आरजु राणा पर पासपोर्ट ठेका मामले की जांच तेज, अख्तियार के नोटिस से बढ़ी सियासी हलचल

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नेपाल की पूर्व विदेश मंत्री आरजु राणा के घर के बाहर अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग ने सार्वजनिक सूचना चिपकाकर तीन दिन के भीतर बयान देने के लिए उपस्थित होने को कहा है। यह सूचना ऐसे समय आई है जब ई-पासपोर्ट छपाई से जुड़े बहुचर्चित ठेका विवाद की जांच तेज हो चुकी है और मामले की आंच देश की कई प्रभावशाली राजनीतिक हस्तियों तक पहुंचने की चर्चा चल रही है।

कुछ समय पहले तक नेपाल की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक शख्सियतों में गिनी जाने वाली आरजु राणा इन दिनों देश से बाहर रह रही हैं। इसी बीच उनके घर के बाहर आयोग का नोटिस लगाए जाने के बाद पासपोर्ट छपाई प्रकरण फिर से राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है।

मामले की जांच अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग कर रहा है। जांच का केंद्र ई-पासपोर्ट छपाई और उससे जुड़ी खरीद प्रक्रिया है, जिसमें अनियमितता और भ्रष्टाचार की आशंका जताई गई है। इस प्रकरण में कुछ वरिष्ठ सरकारी अधिकारी पहले ही गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

पासपोर्ट ठेका विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

नेपाल सरकार पिछले करीब 15 वर्षों से पासपोर्ट छपाई का काम फ्रांसीसी कंपनी IDEMIA को देती आ रही थी। इसी अवधि में कंपनी ने नेपाल के लिए करोड़ों पासपोर्ट तैयार किए।

कंपनी के साथ हुआ पुराना समझौता नवंबर 2024 में समाप्त होने के बाद सरकार ने 64 लाख ई-पासपोर्ट छापने और उससे जुड़ी तकनीकी प्रणाली स्थापित करने के लिए नया टेंडर जारी किया।

इस बार परिणाम अलग रहा।

लंबे समय से काम कर रही फ्रांसीसी कंपनी को ठेका नहीं मिला। उसकी जगह जर्मनी की दो कंपनियों को पांच वर्ष का ठेका दिया गया।

पहले पैकेज के तहत Veridos GmbH को 6 अरब 11 करोड़ नेपाली रुपये और दूसरे पैकेज के तहत Mühlbauer ID Services GmbH को 1 अरब 55 करोड़ नेपाली रुपये का अनुबंध मिला। कुल मिलाकर यह सौदा 7 अरब 66 करोड़ रुपये का था।

यहीं से विवाद शुरू हुआ।

पुरानी ठेकेदार कंपनी IDEMIA ने आरोप लगाया कि पूरी प्रक्रिया को इस तरह तैयार किया गया कि जर्मन कंपनियां ही चयनित हों और अन्य दावेदार बाहर हो जाएं। कंपनी का यह भी दावा था कि तकनीकी मानकों की अनदेखी की गई और खरीद प्रक्रिया में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हुआ।

समिति से अदालत तक पहुंचा मामला

फ्रांसीसी कंपनी ने सबसे पहले सार्वजनिक खरीद पुनरावलोकन समिति में शिकायत दर्ज कराई। लेकिन वहां उसे राहत नहीं मिली।

इसके बाद मामला नेपाल के सर्वोच्च अदालत तक पहुंचा। कंपनी और अधिवक्ता कुसुमकिशोर कोइराला ने अलग-अलग याचिकाएं दायर कर ठेका प्रक्रिया रोकने की मांग की।

याचिकाओं में कहा गया कि अरबों रुपये की खरीद प्रक्रिया में कानूनी प्रावधानों का पालन नहीं किया गया। दूसरी ओर यह भी तर्क रखा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े पासपोर्ट छपाई का काम विदेशी निजी कंपनियों के बजाय नेपाल के सुरक्षा मुद्रण केन्द्र को दिया जाना चाहिए।

हालांकि जुलाई 2025 में सर्वोच्च अदालत ने तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत से रास्ता साफ होने के बाद ठेका प्रक्रिया आगे बढ़ गई।

अख्तियार तक कैसे पहुंची शिकायत?

समिति और अदालत से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलने के बाद फ्रांसीसी कंपनी ने अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग का दरवाजा खटखटाया।

कंपनी ने आरोप लगाया कि यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं बल्कि नीतिगत स्तर का बड़ा भ्रष्टाचार है।

हालांकि शुरुआत में आयोग ने कोई बड़ा कदम नहीं उठाया। इसकी एक वजह यह भी बताई गई कि इस तरह के बड़े सार्वजनिक खरीद मामलों में संबंधित निकाय अक्सर प्रक्रिया से पहले अख्तियार से परामर्श लेते हैं। बताया जाता है कि इस मामले में भी आयोग के साथ चर्चा हुई थी।

लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई न होने के कारण विवाद दबा रहा, लेकिन बाद की राजनीतिक घटनाओं ने इसे फिर सुर्खियों में ला दिया।

राजनीतिक बदलाव के बाद क्यों बढ़ी जांच?

जेन्जी आंदोलन के बाद बनी नई सरकार के दौरान पुराने कई विवादित मामलों को फिर से खोलने की मांग उठी। इसी दौरान पासपोर्ट ठेका विवाद से जुड़ी शिकायत प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची।

इस शिकायत की खास बात यह थी कि इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और तत्कालीन विदेश मंत्री आरजु राणा दोनों के नाम चर्चा में आए। ठेका समझौते के समय यही दोनों शीर्ष राजनीतिक जिम्मेदारियों में थे।

इसके बाद मामला तेजी से आगे बढ़ने लगा।

जांच की दिशा बदलने के साथ ही यह बहस शुरू हो गई कि क्या राजनीतिक स्तर पर दबाव डालकर अख्तियार को कार्रवाई के लिए प्रेरित किया गया।

प्रधानमंत्री कार्यालय पर क्यों उठ रहे सवाल?

विवाद का सबसे संवेदनशील हिस्सा यहीं से शुरू होता है।

विभिन्न मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया कि अख्तियार के प्रमुख अधिकारियों को प्रधानमंत्री कार्यालय बुलाया गया और पासपोर्ट प्रकरण पर लंबी बैठक हुई। आरोप यह भी है कि जांच को आगे बढ़ाने और गिरफ्तारी प्रक्रिया शुरू करने को लेकर दबाव बनाया गया।

इसी बैठक के बाद कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी हुई, जिसके चलते विपक्षी दलों ने संसद में गंभीर सवाल उठाए।

बहस का केंद्र सिर्फ पासपोर्ट ठेका नहीं है।

मुख्य सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री कार्यालय को किसी संवैधानिक निकाय की जांच प्रक्रिया में सीधे हस्तक्षेप करने का अधिकार है?

नेपाल की संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अख्तियार दुरुपयोग अनुसन्धान आयोग सरकार के अधीन विभाग नहीं बल्कि एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसका काम सरकार, सरकारी अधिकारियों और सार्वजनिक पदधारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करना है।

जरूरत पड़ने पर आयोग प्रधानमंत्री तक के खिलाफ मामला दर्ज कर सकता है।

इसी वजह से विपक्ष और कई कानूनी जानकार यह सवाल उठा रहे हैं कि यदि जांच एजेंसियों पर राजनीतिक प्रभाव बढ़ा तो स्वतंत्र जांच की व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है।

आगे क्या हो सकता है?

फिलहाल जांच जारी है और आयोग ने आरजु राणा को बयान के लिए उपस्थित होने का नोटिस जारी कर दिया है।

यदि वह तय समय के भीतर उपस्थित नहीं होती हैं तो कानूनी प्रक्रिया और आगे बढ़ सकती है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि जरूरत पड़ने पर सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग मांगने की कोशिश कर सकती है, हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है।

फिलहाल पूरा ध्यान इस बात पर है कि जांच आखिर किस निष्कर्ष तक पहुंचती है और क्या यह मामला नेपाल की शीर्ष राजनीतिक हस्तियों तक औपचारिक रूप से पहुंच पाता है या नहीं।

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यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।

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