सरकार के दावे, जनता की परेशानी की हकीकत

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सरकार के दावे, जनता की परेशानी की हकीकत

नेपाल में सरकार लगातार यह कह रही है कि रसोई गैस, यूरिया खाद, पासपोर्ट सेवा और डिजिटल सरकारी सुविधाओं में सुधार हुआ है। लेकिन दूसरी तरफ आम लोगों का अनुभव इससे बिल्कुल अलग तस्वीर दिखा रहा है। बाजार से लेकर सरकारी दफ्तर तक लोग अब भी लंबी कतारों, कमी और अव्यवस्था से जूझ रहे हैं।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत से पहले की तुलना में ज्यादा एलपीजी सिलेंडर नेपाल पहुंच रहे हैं। इसके बावजूद कई इलाकों में लोगों को एक सिलेंडर लेने के लिए कई दिन इंतजार करना पड़ रहा है। सवाल यह है कि जब आपूर्ति पर्याप्त बताई जा रही है तो बाजार में गैस आखिर गायब क्यों है।

अगर रास्ते में कहीं जमाखोरी या कालाबाजारी हो रही है और कृत्रिम कमी पैदा की जा रही है, तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही। निगरानी व्यवस्था आखिर किस काम की है, जब आम उपभोक्ता ही सबसे ज्यादा परेशान है।

खाद को लेकर भी वही स्थिति

उद्योग मंत्रालय का कहना है कि किसानों के लिए यूरिया खाद की पर्याप्त व्यवस्था की गई है। लेकिन खेतों में काम कर रहे किसानों की शिकायत कुछ और ही है।

धान रोपाई का समय निकलता जा रहा है, फिर भी कई किसानों को एक बोरी खाद तक नहीं मिल पा रही। खेती जैसे समयबद्ध काम में ऐसी देरी सीधे उत्पादन पर असर डाल सकती है।

पासपोर्ट सेवा के दावों पर भी सवाल

सरकार का दावा है कि 10 हजार नेपाली रुपये शुल्क देने पर तीन दिन के भीतर पासपोर्ट बनाकर घर तक पहुंचाने की व्यवस्था है।

लेकिन हकीकत यह है कि कई लोगों को केवल आवेदन फॉर्म भरने के लिए ही दो-दो दिन तक लाइन में लगना पड़ रहा है। ऐसे में तेज और आसान सेवा के सरकारी दावे लोगों के अनुभव से मेल नहीं खाते।

3 प्रतिशत शुल्क हटाने का ऐलान, लेकिन वसूली जारी

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया के जरिए जानकारी दी कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर लगाया गया 3 प्रतिशत कर हटा दिया गया है।

इसके बावजूद कई अस्पताल और शिक्षण संस्थान अब भी उसी अतिरिक्त शुल्क के साथ फीस वसूल रहे हैं। सवाल यह है कि यदि सरकार ने फैसला कर लिया है, तो उसका पालन जमीन पर क्यों नहीं हो रहा।

इसी तरह बिजली उपभोक्ताओं के बीच भी नए कर को लेकर सवाल उठ रहे हैं। बजट में 50 यूनिट से अधिक बिजली इस्तेमाल करने वालों पर 5 प्रतिशत कर लगाने की घोषणा की गई थी, जिसे नए वित्तीय वर्ष से लागू होना था।

लेकिन उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिजली प्राधिकरण ने पुराने बिलों में ही अतिरिक्त कर जोड़कर राशि वसूलनी शुरू कर दी।

डिजिटल नेपाल की बात, लेकिन वेबसाइटें बार-बार बंद

सरकार डिजिटल सेवाओं के विस्तार के लिए बड़े निवेश और विदेशी ऋण की बात करती है। लेकिन कई सरकारी वेबसाइटें अक्सर “सर्वर डाउन” की समस्या से जूझती रहती हैं।

तकनीकी क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि अधिकतर मामलों में कमजोर सर्वर क्षमता और अपर्याप्त डिजिटल ढांचा इसकी मुख्य वजह है। उनका मानना है कि यदि सरकार प्राथमिकता दे तो अपेक्षाकृत कम समय में स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।

सरकार से उठ रहे सीधे सवाल

इन हालात के बीच कई सवाल सामने आ रहे हैं।

  • जब गैस की आपूर्ति बढ़ी है तो लोगों को सिलेंडर क्यों नहीं मिल रहा?
  • अगर खाद पर्याप्त है तो किसान अब भी खाली हाथ क्यों लौट रहे हैं?
  • सरकारी फैसलों के बाद भी अतिरिक्त शुल्क क्यों वसूला जा रहा है?
  • डिजिटल सेवाओं पर खर्च के बावजूद सरकारी वेबसाइटें बार-बार क्यों ठप हो रही हैं?

आलोचकों का कहना है कि सुशासन केवल घोषणाओं या कार्रवाई की खबरों तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसकी असली कसौटी यह है कि आम नागरिक को रोजमर्रा की जरूरी सेवाएं बिना परेशानी मिलें।

क्या हर सवाल का जवाब ‘अभी सरकार नई है’ हो सकता है?

सरकार के समर्थन में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि नई सरकार से कुछ ही महीनों में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि गैस, खाद, पासपोर्ट और स्वास्थ्य जैसी रोजमर्रा की जरूरतों को लंबे समय तक टाला नहीं जा सकता। बड़े विकास कार्यों में समय लग सकता है, लेकिन बुनियादी सेवाओं का सुचारु संचालन सरकार की तत्काल जिम्मेदारी है।

उनका कहना है कि जब सरकारी दावे और लोगों का वास्तविक अनुभव एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, तब केवल घोषणाएं काफी नहीं होतीं। नागरिकों को राहत तभी मिलेगी, जब सरकारी फैसलों का असर जमीन पर भी साफ दिखाई देगा।

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