नेपाल में सांसदों को निजी सचिव की सुविधा फिर बहाल, जनता पर नया टैक्स

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नेपाल में सांसदों को निजी सचिव की सुविधा फिर बहाल, जनता पर नया टैक्स

नेपाल में नए आर्थिक वर्ष 2083/84 की शुरुआत के साथ ही आम नागरिकों की जिंदगी से जुड़ी दो सेवाओं पर नया टैक्स लागू हो गया है। राइड-शेयरिंग और बिजली बिल पर लोगों को अब ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। ठीक इसी समय सरकार ने संसद सदस्यों के लिए निजी सचिव रखने की सुविधा भी वापस बहाल कर दी है, जो कुछ महीने पहले ही खत्म की गई थी।

इन दोनों फैसलों को साथ रखकर देखें तो तस्वीर साफ हो जाती है। एक तरफ आम नागरिकों की रोजमर्रा की सेवाओं पर टैक्स का बोझ बढ़ा है, दूसरी तरफ राजनीतिक पदाधिकारियों की सुविधाओं पर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च होने वाले हैं।

राइड-शेयरिंग और बिजली पर नया टैक्स

साउन 1 गते से पठाओ, इनड्राइव और यांगो जैसे राइड-शेयरिंग प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले राइडरों की कमाई पर 5 प्रतिशत वैट लगना शुरू हो गया है। कंपनियों को अब हर ट्रांजैक्शन पर यह वैट काटना होगा। प्लेटफॉर्म जो कमीशन और सर्विस चार्ज पहले से वसूलते आ रहे हैं, उस पर 13 प्रतिशत वैट पहले जैसा ही लागू रहेगा। जाहिर है इसका असर आखिरकार यात्रियों के किराए पर भी पड़ सकता है।

बिजली बिल में भी बदलाव हुआ है। जो घरेलू उपभोक्ता महीने में 50 यूनिट से ज्यादा बिजली खर्च करते हैं, उन्हें अतिरिक्त खपत पर 5 प्रतिशत वैट देना होगा। पहले 50 यूनिट तक की खपत पर कोई वैट नहीं लगेगा।

नेपाल विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक करीब 26 लाख घरेलू ग्राहक इस दायरे में आएंगे। औद्योगिक और व्यावसायिक उपभोक्ताओं के लिए वैट की दर 13 प्रतिशत तक जा सकती है।

नौ महीने बाद वापस आई सांसदों की सुविधा

जिस समय जनता पर नया टैक्स लगाया जा रहा है, ठीक उसी समय बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने संघीय सांसदों के लिए निजी सचिव रखने की सुविधा फिर से लागू कर दी है।

याद रहे, जेन-जी आंदोलन के बाद बनी सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार ने खर्च घटाने और मितव्ययिता के नाम पर 2082 असोज 5 गते यह सुविधा खत्म कर दी थी। लगभग नौ महीने बाद अब मंत्रिपरिषद ने संघीय संसद के पदाधिकारियों और सदस्यों से जुड़े पारिश्रमिक कानून की अनुसूची में संशोधन करते हुए यह व्यवस्था दोबारा लागू कर दी।

नए फैसले के तहत प्रतिनिधि सभा के 275 और राष्ट्रीय सभा के 59, यानी कुल 334 संघीय सांसद अब एक-एक निजी सचिव रख सकेंगे, जिन्हें शाखा अधिकृत के बराबर वेतन-सुविधा मिलेगी।

सालाना करीब 24-25 करोड़ का खर्च

एक निजी सचिव को मूल वेतन, महंगाई भत्ता और अन्य सुविधाओं सहित हर महीने करीब 57 हजार 662 रुपये मिलने का अनुमान है। इस हिसाब से 334 सचिवों पर हर महीने करीब 1 करोड़ 92 लाख 59 हजार रुपये खर्च होंगे।

12 महीने के वेतन में यह रकम करीब 23 करोड़ 11 लाख रुपये तक पहुंचती है। त्योहार भत्ते का एक महीने का खर्च जोड़ें तो सालाना खर्च करीब 25 करोड़ 4 लाख रुपये तक पहुंच सकता है।

अगर यही व्यवस्था पांच साल तक चलती रही, तो सिर्फ संघीय सांसदों के निजी सचिवों पर करीब 1 अरब 20 करोड़ से 1 अरब 25 करोड़ रुपये तक खर्च हो सकते हैं। यह अनुमान सिर्फ “एक सांसद, एक निजी सचिव” के आधार पर है। प्रधानमंत्री, मंत्री, सभामुख, उपसभामुख, राष्ट्रीय सभा अध्यक्ष और संसदीय समितियों के सभापति जैसे पदाधिकारी तो पद के हिसाब से एक से ज्यादा कर्मचारी भी रख सकते हैं, इसलिए असली खर्च इससे अलग भी हो सकता है।

प्रदेशों में भी लागू हुआ तो खर्च 65 करोड़ तक

फिलहाल यह फैसला मुख्य रूप से संघीय संसद सदस्यों पर लागू है। लेकिन अगर सातों प्रदेशों की कुल 550 प्रदेश सभा सदस्यों को भी यही सुविधा देनी हो, तो हर प्रदेश को अलग से कानूनी और बजट व्यवस्था करनी होगी।

मान लीजिए हर प्रदेश सभा सदस्य को नायब सुब्बा स्तर की सुविधा वाला एक निजी सचिव मिले और हर व्यक्ति पर महीने में करीब 56 हजार 874 रुपये खर्च हो, तो हर महीने करीब 3 करोड़ 12 लाख 80 हजार रुपये का खर्च आएगा।

साल भर में यह रकम करीब 37 करोड़ 54 लाख रुपये होगी, और त्योहार भत्ता जोड़ने पर यह करीब 40 करोड़ 66 लाख रुपये तक पहुंच सकती है।

संघ और प्रदेश दोनों स्तर के कुल 884 जनप्रतिनिधियों को अगर एक-एक निजी सचिव मिले, तो सालाना खर्च करीब 60 करोड़ 65 लाख से 65 करोड़ 70 लाख रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। पांच साल में यह रकम करीब 3 अरब 3 करोड़ से 3 अरब 28 करोड़ रुपये तक जा सकती है।

बेशक यह अनुमान इस बात पर टिका है कि सभी पदों पर नियुक्ति हो, हर प्रदेश समान सुविधा लागू करे और तय वेतन-भत्ते बरकरार रहें। हर प्रदेश में कानून, वेतन, सुविधा और नियुक्ति संख्या अलग हो सकती है, इसलिए असली आंकड़ा घट-बढ़ भी सकता है।

जनता को टैक्स, नेताओं को सुविधा

यह सही है कि प्रधानमंत्री, मंत्री, सभामुख जैसे कार्यकारी जिम्मेदारी वाले पदाधिकारियों को रोजमर्रा के प्रशासनिक काम के लिए सचिवालय जैसी सुविधा चाहिए ही होती है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

लेकिन सवाल यह है कि देश की कमजोर आर्थिक हालत, बढ़ते चालू खर्च और विकास बजट के निराशाजनक क्रियान्वयन के बीच हर सांसद को सरकारी खजाने से निजी सचिव देना कितना जरूरी है।

अगर सरकार यह सुविधा दोबारा बहाल न करती, तो पांच साल में बचने वाली रकम को पूर्वाधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या आम नागरिकों की बुनियादी सेवाओं में लगाया जा सकता था।

विपक्ष में रहते हुए सरकारी फिजूलखर्ची, राजनीतिक सुविधाओं और जनता पर टैक्स का विरोध करने वाले नेता अब सत्ता में आते ही पुरानी व्यवस्था की तरफ लौट आए हैं, ऐसा आरोप भी लगने लगा है।

नए आर्थिक वर्ष की शुरुआत के साथ ही जनता को राइड-शेयरिंग और बिजली सेवा पर ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं। ठीक इसी समय सांसदों की सुविधा बहाल करने का फैसला यह गंभीर सवाल खड़ा करता है कि सरकार की प्राथमिकता आम लोगों का आर्थिक बोझ घटाना है, या राजनीतिक सुविधाएं बढ़ाना।

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