अफ्रीका के डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (डीआरसी) और युगांडा में तेजी से फैल रहे इबोला संक्रमण ने दुनिया की चिंता फिर बढ़ा दी है। कुछ हफ्ते पहले शुरू हुआ यह प्रकोप अब सीमाएं पार करता दिख रहा है। हालात ऐसे हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपातकाल घोषित करना पड़ा है।
सबसे बड़ी चिंता इस बार वायरस की उस किस्म को लेकर है जिसके खिलाफ अभी तक कोई मंजूरशुदा वैक्सीन मौजूद नहीं है। डॉक्टरों और राहत एजेंसियों का कहना है कि इसी वजह से हालात पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल होते जा रहे हैं।
कांगो में तेजी से बढ़ रहे मामले
डीआरसी के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक 25 मई तक देश में इबोला के 105 पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं। इसके अलावा 900 से ज्यादा संदिग्ध मरीजों की पहचान हुई है।
अब तक कम से कम 10 लोगों की मौत की पुष्टि हुई है, जबकि संदिग्ध मौतों का आंकड़ा 223 तक पहुंच गया है।
संक्रमण इटुरी, नॉर्थ किवू और साउथ किवू जैसे इलाकों में तेजी से फैल रहा है। यही इलाके लंबे समय से संघर्ष, विस्थापन और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था से जूझते रहे हैं।
युगांडा में भी बढ़ी चिंता
युगांडा में भी इबोला के सात मामले सामने आए हैं। इनमें एक मरीज की मौत हो चुकी है। कई संक्रमित लोग हाल में कांगो से यात्रा करके लौटे थे।
स्वास्थ्य एजेंसियों को डर है कि सीमा पार लगातार आवाजाही के कारण संक्रमण और तेजी से फैल सकता है। खासकर गोमा, बुनिया और कंपाला के आसपास मिले मामलों ने चिंता बढ़ा दी है।
व्यापार, ट्रांसपोर्ट और मजदूरों की आवाजाही को भी बड़ा जोखिम माना जा रहा है।
यूरोप तक पहुंचा डर
इटली में उस समय हलचल मच गई जब युगांडा से आए दो यात्रियों में इबोला जैसे लक्षण मिले। दोनों को मिलान के एक अस्पताल में अलग रखा गया।
हालांकि बाद की जांच में इबोला संक्रमण की पुष्टि नहीं हुई।
इसके बावजूद यूरोप की स्वास्थ्य एजेंसियां हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। यूरोपियन सेंटर फॉर डिजीज प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ने फिलहाल यूरोप के लिए खतरा बहुत कम बताया है।
इस बार क्यों ज्यादा खतरनाक माना जा रहा प्रकोप
2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में फैले इबोला संकट को दुनिया अभी तक भूली नहीं है। उस दौरान हजारों लोगों की मौत हुई थी।
बाद में जिन वैक्सीन और इलाजों को विकसित किया गया था, वे मुख्य रूप से जायर स्ट्रेन के खिलाफ थे।
लेकिन इस बार फैल रहा वायरस बुंडिबुग्यो स्ट्रेन है। इसके खिलाफ अभी कोई पूरी तरह मंजूर वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।
मेडिकल टीमों का कहना है कि यही वजह है कि संक्रमण रोकना ज्यादा कठिन हो रहा है।
एमएसएफ के महामारी विशेषज्ञ जॉन जॉनसन ने चेतावनी दी है कि अगर सीमावर्ती इलाकों में संक्रमण फैलता रहा तो हालात और गंभीर हो सकते हैं।
संघर्ष और कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था बनी बड़ी चुनौती
पूर्वी कांगो में हालात पहले से ही बेहद नाजुक हैं। कई इलाकों में हथियारबंद संघर्ष जारी है। बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हैं और अस्पतालों तक पहुंच आसान नहीं है।
राहत एजेंसियों का मानना है कि कई संक्रमित लोग अब भी सामने नहीं आ पाए हैं।
डर, अफवाहें, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और असुरक्षा के कारण लोग शुरुआती लक्षणों के बाद भी इलाज के लिए नहीं पहुंच रहे।
खनन वाले इलाकों को भी हाई रिस्क जोन माना जा रहा है क्योंकि वहां बड़ी संख्या में मजदूर लगातार एक जगह से दूसरी जगह आते-जाते रहते हैं।
UNICEF और राहत एजेंसियां मैदान में
UNICEF ने इस प्रकोप को लेकर अपना सबसे बड़ा आपातकालीन रिस्पॉन्स सिस्टम सक्रिय कर दिया है।
अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां अब आपात स्वास्थ्य सेवाओं, जागरूकता अभियान, निगरानी व्यवस्था और इलाज केंद्रों के लिए करोड़ों डॉलर जुटा रही हैं।
एमएसएफ और स्थानीय स्वास्थ्य टीमें प्रभावित इलाकों में अस्थायी उपचार केंद्र बना रही हैं। गांव स्तर पर निगरानी भी बढ़ाई जा रही है।
कांगो पहले भी झेल चुका है इबोला
इबोला वायरस पहली बार 1976 में कांगो में ही पहचाना गया था। उसके बाद से देश में 17 बार इबोला फैल चुका है।
मौजूदा प्रकोप को बुंडिबुग्यो स्ट्रेन से जुड़ी अब तक की सबसे बड़ी घटनाओं में गिना जा रहा है।
लेकिन इस बार हालात अलग माने जा रहे हैं। तेजी से फैलता संक्रमण, सीमा पार पहुंचता खतरा, कमजोर स्वास्थ्य सिस्टम और वैक्सीन की कमी ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस संक्रमण को समय रहते रोका जा सकेगा या दुनिया एक और बड़े इबोला संकट की तरफ बढ़ रही है।