों में
गृहमंत्री की सक्रियता के बीच उनके सचिवालय को लेकर भी शिकायतें सुनाई देने लगी हैं।
मंत्री नागरिकों तक पहुंचने की कोशिश करें, लेकिन उनका सचिवालय सूचना देने, लोगों से संपर्क रखने, मीडिया से समन्वय करने और शिकायत आगे बढ़ाने में कमजोर रहे तो इसका असर अंत में मंत्री के काम पर ही पड़ता है।
सचिवालय केवल निजी परिचितों या राजनीतिक संरक्षण पाए लोगों को जगह देने का दफ्तर नहीं है। उसे मंत्रालय, नागरिक, पत्रकार और सरोकार रखने वाले पक्षों के बीच पेशेवर पुल की तरह काम करना चाहिए।
वहां जिम्मेदारी साफ होनी चाहिए। जवाबदेही भी।
गुरुङ को अपने सचिवालय की समय रहते समीक्षा करनी होगी। जो लोग जिम्मेदारी के अनुसार काम नहीं कर रहे, उन्हें स्पष्ट निर्देश देना होगा। जरूरत पड़े तो टीम और काम करने का ढांचा बदलने से भी पीछे नहीं हटना चाहिए।
सरकार गठन के समय कमजोर पसंद माने गए सुदन गुरुङ अब संकट के समय मैदान में दिखाई देने वाले मंत्री बनकर उभरे हैं।
लेकिन उनकी असली परीक्षा अभी बाकी है।
गणेश नेपाली के परिवार से हुआ समझौता लागू होता है या नहीं। विस्थापित परिवारों को सुरक्षित और स्थायी जीवन मिलता है या नहीं। सरकारी सेवा प्रणाली में सुधार होता है या नहीं। अपने ऊपर लगे आरोपों और जांच रिपोर्ट को लेकर वह पारदर्शिता दिखाते हैं या नहीं।
आगे उनका मूल्यांकन इन्हीं बातों से होगा।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मुश्किल घड़ी में नागरिकों ने सरकार को खोजा तो उसका एक चेहरा उनके बीच पहुंचा।