संसद के लिए 166 विधेयकों की प्राथमिकता सूची तैयार

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सरकार ने अगले आर्थिक वर्ष 2083/84 में कानून बनाने का काम तय समय और प्राथमिकता के आधार पर आगे बढ़ाने की तैयारी की है। अलग-अलग मंत्रालयों से आए 166 विधेयकों की एक संयुक्त सूची संघीय संसद को सौंप दी गई है।

इनमें 97 प्रस्ताव नए कानून बनाने से जुड़े हैं। बाकी 69 विधेयक मौजूदा कानूनों में बदलाव के लिए तैयार किए गए हैं।

कानून, न्याय तथा संसदीय मामलों की मंत्री सोविता गौतम ने बुधवार को प्रतिनिधि सभा के सभामुख डोलप्रसाद अर्याल और राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दाहाल से अलग-अलग मुलाकात की। उन्होंने दोनों सदनों के प्रमुखों को विधेयकों की प्राथमिकता सूची और सालाना विधायी कार्यतालिका सौंपी।

सरकार का कहना है कि इससे संसद में विधेयक पेश करने, उन पर चर्चा कराने और कानून बनाने की प्रक्रिया पहले से अधिक व्यवस्थित हो सकेगी।

64 विधेयक पहली प्राथमिकता में

सरकार ने 166 में से 64 विधेयकों को पहली प्राथमिकता में रखा है। ये वे प्रस्ताव हैं जिन्हें संसद में सबसे पहले पेश करने की तैयारी है।

दूसरी प्राथमिकता में 45 और तीसरी प्राथमिकता में 57 विधेयक रखे गए हैं। यही क्रम संसद में विधेयकों के पंजीकरण और आगे की चर्चा का आधार बन सकता है।

हालांकि, कार्यतालिका में नाम होने भर से कोई विधेयक अपने आप पारित नहीं होगा। उसे संसद की नियमित प्रक्रिया से गुजरना होगा। दोनों सदनों में चर्चा, संशोधन और मंजूरी के बाद ही वह कानून बन सकेगा।

हर साल पहले से तय होगा कानून बनाने का काम

यह कार्यतालिका विधायन अधिनियम, 2081 के तहत तैयार की गई है। इस कानून का मकसद विधेयक बनाने की सरकारी प्रक्रिया को समयसीमा के भीतर लाना है।

अधिनियम की धारा 3 के अनुसार हर मंत्रालय को अगले आर्थिक वर्ष में जरूरी कानूनों की पहचान करनी होती है। मंत्रालयों को प्राथमिकता के साथ अपने प्रस्ताव जेठ महीने के भीतर कानून मंत्रालय भेजने होते हैं।

इसके बाद कानून मंत्रालय संबंधित मंत्रालयों से चर्चा करता है। उसी आधार पर तय किया जाता है कि कौन-सा विधेयक कब संसद में पेश किया जाएगा।

अगले वर्ष की सूची बनाने के लिए कानून मंत्रालय ने असार 24 और 25 गते विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। उन्हीं चर्चाओं के बाद 166 विधेयकों की अंतिम संख्या तय हुई।

कानून मंत्रालय से सबसे ज्यादा प्रस्ताव

मंत्रालयों में सबसे अधिक 17 विधेयक कानून, न्याय तथा संसदीय मामलों के मंत्रालय ने प्रस्तावित किए हैं।

पूर्वाधार विकास मंत्रालय और स्वास्थ्य तथा खाद्य स्वच्छता मंत्रालय ने 16-16 विधेयक सूची में रखे हैं। प्रधानमंत्री तथा मंत्रिपरिषद कार्यालय और अर्थ मंत्रालय की ओर से 15-15 प्रस्ताव आए हैं।

कृषि, वन तथा पर्यावरण मंत्रालय ने 13 विधेयक तैयार किए हैं। गृह मंत्रालय और संस्कृति, पर्यटन तथा नागरिक उड्डयन मंत्रालय से 11-11 विधेयक प्रस्तावित हैं।

शिक्षा तथा खेलकूद मंत्रालय के नौ विधेयक कार्यतालिका में शामिल किए गए हैं। भूमि व्यवस्था, सहकारिता, संघीय मामले तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय से आठ प्रस्ताव आए हैं।

महिला, बालबालिका, लैंगिक तथा यौनिक अल्पसंख्यक और सामाजिक सुरक्षा मंत्रालय ने सात विधेयक प्रस्तावित किए हैं।

सूचना तथा संचार मंत्रालय के छह और युवा, श्रम तथा रोजगार मंत्रालय के पांच विधेयक सूची में हैं।

उद्योग, वाणिज्य तथा आपूर्ति मंत्रालय, ऊर्जा, जलस्रोत तथा सिंचाई मंत्रालय, परराष्ट्र मंत्रालय और विज्ञान, प्रविधि तथा नवप्रवर्तन मंत्रालय ने चार-चार विधेयक प्रस्तावित किए हैं। रक्षा मंत्रालय की ओर से एक विधेयक रखा गया है।

मंत्रियों और सचिवों से चरणबद्ध चर्चा

विधेयकों की संख्या और उनकी प्राथमिकता तय करने से पहले मंत्री गौतम ने प्रधानमंत्री कार्यालय समेत सभी मंत्रालयों के मंत्री और सचिवों के साथ अलग-अलग चरण में चर्चा की थी।

मंत्रालय के अनुसार, इस प्रक्रिया में यह देखा गया कि कौन-से कानून तुरंत जरूरी हैं, किन पुराने कानूनों में बदलाव की जरूरत है और किन प्रस्तावों का सीधा असर सरकारी सेवा तथा नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन पर पड़ेगा।

मंत्री गौतम ने कहा है कि सुशासन, लोगों को आसान सेवा और आर्थिक समृद्धि के लिए नीतिगत सुधार जरूरी हैं। इसी कारण सरकार ने कानून बनाने के काम को प्राथमिकता में रखा है।

उन्होंने यह उम्मीद भी जताई कि सरकार की सुधार प्रक्रिया को संसद से जरूरी सहयोग मिलेगा।

जरूरी होने पर सूची से बाहर भी आ सकेगा विधेयक

सालाना कार्यतालिका बनने के बाद भी सरकार के लिए किसी नए और जरूरी विषय पर विधेयक लाने का रास्ता बंद नहीं होगा।

विधायन अधिनियम की धारा 3 की उपधारा 5 में इसकी व्यवस्था की गई है। इसके तहत सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि तय कार्यतालिका से बाहर का विधेयक तत्काल क्यों जरूरी है।

उद्देश्य और कारण दर्ज करने के बाद उसका मसौदा तैयार कर संघीय संसद में पेश किया जा सकेगा।

इस व्यवस्था का मतलब है कि सरकार नियमित कानून निर्माण को पहले से तय योजना के अनुसार चलाएगी, लेकिन किसी अचानक पैदा हुई जरूरत या सार्वजनिक महत्व के विषय पर तुरंत कानूनी कदम उठाने की गुंजाइश भी बनी रहेगी।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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