रिपोर्ट के अगले दिन मंत्री रामेछाप पहुँचे, सेलेघाट सड़क अब भी अधूरी
रामेछाप और ओखलढुंगा के लोग जिस सड़क के लिए तीन साल से इंतज़ार कर रहे हैं, वह आज भी कीचड़ और धूल में डूबी है। कर्ज़ भारतीय एक्ज़िम बैंक का चढ़ा है, निर्माण का ज़िम्मा भारत सरकार की कंपनी का था। लेकिन तय समय पर काम पूरा न करने का खामियाज़ा भुगत रहे हैं नेपाल के आम नागरिक।
करीब 50 किलोमीटर लंबी सेलेघाट-रामेछाप-साँघुटार सड़क इसी विरोधाभास की मिसाल बन गई है। नेपाल कर्ज़ चुका रहा है, मगर तय समयसीमा खत्म हुए तीन साल से ज़्यादा बीत चुके हैं, फिर भी लोगों को सुरक्षित सड़क नसीब नहीं हुई।
खोज समाचार की नेपाली टीम ने 24 जुलाई को इस सड़क की बदहाली, निर्माण में देरी और स्थानीय लोगों की परेशानी पर विस्तृत रिपोर्ट और वीडियो प्रकाशित किया था। अगले ही दिन, 25 जुलाई को भौतिक पूर्वाधार तथा यातायात मंत्री सुनिल लम्साल और कानून मंत्री सोबिता गौतम रामेछाप पहुंचे। इसे बीपी राजमार्ग का औचक निरीक्षण बताया गया।
रिपोर्ट और मंत्रियों के दौरे के बीच सीधा संबंध साबित करने का कोई आधार नहीं है। लेकिन रिपोर्ट छपने के अगले ही दिन हुए इस दौरे के दौरान स्थानीय लोगों और रामेछाप से चुने गए राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी के सांसद ने मंत्री लम्साल का ध्यान इसी सड़क की हालत की ओर खींचा। अब सवाल यह नहीं कि दौरा हुआ या नहीं, बल्कि यह है कि जनता की शिकायत पर सरकार ने क्या फैसला लिया और सड़क पर काम कब शुरू दिखेगा।
2023 में पूरी होनी थी, 2026 में भी कीचड़ में
भारतीय एक्ज़िम बैंक के कर्ज़ से शुरू हुई इस परियोजना का निर्माण भारत सरकार की कंपनी टेलीकम्युनिकेशन्स कंसल्टेंट्स इंडिया लिमिटेड (टीसीआईएल) कर रही है। परियोजना की लागत करीब एक अरब 94 करोड़ रुपये तय की गई थी।
निर्माण 2020 के आखिर में शुरू हुआ था। समझौते के मुताबिक काम 10 मई 2023 तक पूरा होना था। मगर तीन साल से ज़्यादा वक्त बीतने के बावजूद सड़क अधूरी है। समयसीमा कई बार बढ़ाई गई, लेकिन ज़मीन पर सुधार नज़र नहीं आता।
बारिश के मौसम में सड़क कीचड़ में तब्दील हो जाती है। गहरे गड्ढे, धंसी हुई जगहें और पानी निकासी न होने से बसें और छोटी गाड़ियां रास्ते में ही फंस जाती हैं। सर्दियों में यही सड़क धूल से अटी रहती है, जिससे आसपास की बस्तियां और कारोबार प्रभावित होते हैं।
यह सिर्फ किसी एक गांव की सड़क नहीं है। यह बीपी राजमार्ग के खुर्कोट से सेलेघाट और रामेछाप होते हुए साँघुटार तक जाती है, और रामेछाप, ओखलढुंगा समेत आसपास के इलाकों को काठमांडू से जोड़ती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक रोज़ाना दो बसें रामेछाप से काठमांडू जाती हैं और दो वापस लौटती हैं। इसके अलावा सूमो और दूसरी छोटी गाड़ियां भी नियमित चलती हैं।
सड़क की बदहाली का सीधा असर मरीज़ों, गर्भवती महिलाओं, बुज़ुर्गों, छात्रों, कर्मचारियों, किसानों और रोज़ाना सफर करने वालों पर पड़ रहा है। कोई गाड़ी कीचड़ में फंसती है तो पीछे की सारी गाड़ियां रुक जाती हैं। इलाज या ज़रूरी काम से निकले यात्रियों का सिर्फ वक्त नहीं, जान भी खतरे में पड़ सकती है।
कर्ज़ का बोझ है, लेकिन हिसाब कहां है?
विदेशी कर्ज़ से बनी परियोजना समय पर पूरी न हो तो उसका बोझ आखिरकार राज्य के कंधों पर ही आता है। और राज्य की कमाई का मुख्य ज़रिया है जनता का दिया हुआ टैक्स। इसलिए यह देरी सिर्फ ठेकेदार और परियोजना कार्यालय के बीच का तकनीकी विवाद नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक पैसे, सार्वजनिक कर्ज़ और नागरिकों के अधिकार से जुड़ा मसला है।
अब तक परियोजना में कितनी रकम का भुगतान हुआ, कर्ज़ की मूल राशि और ब्याज चुकाने की समयसारिणी क्या है, आखिरी बार समयसीमा कब तक बढ़ाई गई, बाकी काम कितना बचा है और देरी के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया गया — इन सब बातों की जानकारी सरकार ने अब तक सार्वजनिक नहीं की है।
सरकार को कम से कम इन सवालों का साफ जवाब देना चाहिए:
- टीसीआईएल को अब तक कितनी रकम का भुगतान हो चुका है?
- परियोजना की भौतिक और वित्तीय प्रगति क्या है?
- आखिरी बार समयसीमा कब तक बढ़ाई गई और किस आधार पर?
- बाकी काम पूरा करने की समयसारिणी और निगरानी की व्यवस्था कहां है?
- देरी के लिए ठेकेदार पर कोई जुर्माना या कार्रवाई हुई है या नहीं?
- भारतीय एक्ज़िम बैंक से लिए गए कर्ज़ की ब्याज दर और अब तक हुए भुगतान का ब्यौरा क्या है?
निरीक्षण के बाद बदला क्या?
मंत्रियों का सड़क पर पहुंचना अपने आप में समाधान नहीं है। निरीक्षण के बाद कोई लिखित निर्देश जारी हुआ या नहीं, ठेकेदार को तय समयसीमा दी गई या नहीं, बारिश में तुरंत मरम्मत के लिए ग्रेवल, नाली और मशीनें भेजी गईं या नहीं — यह सब जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
स्थानीय लोगों को मंत्री का दौरा नहीं, कीचड़ और धूल से छुटकारा चाहिए। उन्हें नए आश्वासन की नहीं, बल्कि काम शुरू होने की तारीख, पूरा होने का पक्का समय, और वादा न निभाने पर कार्रवाई की गारंटी चाहिए।
पिछले 10-15 सालों में नेपाल में सड़क, बिजली, संचार और पेयजल जैसी सुविधाएं गांव-गांव तक पहुंची हैं। विकास हुआ ही नहीं है, ऐसा नहीं। लेकिन कई परियोजनाएं तय समय पर पूरी न होना, समयसीमा बार-बार बढ़ना, लागत बढ़ना और जनता का सालों तक अधूरे ढांचे की तकलीफ झेलना — यही असली समस्या बन गई है। सेलेघाट-रामेछाप-साँघुटार सड़क इसी की एक साफ मिसाल है।
खोज समाचार की टीम भौतिक पूर्वाधार तथा यातायात मंत्रालय, सड़क विभाग, संबंधित परियोजना कार्यालय और निर्माण कंपनी टीसीआईएल से इन सवालों के जवाब मांगेगी। मिले जवाब, लिखित समयसारिणी और सड़क पर दिखने वाली असल प्रगति की जानकारी अगली रिपोर्ट में सार्वजनिक की जाएगी।
जनता कर्ज़ का बोझ उठाए और बदले में समझौते के मुताबिक सड़क भी न मिले — यह हालत स्वीकार्य नहीं हो सकती। तीन साल से ज़्यादा देरी झेल चुकी यह सड़क अब किसी नए आश्वासन से नहीं, बल्कि काम और जवाबदेही से ही पूरी होनी चाहिए।
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