समझौते के तीन साल बाद भी सेलेघाट–रामेछाप–सांघुटार सड़क कीचड़ में
नेपाल में बारिश शुरू होते ही बाढ़, भूस्खलन और सड़क हादसों का खतरा बढ़ जाता है। पहाड़ी इलाकों में बिना पर्याप्त तकनीकी और पर्यावरणीय अध्ययन के खोली गई सड़कें इस जोखिम को और गंभीर बना रही हैं।
रामेछाप से ओखलढुंगा को जोड़ने वाली सेलेघाट–रामेछाप–सांघुटार सड़क भी ऐसी ही लापरवाही का उदाहरण बन गई है। करीब 50 किलोमीटर लंबी इस सड़क का निर्माण मई 2023 तक पूरा होना था। लेकिन जुलाई 2026 का आखिरी सप्ताह आ गया है और सड़क अब भी अधूरी है।
बारिश में यहां सफर करना मुश्किल ही नहीं, कई जगह खतरनाक हो गया है। सड़क पर बड़े-बड़े गड्ढे हैं। कुछ हिस्से धंस चुके हैं। कहीं पानी जमा है तो कहीं कीचड़ में बस और छोटी गाड़ियां बीच रास्ते फंस रही हैं।
यह सड़क रामेछाप के लोगों के लिए केवल एक स्थानीय रास्ता नहीं है। ओखलढुंगा और आसपास के इलाकों से काठमांडू आने-जाने वाले हजारों लोग भी इसी मार्ग पर निर्भर हैं।
‘जनता संग मीडिया’ में पहुंची शिकायत
सड़क की खराब हालत को लेकर कुसुम शाही ने खोज समाचार के नागरिक केंद्रित कार्यक्रम ‘जनता संग मीडिया’ में व्हाट्सऐप के जरिए शिकायत भेजी।
शिकायत के साथ सड़क की मौजूदा हालत दिखाने वाले वीडियो और तस्वीरें भी भेजी गईं। खोज समाचार की टीम ने इन दृश्यों और स्थानीय स्रोतों से मिली जानकारी की जांच की है।
24 जुलाई 2026 तक के दृश्यों में सड़क के कई हिस्से कीचड़ से भरे दिखते हैं। कुछ गड्ढे इतने बड़े हैं कि उनमें वाहन के पहिए पूरी तरह धंस सकते हैं। कई जगह सड़क की सतह टूटकर नीचे बैठ गई है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक बारिश के दिनों में गाड़ियां घंटों तक एक ही जगह फंसी रहती हैं। यात्रियों को उतरकर वाहन धकेलना पड़ता है। कई बार दूसरा रास्ता तलाशना पड़ता है, लेकिन पहाड़ी इलाकों में वैकल्पिक मार्ग भी आसानी से उपलब्ध नहीं होता।
सर्दियों में तस्वीर बदलती है, परेशानी नहीं। उस समय सड़क से उड़ने वाली धूल आसपास के घरों, दुकानों और बस्तियों को ढक देती है। लोगों को दिनभर दरवाजे और खिड़कियां बंद रखनी पड़ती हैं।
रोज चलती हैं बसें और सुमो
स्थानीय लोगों से मिली जानकारी के अनुसार इस सड़क पर हर दिन कम से कम चार यात्री बसें चलती हैं। दो बसें रामेछाप से काठमांडू जाती हैं और दो काठमांडू से लौटती हैं।
इसके अलावा तीन से चार सुमो और कई छोटे वाहन भी रोज इसी रास्ते से गुजरते हैं।
बुजुर्ग, गर्भवती महिलाएं, बीमार लोग, विद्यार्थी, कर्मचारी और रोजमर्रा के काम से यात्रा करने वाले आम नागरिक इसी सड़क का इस्तेमाल करते हैं।
सामान्य दिनों में कुछ घंटों में पूरा होने वाला सफर बारिश में अनिश्चित हो जाता है। किसी को नहीं पता होता कि गाड़ी कहां फंसेगी और रास्ता कब खुलेगा।
एक बस फंसने के बाद पीछे चल रहे दूसरे वाहन भी रुक जाते हैं। लंबा जाम लग जाता है। यात्रियों को घंटों गाड़ी के भीतर बैठना पड़ता है। कई बार उन्हें कीचड़ में उतरकर पैदल आगे बढ़ना पड़ता है।
समस्या केवल यात्रा की असुविधा तक सीमित नहीं है। सड़क की हालत का असर मरीजों के इलाज, छात्रों की पढ़ाई, स्थानीय उत्पादों की ढुलाई और छोटे कारोबार पर भी पड़ रहा है।
करीब 1.94 अरब रुपये की परियोजना
सार्वजनिक रूप से उपलब्ध परियोजना विवरण के अनुसार सेलेघाट–रामेछाप–सांघुटार सड़क के करीब 50 किलोमीटर हिस्से के निर्माण पर लगभग एक अरब 94 करोड़ नेपाली रुपये खर्च होने हैं।
यह परियोजना भारतीय एक्जिम बैंक के ऋण सहयोग से शुरू की गई थी। निर्माण का ठेका भारत सरकार के स्वामित्व वाली टेलीकम्युनिकेशंस कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड यानी टीसीआईएल को दिया गया।
काम 2020 के आखिरी महीनों में शुरू हुआ था। समझौते के अनुसार निर्माण 10 मई 2023, यानी 27 वैशाख 2080 तक पूरा हो जाना चाहिए था।
निर्धारित समय खत्म हुए तीन साल से अधिक हो चुके हैं। इसके बाद भी सड़क पूरी नहीं हुई। समयसीमा कई बार बढ़ाई गई, लेकिन यात्रियों की परेशानी कम नहीं हुई।
अगस्त 2025 में प्रकाशित एक विवरण में परियोजना प्रमुख ने काम की भौतिक प्रगति करीब 60 प्रतिशत बताई थी। निर्माण कंपनी को एक और मौका दिए जाने की जानकारी भी सामने आई थी।
कंपनी के प्रतिनिधियों ने खराब हिस्सों में मशीन लगाने और ग्रेवल बिछाने की बात कही थी। मगर जुलाई 2026 में मिले ताजा दृश्यों में सड़क अब भी कीचड़, गड्ढों और धंसे हुए हिस्सों से भरी दिखती है।
कागज पर प्रगति कितनी भी दिखाई जाए, स्थानीय लोगों के लिए असली सवाल यही है कि उन्हें सुरक्षित और आसान यात्रा कब मिलेगी।
नाली नहीं, बारिश का पानी सड़क पर
पहाड़ी सड़क पर पानी निकासी की व्यवस्था सबसे जरूरी होती है। इस मार्ग के कई हिस्सों में नाली नहीं बनाई गई है। जहां संरचनाएं तोड़ी गई थीं, वहां नई संरचनाएं समय पर तैयार नहीं हुईं।
बारिश का पानी सड़क के बीच से बहता है। इससे मिट्टी और ग्रेवल कटकर नीचे चले जाते हैं। सड़क की सतह कमजोर होती जाती है और गड्ढे बड़े होते जाते हैं।
ढलान वाले हिस्सों में ऊपर से भूस्खलन का खतरा है। नीचे की ओर सड़क धंसने का डर बना रहता है। ऐसे रास्ते पर भारी यात्री बस चलाना सीधे तौर पर लोगों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है।
गांवों तक सड़क पहुंचाना विकास का जरूरी हिस्सा है। लेकिन केवल ट्रैक खोल देना पर्याप्त नहीं है। नाली, सुरक्षा दीवार, नियमित मरम्मत और समय पर पक्की सड़क के बिना यही विकास बारिश के मौसम में खतरा बन जाता है।
मंत्री के बयान से आगे क्या हुआ?
भौतिक पूर्वाधार और यातायात मंत्री सुनील लम्साल ने काम नहीं करने वाले ठेकेदारों को खोजकर लाने और उनके ‘पैर तोड़ देने’ तक की सार्वजनिक टिप्पणी की थी। इस बयान की आलोचना भी हुई।
लेकिन नागरिकों को उग्र बयान नहीं, कानूनी कार्रवाई चाहिए।
सरकार का काम किसी ठेकेदार को हिंसा की धमकी देना नहीं है। सरकार को समझौता लागू कराना चाहिए। तय समय में गुणवत्तापूर्ण निर्माण पूरा कराना चाहिए। शर्तें तोड़ी गई हैं तो कानून के तहत कार्रवाई करनी चाहिए।
सेलेघाट–रामेछाप–सांघुटार सड़क की मूल समयसीमा तीन साल पहले खत्म हो चुकी है। इसके बाद कितनी बार समय बढ़ाया गया, कितना काम हुआ, कितना भुगतान किया गया और देरी की असली वजह क्या है—ये सभी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
भौतिक पूर्वाधार और यातायात मंत्रालय, सड़क विभाग और संबंधित परियोजना कार्यालय को साफ बताना चाहिए कि टीसीआईएल काम कब पूरा करेगी।
सरकार को लगता है कि कंपनी अब भी परियोजना पूरी कर सकती है तो तारीखवार कार्ययोजना सार्वजनिक की जाए। काम की गुणवत्ता की नियमित जांच हो। हर चरण की प्रगति नागरिकों के सामने रखी जाए।
और अगर कंपनी बार-बार समय मिलने के बाद भी काम पूरा नहीं कर पाई है, तो कानूनी प्रक्रिया के तहत ठेका रद्द करने पर फैसला होना चाहिए।
देरी से स्थानीय लोगों को हुई परेशानी, सरकार पर बढ़े आर्थिक बोझ और परियोजना को हुए नुकसान की जिम्मेदारी भी तय करनी होगी।
नई योजनाओं के बीच पुरानी सड़क अधूरी
नया आर्थिक वर्ष शुरू होते ही मंत्रालय नई योजनाएं और नए बजट पेश कर रहे हैं। दूसरी तरफ अरबों रुपये की पुरानी परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं।
यह केवल एक सड़क की कहानी नहीं है।
देश के कई जिलों में ठेकेदार समय पर काम पूरा नहीं करते। समयसीमा बार-बार बढ़ती है। निगरानी कमजोर रहती है और नागरिक वर्षों तक धूल, कीचड़ और जोखिम के बीच यात्रा करते हैं।
नई परियोजना घोषित करने से पहले पुरानी योजनाओं की स्थिति की समीक्षा जरूरी है। निर्माण कंपनी की क्षमता, भुगतान की जानकारी और देरी के लिए जिम्मेदार लोगों का हिसाब सामने आना चाहिए।
सड़क का ठेका मिलना केवल सरकारी बजट खर्च करने का अधिकार नहीं है। यह नागरिकों को सुरक्षित रास्ता देने की जिम्मेदारी भी है।
तीन जिलों के लोग जिस सड़क पर रोज यात्रा करते हैं, वह आखिर कब तक कीचड़, धूल और गड्ढों में रहेगी?
बढ़ाई गई समयसीमा में भी काम पूरा नहीं हुआ तो निर्माण कंपनी के खिलाफ क्या कार्रवाई होगी? अब तक हुई देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?
इन सवालों का जवाब मंत्रालय, सड़क विभाग, परियोजना कार्यालय और निर्माण कंपनी को देना होगा।
लोगों को भाषण नहीं, चलने लायक सड़क चाहिए। चेतावनी नहीं, समझौते के मुताबिक काम चाहिए। हिंसक बयान नहीं, कानून के तहत जवाबदेही चाहिए।
‘जनता संग मीडिया’ क्या है?
‘जनता संग मीडिया’ खोज समाचार का नागरिक केंद्रित कार्यक्रम है। इसका उद्देश्य आम लोगों की शिकायतों और सार्वजनिक सरोकार के मुद्दों को संबंधित निकायों तक पहुंचाना है।
नेपाल या विदेश में रहने वाले नेपाली नागरिक अपनी समस्या, उससे जुड़े प्रमाण और जानकारी व्हाट्सऐप के जरिए खोज समाचार को भेज सकते हैं।
टीम उपलब्ध तथ्यों और सबूतों की जांच के बाद शिकायत को समाचार या विशेष रिपोर्ट के रूप में प्रकाशित करती है।
इस कार्यक्रम का मकसद उन नागरिकों की आवाज सामने लाना है, जिनकी मीडिया तक सीधी पहुंच नहीं है, और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही बढ़ाना है।
DISCLAIMER
यह सामग्री AI की सहायता से अनुवादित की गई है, लेकिन प्रकाशन से पूर्व इसकी संपादकीय समीक्षा और तथ्यात्मक सत्यापन किया गया है।