गरिमा केस: बयान का वीडियो बनाने वाला हवलदार गिरफ्तार
बारा में बालिका गरिमा चौधरी के साथ बलात्कार के बाद हत्या के मामले की जांच के बीच पुलिस की एक गंभीर लापरवाही सामने आई है। मामले में आरोपित किशोर से पूछताछ और बयान का वीडियो सोशल मीडिया तक पहुंच गया। वीडियो पुलिस कार्यालय के बयान कक्ष के भीतर रिकॉर्ड किया गया था।
मामला सामने आने के बाद वीडियो बनाने के आरोप में एक पुलिसकर्मी को हिरासत में लिया गया है। पुलिस अब यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि संवेदनशील जांच सामग्री कार्यालय से बाहर कैसे पहुंची और इसे सोशल मीडिया पर किसने फैलाया।
यह सिर्फ वीडियो लीक होने का मामला नहीं रह गया है। बाल अपराध से जुड़े एक बेहद संवेदनशील केस में पुलिस की गोपनीयता व्यवस्था और जांच में शामिल अधिकारियों की जिम्मेदारी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
बयान के दौरान ही बनाया गया था वीडियो
पुलिस के मुताबिक, आरोपित किशोर का बयान चल रहा था, उसी समय उसका वीडियो रिकॉर्ड किया गया। बाद में वही सामग्री सोशल मीडिया पर पहुंच गई।
बारा के पुलिस प्रमुख एसपी नरेंद्र कुंवर के अनुसार, वीडियो बनाने के आरोप में संबंधित पुलिसकर्मी को नियंत्रण में लेकर पूछताछ की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद उसके खिलाफ आपराधिक मामला चलाने की प्रक्रिया भी आगे बढ़ाई जा सकती है।
पुलिस की शुरुआती जांच में आशंका है कि वीडियो रिकॉर्ड करने वाले व्यक्ति के जरिए ही यह बाहर पहुंचा हो सकता है। हालांकि अभी इसकी पूरी पुष्टि नहीं हुई है। जांच में यह भी देखा जा रहा है कि वीडियो आगे भेजने या सार्वजनिक करने में कोई और व्यक्ति शामिल था या नहीं।
एसपी और डीएसपी की भूमिका पर भी जांच
मामला अब एक पुलिसकर्मी तक सीमित नहीं है। जिला पुलिस कार्यालय बारा की कमान संभाल रहे अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है।
स्रोतों के अनुसार, एसपी नरेंद्र कुंवर और डीएसपी मीनबहादुर घले की भूमिका को लेकर नेपाल पुलिस मुख्यालय और मधेश प्रदेश पुलिस कार्यालय ने भी जांच शुरू की है। जांच का फोकस इस बात पर है कि इतनी संवेदनशील सामग्री तक पहुंच किसके पास थी और कार्यालय के भीतर गोपनीयता से जुड़े नियमों का पालन क्यों नहीं हो सका।
बाल मामलों में गोपनीयता सबसे अहम
किसी आपराधिक जांच में पुलिस के सामने दिया गया बयान केस का अहम हिस्सा होता है। जब मामला बच्चों से जुड़ा हो तो पहचान, बयान और जांच से जुड़ी सामग्री को लेकर और भी ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत होती है।
आरोपित भी किशोर है। ऐसे में उसका बयान सार्वजनिक होना कानूनी और संस्थागत जिम्मेदारी से जुड़ा सवाल बन गया है। साथ ही पीड़ित पक्ष की गरिमा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच पर भी इसका असर पड़ सकता है।
इसी वजह से पुलिस हिरासत और नियंत्रण में रिकॉर्ड हुई सामग्री का सोशल मीडिया तक पहुंच जाना सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं माना जा रहा।
पहले से जनआक्रोश में था गरिमा हत्याकांड
गरिमा चौधरी के साथ बलात्कार के बाद हत्या की घटना को लेकर पहले से ही बारा समेत व्यापक स्तर पर लोगों में आक्रोश और चिंता थी। मामले की निष्पक्ष और प्रभावी जांच की मांग लगातार उठती रही है।
अब जांच से जुड़ा वीडियो बाहर आने के बाद सवाल दोहरे हो गए हैं। एक तरफ मूल अपराध की जांच है, दूसरी तरफ उसी जांच को संभाल रही पुलिस व्यवस्था की जवाबदेही भी जांच के केंद्र में आ गई है।
पुलिस का कहना है कि आंतरिक छानबिन के साथ आपराधिक जिम्मेदारी भी तय की जाएगी। जांच पूरी होने के बाद यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि वीडियो किसने रिकॉर्ड किया, वह पुलिस कार्यालय से कैसे बाहर पहुंचा और इस पूरे घटनाक्रम में अन्य लोगों की भूमिका थी या नहीं।
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