नेपाल सरकार ने संघीय सांसदों के लिए निजी सचिव की सुविधा फिर शुरू करने का फैसला किया है। अब सांसद स्नातक पास किसी व्यक्ति को अपना निजी सचिव नियुक्त कर सकेंगे और उसका वेतन सरकारी खजाने से दिया जाएगा।
प्रधानमंत्री वालेन्द्र शाह की अध्यक्षता में 30 असार को हुई मंत्रिपरिषद की बैठक में यह निर्णय लिया गया। कानून, न्याय एवं संसदीय मामलों की मंत्री सोविता गौतम ने इसकी पुष्टि की है।
बैठक के कुछ फैसले उसी दिन सार्वजनिक कर दिए गए थे, लेकिन सांसदों के निजी सचिव से जुड़ा निर्णय तत्काल सामने नहीं आया। सरकार ने इसके लिए ‘संघीय संसद के पदाधिकारियों और सदस्यों के पारिश्रमिक एवं सुविधाओं से संबंधित अधिनियम, 2073’ की अनुसूची में बदलाव किया है।
राजपत्र में छपने के बाद लागू होगा फैसला
नई व्यवस्था अभी औपचारिक रूप से लागू नहीं हुई है। संशोधित अनुसूची राजपत्र में प्रकाशित होने के बाद सांसद निजी सचिव नियुक्त कर सकेंगे।
निजी सचिव को शाखा अधिकृत के बराबर वेतन और सुविधाएं मिलेंगी। नियुक्त होने वाले व्यक्ति के लिए कम से कम स्नातक तक की पढ़ाई जरूरी होगी।
कानून मंत्रालय ने अनुसूची में बदलाव का प्रस्ताव तैयार किया था। मंत्री गौतम ने इसे मंत्रिपरिषद के सामने रखा।
उनके मुताबिक सरकार ने कोई नई सुविधा नहीं जोड़ी है, बल्कि कानून में पहले से मौजूद व्यवस्था को दोबारा लागू किया है।
खर्च घटाने के फैसले के तहत हटाई गई थी सुविधा
जेन-जी आंदोलन के बाद बनी सुशीला कार्की नेतृत्व की अंतरिम सरकार ने सरकारी खर्च कम करने के नाम पर सांसदों के निजी सचिव की सुविधा खत्म कर दी थी।
इसके बाद चुने गए नए प्रतिनिधि सभा सदस्यों में से कुछ ने निजी सचिव तो रखे, लेकिन उनका वेतन अपने ही पारिश्रमिक और भत्ते से देना पड़ा।
सांसद लंबे समय से यह सुविधा वापस देने की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि संसदीय काम केवल सदन की बैठकों तक सीमित नहीं रहता।
निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से संपर्क, नागरिकों की शिकायतें, मंत्रालयों और सरकारी दफ्तरों के साथ पत्राचार और दस्तावेजों का प्रबंधन करने के लिए नियमित प्रशासनिक सहयोग जरूरी है।
चार महीने तक अटका रहा प्रस्ताव
कानून मंत्रालय से प्रस्ताव मंत्रिपरिषद तक पहुंचने के बाद भी फैसला होने में करीब चार महीने लगे।
बताया गया है कि प्रधानमंत्री शाह चाहते थे कि सभी राजनीतिक दल पहले औपचारिक रूप से निजी सचिव की सुविधा बहाल करने का अनुरोध करें। इसी वजह से प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
मुख्य विपक्षी नेपाली कांग्रेस समेत दूसरे विपक्षी दल इस शर्त से सहमत नहीं थे। दलों ने अपने सचेतकों के जरिए जवाब भेजा कि सांसदों के लिए निजी सचिव जरूरी है तो सरकार को अपने स्तर पर फैसला करना चाहिए। सुविधा मांगने के लिए राजनीतिक दल अलग से आवेदन नहीं देंगे।
आखिरकार विपक्षी दलों की ओर से कोई औपचारिक निवेदन आए बिना ही मंत्री गौतम के प्रस्ताव पर मंत्रिपरिषद ने पुरानी व्यवस्था बहाल कर दी।
प्रशासनिक मदद के साथ खर्च पर भी सवाल
सरकार के इस फैसले से सांसदों को रोजमर्रा के काम में प्रशासनिक मदद मिलने की उम्मीद है। खासकर निर्वाचन क्षेत्र और सरकारी निकायों के बीच समन्वय आसान हो सकता है।
लेकिन फैसला ऐसे समय लिया गया है, जब सरकारी खर्च और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल पर लगातार बहस हो रही है।
जिस सुविधा को खर्च घटाने के नाम पर हटाया गया था, उसे फिर सरकारी खजाने से देने का निर्णय अब नए सवाल भी खड़े करेगा। सरकार को यह साफ करना होगा कि इस सुविधा पर कितना खर्च आएगा और नियुक्ति की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रखी जाएगी।