काठमांडू में आत्मदाह की कोशिश के बाद गंभीर रूप से झुलसे 25 वर्षीय गणेश नेपाली की इलाज के दौरान मौत हो गई। वह वीर अस्पताल के बर्न आईसीयू में भर्ती थे और कई दिनों से वेंटिलेटर पर उनका इलाज चल रहा था।
गणेश मुगु जिले की सोरु गांवपालिका–1 के रहने वाले थे। काठमांडू जिला पुलिस परिसर के एसएसपी दिलीप घिमिरे ने बताया कि उनकी हालत लगातार बिगड़ रही थी। डॉक्टरों की कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।
शरीर का 55 प्रतिशत हिस्सा झुलसा था
अस्पताल के मुताबिक, आत्मदाह की कोशिश में गणेश के शरीर का करीब 55 प्रतिशत हिस्सा जल गया था। उनका चेहरा बुरी तरह झुलस गया था। आग और धुएं से उनकी सांस की नली को भी गंभीर नुकसान पहुंचा था।
सांस की नली में चोट के कारण उनकी हालत शुरू से ही नाजुक बनी हुई थी। उन्हें बर्न आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा गया था।
वीर अस्पताल ने इससे पहले एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि गणेश की हालत बेहद अस्थिर है। डॉक्टरों ने उसी समय साफ कर दिया था कि किसी भी वक्त उनकी तबीयत और बिगड़ सकती है।
इलाज में शामिल चिकित्सकों के अनुसार, शरीर का बड़ा हिस्सा जलने और सांस की नली को नुकसान पहुंचने के कारण उन्हें बचाना काफी मुश्किल था।
इलाज के लिए बनाई गई थी 21 सदस्यीय टीम
गणेश के इलाज के लिए वीर अस्पताल ने 21 सदस्यीय विशेष मेडिकल टीम बनाई थी। प्लास्टिक सर्जरी विभाग के संयोजक डॉ. पीयूष दाहाल इस टीम का नेतृत्व कर रहे थे।
टीम में यूनिट प्रमुख डॉ. अपार लामिछाने, क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. निर्माण ज्ञवाली, एनेस्थेटिस्ट जयप्रकाश ठाकुर, प्रोफेसर डॉ. रविराम श्रेष्ठ और नर्सिंग सेवा से जुड़े स्वास्थ्यकर्मी शामिल थे।
डॉक्टर लगातार उनकी हालत पर नजर रख रहे थे। संक्रमण रोकने, सांस को स्थिर रखने और जले हुए हिस्सों के इलाज के लिए अलग-अलग विभागों की मदद ली गई।
दिल्ली ले जाने की तैयारी भी हुई
गणेश को बेहतर इलाज के लिए भारत की राजधानी नई दिल्ली ले जाने की तैयारी की गई थी। लेकिन उनकी हालत इतनी अस्थिर थी कि उन्हें अस्पताल से बाहर ले जाना संभव नहीं हो सका।
अस्पताल का कहना था कि ऐसी स्थिति में हवाई यात्रा या लंबी दूरी तक स्थानांतरण करना उनकी जान के लिए और बड़ा खतरा बन सकता था। इसलिए वीर अस्पताल में ही इलाज जारी रखा गया।
आखिरकार तमाम कोशिशों के बावजूद इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।
पठाओ चलाकर परिवार पालते थे गणेश
गणेश काठमांडू में राइड शेयरिंग सेवा पठाओ के जरिए काम करते थे। इसी कमाई से परिवार का रोजमर्रा का खर्च चलता था। उनकी मौत से एक गरीब परिवार ने अपना सहारा खो दिया है।
यह घटना सिर्फ एक युवक की मौत तक सीमित नहीं है। इसने काठमांडू में रोजी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे राइडर और दूसरे श्रमिकों की स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
कम आमदनी, रोज बढ़ते खर्च, काम के दौरान लगने वाले जुर्माने और सरकारी निकायों के व्यवहार का दबाव कमजोर आर्थिक स्थिति वाले लोगों पर किस तरह असर डाल रहा है, गणेश की मौत के बाद यह चर्चा फिर तेज हो गई है।
गणेश को बचाया नहीं जा सका। पीछे रह गया उनका परिवार और वे सवाल, जिनका जवाब अब जिम्मेदार संस्थाओं को देना होगा।