नेपाल में भ्रष्टाचार रोकने के इरादे से सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया था। साल 2062/63 यानी करीब दो दशक पहले से अब तक जितने भी लोग बड़े सार्वजनिक पदों पर रहे हैं, नेता हों, अफसर हों, जज हों या सुरक्षा तंत्र के अधिकारी, उन सबकी संपत्ति की जांच के लिए एक शक्तिशाली आयोग बनाया गया।
आयोग ने काम भी शुरू कर दिया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक के बाद एक अंतरिम आदेश आ रहे हैं, जिनमें आयोग को फिलहाल संपत्ति की जांच रोकने को कहा गया है।
सवाल यही उठ रहा है कि जो आयोग भ्रष्टाचार रोकने के लिए बना, अदालत ने उसी को जांच से क्यों रोक दिया।
तीन खंभों का संतुलन कैसे टूटता दिख रहा है
इसे समझने के लिए पहले नेपाल के संविधान की बुनियादी सोच को समझना जरूरी है।
संविधान ने देश की शक्ति किसी एक व्यक्ति या एक संस्था के हाथ में जाने से रोकने के लिए उसे तीन हिस्सों में बांटा है। पहला हिस्सा है संसद, जो कानून बनाती है। दूसरा है सरकार यानी कार्यपालिका, जो उन कानूनों को लागू करती है और रोजमर्रा का प्रशासन चलाती है। और तीसरा है अदालत, जो कानूनों की व्याख्या करती है और यह देखती है कि सरकार या संसद का कोई काम संविधान के दायरे से बाहर तो नहीं जा रहा।
इसका मतलब यह नहीं कि हर फैसले में तीनों की सहमति चाहिए। लेकिन अगर कोई एक अंग अपनी सीमा लांघता है, तो दूसरा अंग उसे रोक सकता है। सरकार संविधान के खिलाफ कोई फैसला ले तो अदालत उसे रोक सकती है। संसद कोई ऐसा कानून बना दे जो संविधान से टकराता हो, तो अदालत उसे रद्द कर सकती है। और अगर किसी जज ने कुछ गलत किया हो, तो संसद दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग लाकर उसे हटा सकती है।
इसी व्यवस्था को शक्ति पृथक्करण और नियंत्रण-संतुलन कहा जाता है। इसकी वजह यही है कि अगर यह संतुलन न हो, तो सत्ता में बैठे लोगों की मनमानी पूरे देश को मुश्किल में डाल सकती है।
फुटबॉल के मैदान से एक उदाहरण लें तो बात आसानी से समझ आती है। खिलाड़ी का काम खेलना और गोल करना है। कोच रणनीति बनाता है। और रेफरी यह देखता है कि खेल नियमों के हिसाब से चल रहा है या नहीं। रेफरी खुद गेंद लेकर गोल नहीं कर सकता, लेकिन अगर कोई खिलाड़ी हाथ से गेंद पकड़कर गोल करने की कोशिश करे, तो रेफरी उसे तुरंत रोकता है।
ठीक इसी तरह, सरकार की नीयत चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हो, उसका रास्ता संविधान और कानून से होकर ही गुजरना चाहिए। सिर्फ यह कहने भर से कि “हम भ्रष्टाचार रोकना चाहते हैं”, कोई सरकार खुद नया अधिकार गढ़कर किसी पर भी, किसी भी तरीके से जांच नहीं बिठा सकती।
आयोग को लेकर असल दिक्कत कहां से शुरू हुई
अब सीधे उस आयोग की बात करते हैं, जिस पर विवाद खड़ा हुआ है।
नेपाल के संविधान की धारा 239 के तहत, अगर किसी सार्वजनिक पदाधिकारी पर पद के दुरुपयोग से भ्रष्टाचार करने का आरोप लगे, तो उसकी जांच का अधिकार अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग यानी सीआईएए के पास है। यह किसी मंत्रालय या प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन आने वाला सामान्य सरकारी दफ्तर नहीं है, बल्कि संविधान से ही बना एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है।
यानी कानून के दायरे में रहकर सीआईएए प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद, पूर्व प्रधानमंत्री और सरकारी कर्मचारियों तक की भ्रष्टाचार जांच कर सकता है।
लेकिन यहां एक अहम बात है। संविधान ने सभी सार्वजनिक पदाधिकारियों को एक ही टोकरी में डालकर सीआईएए से जांच कराने की व्यवस्था नहीं की है। पदस्थ जजों, महाभियोग से हटाए जा सकने वाले संवैधानिक पदाधिकारियों और सैन्य कानून के दायरे में आने वाले लोगों के लिए संविधान में अलग प्रावधान हैं।
नई बनी सरकार के मंत्रिपरिषद ने जो आयोग बनाया, उस पर सवाल ठीक यहीं से उठा। क्योंकि यह आयोग कार्यपालिका, व्यवस्थापिका और न्यायपालिका, तीनों अंगों से जुड़े पदाधिकारियों की संपत्ति की जांच कर सकता था।
सीधे शब्दों में कहें तो प्रधानमंत्री और मंत्रियों वाला मंत्रिपरिषद एक आयोग बनाए, और वही आयोग प्रधान न्यायाधीश, अन्य जजों, सांसदों, सेना प्रमुख से लेकर बाकी संवैधानिक निकायों के पदाधिकारियों तक की जांच करने लगे, तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या इससे कार्यपालिका को बाकी संवैधानिक अंगों पर नियंत्रण का एक नया रास्ता मिल जाएगा।
यह आयोग सीआईएए जैसा स्वतंत्र संवैधानिक निकाय नहीं है। यह प्रधानमंत्री की अगुआई वाले मंत्रिपरिषद के एक फैसले से बना आयोग है। इसलिए जब यह आयोग जजों, सांसदों और सेना के वरिष्ठ अफसरों तक को बुलाकर जांच करने लगा, तो यह डर पैदा हुआ कि कहीं कार्यपालिका बाकी अंगों से ऊपर तो नहीं होती जा रही। यानी प्रधानमंत्री खुद देश की हर संस्था को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं, यह संवैधानिक सवाल अदालत के सामने रखा गया।
जजों की जांच का रास्ता अलग क्यों है
अब बात जजों की। किसी जज पर बुरे आचरण, पद के प्रति ईमानदारी न बरतने या अनुशासन तोड़ने की शिकायत आए, तो उसे देखने का काम न्याय परिषद का है। न्याय परिषद शिकायत की पड़ताल कर सकता है और जरूरी कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।
लेकिन प्रधान न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के जजों को हटाने का अधिकार संविधान ने संसद को दिया है। इसके लिए दो-तिहाई बहुमत से महाभियोग की अलग व्यवस्था है।
मतलब साफ है, पदस्थ जज के खिलाफ मंत्रिपरिषद के बनाए किसी साधारण आयोग को अपनी मर्जी से भ्रष्टाचार की जांच शुरू करने का अधिकार नहीं है। जज के आचरण और पद से जुड़े मामले पहले न्याय परिषद या महाभियोग की प्रक्रिया से ही गुजरने चाहिए।
इतना ही नहीं, संविधान की धारा 239 के मुताबिक पदस्थ जज के खिलाफ सीआईएए भी सीधे जांच नहीं कर सकता। जज के पद छोड़ने या हटाए जाने के बाद ही संघीय कानून के तहत जांच हो सकती है।
सेना और सांसदों को लेकर स्थिति क्या है
सेना के मामले में भी अलग नियम हैं। नेपाली सेना के सदस्य सामान्य सरकारी कर्मचारियों जैसी एक ही कानूनी प्रक्रिया के दायरे में नहीं आते। उनके लिए सैनिक ऐन 2063, सैन्य अनुशासन, आंतरिक जांच और सैन्य अदालत से जुड़े अलग कानूनी प्रावधान हैं।
इसलिए पदस्थ सैन्य अधिकारी या सेना प्रमुख के खिलाफ भी मंत्रिपरिषद के बनाए किसी सामान्य आयोग को सैन्य कानून की प्रक्रिया को दरकिनार कर मनमाने ढंग से जांच करने का अधिकार है या नहीं, यह गंभीर सवाल खड़ा हुआ।
हालांकि यह सोचना भी ठीक नहीं कि सेना में भ्रष्टाचार हो तो सिर्फ सैन्य अदालत ही संपत्ति की जांच करेगी। सैन्य अदालत सैनिक ऐन के तहत आने वाले अपराधों और अनुशासन से जुड़े मामले देखती है। सैन्य व्यक्ति पर भ्रष्टाचार की जांच किस संस्था को, किस हालत में और किस कानून के तहत करनी है, यह आरोप की प्रकृति और संबंधित व्यक्ति के पद पर निर्भर करता है। संविधान ने सैनिक ऐन के दायरे में आने वाले व्यक्ति को पद पर रहते हुए सीआईएए की सामान्य जांच से भी खास सुरक्षा दी है। पद छोड़ने के बाद ही संघीय कानून के तहत जांच संभव है।
सांसदों को लेकर स्थिति यह है कि वे व्यवस्थापिका के सदस्य हैं। अगर किसी सांसद पर पद के दुरुपयोग, घूस लेने या सरकारी रकम की हेराफेरी का आरोप लगे, तो सीआईएए कानून के मुताबिक जांच कर सकता है। लेकिन संप्रभु संसद के सदस्य की जांच मंत्रिपरिषद के बनाए आयोग से हो सकती है या नहीं, यही सवाल यहां भी खड़ा है।
प्रधानमंत्री और मंत्री भी भ्रष्टाचार की जांच से ऊपर नहीं हैं। पद के दुरुपयोग का आरोप लगने पर सीआईएए उनकी भी कानूनी दायरे में जांच कर सकता है।
तो असल सवाल यही है, जब प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद और सरकारी कर्मचारियों की भ्रष्टाचार जांच के लिए सीआईएए मौजूद है, जजों के आचरण की जांच के लिए न्याय परिषद और महाभियोग की व्यवस्था है, और सैन्य कर्मियों के लिए सैनिक ऐन के तहत अलग प्रक्रिया है, तो क्या मंत्रिपरिषद एक और आयोग बनाकर इन सबको एक साथ जांच के दायरे में ला सकता है।
मौजूदा संवैधानिक विवाद ठीक इसी बिंदु पर टिका है।
सुप्रीम कोर्ट ने असल में कहा क्या है
यह समझना जरूरी है कि अदालत ने भ्रष्टाचार की जांच रोकने, नेताओं की संपत्ति न देखने या भ्रष्टाचारियों को बचाने के लिए यह आदेश नहीं दिया है।
अदालत का सवाल सीधा है, सरकार के बनाए इस आयोग को प्रधान न्यायाधीश, अन्य जजों, सांसदों, सेना प्रमुख और बाकी संवैधानिक पदाधिकारियों की जांच का अधिकार संविधान और कानून की किस धारा से मिला।
और अगर संविधान ने पहले से ही सीआईएए, न्याय परिषद, संसद और सैन्य कानून के तहत अलग-अलग प्रक्रियाएं तय कर रखी हैं, तो क्या मंत्रिपरिषद अपने एक फैसले से वे सारे अधिकार किसी नए आयोग को सौंप सकता है।
इसी संवैधानिक सवाल का अंतिम फैसला आने तक आयोग को आगे न बढ़ने का अंतरिम आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया है।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने किसी की भी संपत्ति की जांच पूरी तरह रोकने को नहीं कहा। प्रधानमंत्री, मंत्री, सांसद या सरकारी कर्मचारी पर भ्रष्टाचार का मामला हो, तो कानून के मुताबिक सीआईएए और जरूरत पड़ने पर संपत्ति शुद्धीकरण जांच विभाग जैसी अधिकारप्राप्त संस्थाएं जांच कर सकती हैं।
पदस्थ जज के आचरण और अनुशासन का मामला हो, तो संविधान में तय न्याय परिषद और जरूरत पड़ने पर महाभियोग की प्रक्रिया अपनानी होगी। पद छोड़ने के बाद भ्रष्टाचार के मामले में संघीय कानून के तहत जांच हो सकती है।
इसी तरह सैन्य कर्मियों के मामले में सैनिक ऐन, सैन्य तंत्र और संविधान की तय प्रक्रिया का पालन होना चाहिए। पद छोड़ने के बाद संघीय कानून के तहत जांच संभव है।
मतलब भ्रष्टाचार की जांच हो सकती है। सवाल सिर्फ यह है कि क्या प्रधानमंत्री का मंत्रिपरिषद अपनी मर्जी से आयोग बनाकर संविधान द्वारा अलग-अलग संस्थाओं को दिए गए अधिकार एक जगह समेट सकता है।
अब आगे क्या होगा
सरकार का बनाया यह आयोग संवैधानिक है या नहीं, और इसे इतना बड़ा अधिकार दिया जा सकता है या नहीं, इसका अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ करेगी।