मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर एक बार फिर वैश्विक तेल बाजार पर दिखने लगा है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत रुकने की खबर सामने आने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया है। पिछले कुछ हफ्तों से दबाव में चल रहा तेल बाजार अचानक फिर से भू-राजनीतिक जोखिमों की तरफ लौट आया है।
ब्रेंट क्रूड की कीमत 95 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई है, जबकि अमेरिकी बेंचमार्क डब्ल्यूटीआई 92 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा है। बाजार से जुड़े जानकारों का कहना है कि फिलहाल कीमतों को वास्तविक मांग और आपूर्ति से ज्यादा राजनीतिक घटनाक्रम प्रभावित कर रहे हैं।
बातचीत थमने से बढ़ी चिंता
हाल के दिनों में यह उम्मीद बनी थी कि ईरान और अमेरिका के बीच किसी तरह की समझ बन सकती है। इसी उम्मीद के चलते तेल बाजार में कुछ नरमी भी देखी गई थी।
लेकिन वार्ता रुकने के संकेत मिलते ही निवेशकों ने संभावित आपूर्ति जोखिमों का आकलन शुरू कर दिया। इसके साथ ही इजरायल, लेबनान और ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनावों ने भी बाजार की बेचैनी बढ़ा दी है।
व्यापारियों को आशंका है कि यदि हालात और बिगड़ते हैं तो तेल उत्पादन या अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर टिकी दुनिया की नजर
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य बेहद अहम माना जाता है। दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
यही वजह है कि इस इलाके में किसी भी तरह की बाधा या सैन्य गतिविधि का असर तुरंत तेल बाजार पर दिखाई देता है।
- दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है
- ढुलाई प्रभावित होने पर बाजार में कमी की आशंका बढ़ जाती है
- आपूर्ति संकट की आशंका से तेल की कीमतों पर दबाव बनता है
हालांकि कुछ वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन सामान्य स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक भंडार पर भी असर पड़ सकता है।
महंगा तेल, महंगाई की नई चुनौती
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, विनिर्माण और बिजली उत्पादन की लागत भी बढ़ सकती है।
अंततः इसका बोझ उपभोक्ताओं तक पहुंचने की आशंका रहती है। ऐसे समय में जब कई देशों के केंद्रीय बैंक अभी भी महंगाई को नियंत्रित करने की कोशिश कर रहे हैं, ऊर्जा कीमतों में नई तेजी चिंता बढ़ा सकती है।
अमेरिका में सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में भी हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ऊर्जा लागत बढ़ने पर ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
तनाव के बीच शेयर बाजार क्यों मजबूत है?
दिलचस्प बात यह है कि तेल बाजार में बढ़ती बेचैनी के बावजूद अमेरिकी शेयर बाजार अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है।
निवेशकों का एक वर्ग अब भी मान रहा है कि कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं और बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है। इसके अलावा तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी कंपनियों में लगातार निवेश भी बाजार को सहारा दे रहा है।
एआई क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के बेहतर प्रदर्शन ने प्रमुख अमेरिकी सूचकांकों को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की है।
आगे किस दिशा में जाएगा तेल बाजार?
आने वाले दिनों में तेल की कीमतों की दिशा काफी हद तक मध्य पूर्व की राजनीतिक स्थिति पर निर्भर करेगी।
यदि ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत फिर शुरू होती है, हॉर्मुज के रास्ते आपूर्ति सामान्य होती है और क्षेत्रीय तनाव कम होता है, तो हालिया तेजी में कुछ नरमी आ सकती है।
वहीं दूसरी तरफ यदि तनाव और बढ़ता है, सैन्य गतिविधियां तेज होती हैं या ऊर्जा आपूर्ति सीधे प्रभावित होती है, तो ब्रेंट और डब्ल्यूटीआई दोनों में और तेजी देखने को मिल सकती है।
फिलहाल बाजार की सबसे बड़ी चिंता उत्पादन नहीं, बल्कि अनिश्चितता है। निवेशक हर नए राजनीतिक संकेत पर नजर बनाए हुए हैं। इसी वजह से निकट भविष्य में तेल बाजार में तेज उतार-चढ़ाव की संभावना बनी हुई है।